काशीपुर। चौत्र नवरात्र के आगमन के साथ ही धार्मिक आस्था, लोक परंपरा और सांस्कृतिक उल्लास का एक अनोखा संगम आकार लेने लगता है, जहां हर साल की तरह इस बार भी वातावरण भक्ति और उत्साह से सराबोर होने की तैयारी में है। मां बाल सुंदरी देवी मंदिर में लगने वाला प्रसिद्ध चौती मेला पूरे क्षेत्र में अपनी अलग पहचान रखता है, लेकिन इस भव्य आयोजन की शुरुआत एक ऐसी परंपरा से होती है, जो श्रद्धालुओं के विश्वास की जड़ों में गहराई से बसी हुई है। खड़कपुर देवीपुरा स्थित मां खोखरा देवी मंदिर वह स्थान है, जहां मान्यता के अनुसार सबसे पहले प्रसाद अर्पित किया जाता है और उसके बाद ही मां बाल सुंदरी देवी के दरबार में प्रसाद चढ़ाया जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बिना यहां पूजा किए यदि कोई सीधे बाल सुंदरी मंदिर पहुंचता है तो उसकी मनोकामना अधूरी रह सकती है, यही वजह है कि नवरात्र के दौरान हर श्रद्धालु इस क्रम का पालन करता है और इस मंदिर का महत्व अत्यंत बढ़ जाता है।
नवरात्र शुरू होने से ठीक पहले का दृश्य भले ही सामान्य दिखाई देता हो, लेकिन इसके पीछे आने वाले बड़े आयोजन की झलक साफ महसूस की जा सकती है। मंदिर परिसर में अभी जहां सीमित संख्या में प्रसाद की दुकानें नजर आती हैं, वहीं धीरे-धीरे यह स्थान एक विशाल धार्मिक मेले का रूप ले लेता है। वर्षों से यहां दुकान लगाने वाले व्यापारी इस परंपरा के जीवंत साक्षी हैं, जिनके लिए यह केवल रोजी-रोटी का साधन नहीं बल्कि आस्था से जुड़ा दायित्व भी है। एक बुजुर्ग दुकानदार बताते हैं कि उन्होंने अपनी जवानी से लेकर अब तक लगातार यहां प्रसाद की दुकान लगाई है और समय के साथ बहुत कुछ बदल गया, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था और भीड़ का उत्साह आज भी वैसा ही बना हुआ है। उनका कहना है कि चौती मेले की तुलना में यहां भीड़ कुछ कम जरूर होती है, लेकिन जो भी श्रद्धालु आते हैं, वे पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां पहुंचते हैं और पहले यहीं प्रसाद अर्पित करते हैं।

मंदिर के आसपास का क्षेत्र केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां धार्मिक प्रतीकों और मान्यताओं का भी विशेष महत्व है, जो इस स्थान की पहचान को और अधिक मजबूत बनाते हैं। परिसर के निकट स्थित काली माता की भव्य प्रतिमा श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी रहती है, जहां लोग दर्शन कर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। इसके अलावा पोखराताल क्षेत्र में स्थित खुजली देवी की मूर्ति भी लोगों के बीच गहरी आस्था का केंद्र है, जहां विशेष रूप से त्वचा संबंधी रोगों से मुक्ति की कामना लेकर श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां झाड़ू, तेल, नमक और उड़द चढ़ाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है और स्थानीय लोग इसे एक चमत्कारी उपाय मानते हैं। दूर-दराज के क्षेत्रों से लोग केवल इस विश्वास के चलते यहां आते हैं और अपनी समस्याओं से मुक्ति की कामना करते हैं, जिससे यह स्थान केवल धार्मिक नहीं बल्कि लोकविश्वास का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
इस मंदिर के इतिहास को लेकर भले ही कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध न हो, लेकिन इसके साथ जुड़ी लोककथाएं इसे और अधिक रहस्यमय और विशेष बना देती हैं। कोई इसे सास-बहू के रिश्ते से जोड़ता है, तो कोई इसे बहनों या देवरानी-जेठानी के संबंधों की कहानी बताता है, लेकिन इन सभी कथाओं के पीछे कोई निश्चित आधार नहीं मिल पाता। इसके बावजूद यह तथ्य अटल है कि इस मंदिर की परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी श्रद्धालु उसी विश्वास के साथ यहां पहुंचते हैं। पुजारी सुशील कुमार गोस्वामी के अनुसार, यहां माता की मूर्ति विशेष अवसर पर स्थापित की जाती है और नवरात्र के दौरान धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन बड़े स्तर पर किया जाता है। सप्तमी की रात को माता की मूर्ति स्थापित की जाती है और उससे पहले डोला आने की परंपरा भी निभाई जाती है, जो इस मंदिर की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ाती है।
खोखरा देवी नाम की उत्पत्ति को लेकर भी एक दिलचस्प कथा प्रचलित है, जिसमें बताया जाता है कि यह क्षेत्र पहले खोखरा ताल के नाम से जाना जाता था और यहां एक बसा हुआ गांव भी था। समय के साथ किसी घटना के कारण यह गांव उजड़ गया और उसी के नाम से यह स्थान प्रसिद्ध हो गया। आज यह स्थल मां कामधेनु के स्वरूप के रूप में भी पूजा जाता है और विशेष रूप से बिजनौर जिले के लोगों के लिए यह कुलदेवी का स्थान रखता है। रामपुर, अमरोहा, गजरौला और मुरादाबाद जैसे क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पूजा-अर्चना करते हैं। नवविवाहित जोड़े यहां आकर अपनी ‘जात’ चढ़ाते हैं और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करते हैं, जिससे यह स्थान सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है।
