काशीपुर। सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में जब भी जनप्रतिनिधियों की भूमिका की बात होती है, तो हालिया दिनों में महापौर दीपक बाली का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाने लगा है। वर्षों से जिस समस्या को आम जनमानस नियति मानकर स्वीकार करता आया था, उसे जिस तरह महज दो दिनों के भीतर स्थायी समाधान में बदल दिया गया, उसने यह साबित कर दिया कि यदि नेतृत्व इच्छाशक्ति से भरा हो तो दशकों पुरानी परेशानियां भी इतिहास बन सकती हैं। ढेला पुल और बेलजूड़ी क्षेत्र से नगर में प्रवेश करने वाले शिव भक्तों को हर वर्ष अंधेरे, असुविधा और दुर्घटनाओं के खतरे का सामना करना पड़ता था, लेकिन इस बार का दृश्य पूरी तरह बदला हुआ नजर आ रहा है। नगर में प्रवेश करते ही रोशनी से जगमगाता मार्ग न केवल शिव भक्तों को राहत दे रहा है, बल्कि काशीपुर की सकारात्मक छवि को भी दूर-दूर तक पहुंचा रहा है, जिसे जनता लंबे समय से देखना चाहती थी।
शिवरात्रि महापर्व के दौरान उत्तराखंड ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के भी हजारों शिव भक्त कांवर लेकर काशीपुर क्षेत्र से होकर गुजरते हैं। यह यात्रा आस्था, तपस्या और श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है, जिसमें कांवरिये कई किलोमीटर नंगे पांव चलकर भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए आगे बढ़ते हैं। ऐसे में ढेला पुल जैसे संवेदनशील स्थान पर रोशनी की व्यवस्था न होना हमेशा चिंता का विषय रहा। अंधेरे के कारण न केवल कांवरियों को कठिनाई होती थी, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी यह मार्ग जोखिम भरा बन जाता था। वर्षों से स्थानीय लोग और श्रद्धालु इस समस्या को लेकर जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाते रहे, लेकिन हर बार आश्वासन के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता था। इस बार परिस्थितियां बदलीं, जब महापौर दीपक बाली ने इसे केवल शिकायत नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना से जुड़ा विषय मानते हुए स्वयं संज्ञान लिया।
महापौर दीपक बाली ने जैसे ही यह देखा कि ढेला पुल और उसके आसपास के क्षेत्र में प्रकाश की समुचित व्यवस्था नहीं है, उन्होंने बिना देर किए समाधान की दिशा में कदम बढ़ाए। पिछली बार समय की कमी और तात्कालिक जरूरत को देखते हुए उन्होंने अपने निजी खर्च से जनरेटर के माध्यम से पुल पर लाइटें लगवाई थीं, जिससे शिव भक्तों और स्थानीय लोगों को तत्काल राहत मिली थी। उस व्यवस्था से यह भी स्पष्ट हो गया था कि समस्या का समाधान संभव है, बस इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। इस अनुभव को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष उन्होंने अस्थायी व्यवस्था की जगह स्थायी समाधान का निर्णय लिया। नगर निगम के माध्यम से लगभग दो लाख रुपये की लागत से पूरे मार्ग पर बिजली के खंभे लगवाए गए और उन पर हाई मास्क लाइटें स्थापित की गईं, ताकि भविष्य में किसी भी पर्व या सामान्य दिनों में अंधेरे की समस्या दोबारा न उत्पन्न हो।
ढेला पुल पर स्थापित की गई यह नई प्रकाश व्यवस्था केवल तकनीकी काम नहीं थी, बल्कि यह जनता के प्रति जवाबदेही और संवेदनशीलता का प्रतीक बन गई। महापौर दीपक बाली स्वयं मौके पर पहुंचे और खड़े होकर यह सुनिश्चित किया कि सभी हाई मास्क लाइटें पूरी क्षमता से जल रही हैं। उनका यह व्यवहार इस बात का प्रमाण है कि वे केवल आदेश देने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि कार्य की गुणवत्ता और प्रभावशीलता को स्वयं परखते हैं। जब नगर के सर्वोच्च जनप्रतिनिधि खुद मैदान में उतरकर व्यवस्था की जांच करते हैं, तो प्रशासनिक अमले में भी जिम्मेदारी और तत्परता स्वतः बढ़ जाती है। यही कारण है कि इस बार ढेला पुल पर रोशनी की व्यवस्था को लेकर किसी प्रकार की शिकायत सामने नहीं आई, बल्कि चारों ओर से सराहना की आवाजें सुनाई देने लगीं।