मंदिर में व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी मुख्य रूप से स्थानीय लोगों और पुजारी परिवार के कंधों पर टिकी हुई है, जो पीढ़ियों से इस परंपरा को निभा रहे हैं। पुजारी परिवार का कहना है कि उनका वंश करीब दो सौ वर्षों से इस मंदिर की सेवा कर रहा है और वे इसे अपनी जिम्मेदारी के रूप में निभाते हैं। यहां किसी प्रकार की औपचारिक समिति का गठन नहीं किया गया है और अधिकांश व्यवस्थाएं निजी स्तर पर ही संचालित होती हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए दुकानदार और स्थानीय लोग मिलकर पानी, नहाने-धोने और पार्किंग जैसी व्यवस्थाएं करते हैं, जबकि सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन द्वारा संभाली जाती है, जो नवरात्र के दौरान विशेष इंतजाम करता है। बैरिकेडिंग और भीड़ नियंत्रण के उपायों के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

श्रद्धालुओं की आस्था का एक और महत्वपूर्ण पहलू यहां देखने को मिलता है, जहां लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए मंदिर में चुन्नी बांधते हैं और जब उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है, तो वे दोबारा आकर उसे खोलते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और आज भी लोग इसे पूरे विश्वास के साथ निभाते हैं। इसके अलावा खुजली देवी मंदिर में विशेष प्रकार का प्रसाद चढ़ाने की परंपरा भी लोगों के बीच लोकप्रिय है, जिसे रोग मुक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार यहां हर परंपरा के पीछे एक गहरा विश्वास जुड़ा हुआ है, जो इस स्थान को अन्य मंदिरों से अलग पहचान देता है। जैसे हरिद्वार में माया देवी के दर्शन के बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है, ठीक उसी प्रकार यहां भी मां खोखरा देवी के दर्शन के बिना मां बाल सुंदरी देवी की पूजा को पूर्ण नहीं माना जाता।
चत्र नवरात्र के दौरान जब मां बाल सुंदरी देवी का डोला कानूनगोयान स्थित नगर मंदिर से चैती मंदिर की ओर प्रस्थान करता है, उसी समय मां खोखरा देवी की उपस्थिति भी खड़कपुर देवीपुरा मंदिर में मानी जाती है, जहां श्रद्धालु उनके दर्शन करते हैं। यह धार्मिक परंपरा इस क्षेत्र की विशेष पहचान बन चुकी है और हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग इस आयोजन का हिस्सा बनते हैं। चतुर्दशी की मध्य रात्रि में जब डोला वापस नगर मंदिर लौटता है, तो यह माना जाता है कि मां खोखरा देवी भी अपने स्थान पर वापस लौट आती हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान श्रद्धालुओं में जो उत्साह और आस्था देखने को मिलती है, वह इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।
समग्र रूप से काशीपुर का यह धार्मिक परिदृश्य केवल एक मंदिर या मेला नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और लोकविश्वास का जीवंत प्रतीक है, जो पीढ़ियों से लोगों को जोड़ता आ रहा है। नवरात्र के दौरान यहां उमड़ने वाली भीड़, गूंजते जयकारे और श्रद्धालुओं की भक्ति इस बात का प्रमाण हैं कि यह परंपरा आज भी उतनी ही मजबूत है जितनी पहले हुआ करती थी। जैसे-जैसे नवरात्रि का शुभारंभ होता है, वैसे-वैसे यह क्षेत्र भक्ति और उत्सव के रंग में रंग जाता है और हर श्रद्धालु अपने विश्वास के साथ यहां पहुंचकर मां का आशीर्वाद प्राप्त करता है, जिससे यह स्थान एक अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है।
आस्था की इस पूरी परंपरा में मां खोखरा देवी मंदिर का महत्व केवल एक धार्मिक पड़ाव भर नहीं, बल्कि श्रद्धा की पहली सीढ़ी के रूप में स्थापित हो चुका है, जहां से हर भक्त की आध्यात्मिक यात्रा वास्तव में शुरू होती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर एक ऐसी शक्ति का केंद्र है, जो मां बाल सुंदरी देवी के दरबार तक पहुंचने से पहले भक्त की भावना, नीयत और विश्वास की परीक्षा लेता है, और इसी कारण यहां प्रसाद चढ़ाना अनिवार्य माना जाता है। श्रद्धालुओं का दृढ़ विश्वास है कि जब तक मां खोखरा देवी को प्रसन्न नहीं किया जाता, तब तक आगे की पूजा अधूरी रहती है, यही वजह है कि नवरात्र के दिनों में यहां सबसे पहले सिर झुकाने वालों की लंबी कतारें दिखाई देती हैं। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक ऐसी परंपरा का जीवंत प्रतीक है, जिसने वर्षों से लोगों की आस्था को एक सूत्र में बांध रखा है और आज भी हर भक्त को यह एहसास कराता है कि सच्ची भक्ति की शुरुआत विनम्रता और सही क्रम से ही होती है।