इस कार्य का प्रभाव केवल शिव भक्तों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि काशीपुर की आम जनता ने भी इसे राहत के रूप में अनुभव किया। वर्षों से जिस पुल को लोग अंधेरे और खतरे के रूप में जानते थे, वही पुल अब रात के समय भी सुरक्षित और सुगम दिखाई देने लगा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इससे दुर्घटनाओं की आशंका में भारी कमी आई है और रात के समय आवागमन भी पहले की तुलना में कहीं अधिक सहज हो गया है। खास बात यह रही कि इस पहल ने यह संदेश भी दिया कि धार्मिक आस्था और नागरिक सुविधा एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और दोनों का सम्मान करना एक जिम्मेदार नेतृत्व की पहचान होती है। महापौर दीपक बाली की इस सोच ने काशीपुर में विकास और संवेदनशीलता के नए मानक स्थापित किए हैं।
महापौर दीपक बाली ने केवल प्रकाश व्यवस्था तक ही अपने प्रयासों को सीमित नहीं रखा, बल्कि शिव भक्तों की यात्रा को पूरी तरह सुविधाजनक बनाने के लिए अन्य पहलुओं पर भी ध्यान दिया। उन्होंने निर्देश दिए कि जिन मार्गों से कांवरिये गुजरते हैं, वहां सड़क की सफाई और मरम्मत की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि नंगे पांव चलने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की चोट या परेशानी न हो। नगर निगम की टीमें लगातार सफाई कार्य में जुटी हुई हैं और उन स्थानों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जहां शिव भक्तों के लिए भंडारे आयोजित होते हैं। महापौर का स्पष्ट कहना है कि काशीपुर में आने वाला हर शिव भक्त नगर का अतिथि है और उसकी सेवा करना नगर प्रशासन का कर्तव्य है।
यह उल्लेखनीय है कि महापौर दीपक बाली केवल पद की जिम्मेदारी के कारण ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आस्था और सामाजिक दायित्व के भाव से भी शिव भक्तों की सेवा में सक्रिय रहते हैं। जसपुर रोड से बेलजूड़ी की ओर मुड़ते ही तिकोणिया क्षेत्र में पिछले कई वर्षों से लगने वाले भंडारे में वे निरंतर सहयोग करते आ रहे हैं। इस सेवा कार्य में संजीवनी हॉस्पिटल परिवार का भी विशेष योगदान रहता है, जो हर वर्ष श्रद्धालुओं के लिए भोजन और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं में सहयोग करता है। महापौर स्वयं भी भंडारे में पहुंचकर शिव भक्तों की सेवा करते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनके लिए यह कार्य केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि आस्था और मानवीय मूल्यों से जुड़ा हुआ है।
नगर में इस स्थायी प्रकाश व्यवस्था के बाद शिव भक्तों और स्थानीय नागरिकों की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं। लोगों का कहना है कि जो काम दशकों में नहीं हो सका, वह महज दो दिनों के भीतर संभव हो गया, और यह केवल इसलिए संभव हुआ क्योंकि महापौर दीपक बाली ने इसे प्राथमिकता के साथ लिया। जनता का मानना है कि यदि इसी तरह हर समस्या को गंभीरता और संवेदनशीलता से देखा जाए, तो काशीपुर को एक आदर्श नगर बनने से कोई नहीं रोक सकता। सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय चर्चाओं तक, इस कार्य की सराहना हो रही है और महापौर के प्रति विश्वास और मजबूत होता दिखाई दे रहा है।

काशीपुर की राजनीति में यह उदाहरण लंबे समय तक याद रखा जाएगा कि किस तरह काम की राजनीति ने दिखावे और वादों की राजनीति को पीछे छोड़ दिया। महापौर दीपक बाली ने यह साबित कर दिया कि जनप्रतिनिधि वही होता है, जो जनता की तकलीफ को अपनी तकलीफ समझे और समाधान के लिए खुद आगे आए। ढेला पुल पर लगी हाई मास्क लाइटें अब केवल बिजली के उपकरण नहीं हैं, बल्कि वे उस सोच का प्रतीक बन गई हैं, जिसमें आस्था, सुरक्षा और विकास एक साथ चलते हैं। शिव भक्त जब रोशनी से जगमगाते मार्ग से गुजरते हैं, तो उनके मन में न केवल भगवान शिव के प्रति श्रद्धा होती है, बल्कि उस नगर के प्रति भी सम्मान का भाव जागता है, जिसने उनकी यात्रा को सुरक्षित और सहज बनाया।
अंततः यह कहा जा सकता है कि महापौर दीपक बाली द्वारा किया गया यह कार्य काशीपुर के इतिहास में एक सकारात्मक अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। यह पहल आने वाले समय में अन्य जनप्रतिनिधियों के लिए भी प्रेरणा बनेगी कि किस तरह छोटी-सी दिखने वाली समस्या भी यदि सही दृष्टिकोण से देखी जाए, तो उसका समाधान बड़े प्रभाव के साथ सामने आ सकता है। जनता और शिव भक्तों की ओर से मिल रही सराहना इस बात का प्रमाण है कि जब नीयत साफ हो और उद्देश्य जनहित हो, तो परिणाम स्वयं बोलने लगते हैं। काशीपुर आज जिस रोशनी में नहाया हुआ दिखाई दे रहा है, वह केवल लाइटों की नहीं, बल्कि भरोसे और संवेदनशील नेतृत्व की रोशनी है, जिसने पूरे नगर को नई दिशा देने का काम किया है।





