उधम सिंह नगर जिले में श्रद्धा और उत्साह का अद्भुत संगम उस समय देखने को मिला, जब काशीपुर नगर में भगवान महर्षि वाल्मीकि जी महाराज का प्रकट दिवस भव्यता और भक्ति के साथ मनाया गया। नगर की गलियों और मार्गों में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी, हर ओर जयकारों और बैंड बाजों की गूंज से वातावरण दिव्यता से भर उठा। इस वर्ष भी वाल्मीकि समाज के तत्वावधान में निकाली गई विशाल शोभायात्रा ने जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। मोहल्ला महेशपुरा स्थित श्री वाल्मीकि धर्मशाला से प्रारंभ हुई यह शोभायात्रा जसपुर बस अड्डा, रेलवे स्टेशन रोड, महाराणा प्रताप चौक, कोतवाली रोड, नगर निगम रोड, मुख्य बाजार, मोहल्ला किला, गंगेबाबा चौक, मुंशीराम का चौराहा, मुल्तानी मोड़, रतन सिनेमा रोड, पोस्ट ऑफिस रोड से होती हुई पुनः श्री वाल्मीकि धर्मशाला पहुंचकर संपन्न हुई। मार्ग में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर शोभायात्रा का भव्य स्वागत किया, जिससे पूरा नगर भक्तिमय और उल्लासपूर्ण नजर आया।
भक्ति और सांस्कृतिक रंगों से सजी इस यात्रा में चार दर्जन से अधिक सजीव और आकर्षक झांकियां शामिल थीं, जिन्होंने सभी का मन मोह लिया। हनुमान जी, एकलव्य, भारत माता, राधा-कृष्ण नृत्य, नाग-नागिन नृत्य, मां नंदा-सुनंदा, महाकाल बाबा के साथ अघोरी, मां काली का अखाड़ा, शिव तांडव, मां महाकाली और मरघट काली की झांकियों ने भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके अतिरिक्त कुल देवियों का डोला, साहिबा का नृत्य, राम दरबार, शेरावाली माता, बाला जी महाराज, भगवान शंकर की बारात और डीजे झांकियों की धुनों ने माहौल को और जीवंत बना दिया। शोभायात्रा के अंत में महर्षि वाल्मीकि महाराज का डोला सबसे पीछे चलते हुए पूरे नगर में दिव्यता और ज्ञान का संदेश दे रहा था। मार्ग पर उपस्थित श्रद्धालु भगवान वाल्मीकि के जयघोषों से वातावरण को गूंजायमान करते रहे और इस ऐतिहासिक आयोजन की भव्यता हर दिशा में महसूस की गई।
इस शोभायात्रा के मुख्य आयोजक जितेंद्र देवांतक ने बताया कि बीते दिन धर्मशाला परिसर में वाल्मीकि समाज के सदस्यों ने पूजा-अर्चना के साथ सत्संग और प्रवचन आयोजित कर भगवान महर्षि वाल्मीकि जी महाराज का प्रकट दिवस मनाया था। उन्होंने कहा कि आज की यह शोभायात्रा भगवान के उपदेशों और उनकी जीवन दृष्टि को जनमानस तक पहुंचाने का माध्यम है। उनका कहना था कि महर्षि वाल्मीकि ने मानवता, समानता और करुणा के आदर्शों को अपने जीवन में स्थापित किया और समाज को पाखंडों से दूर रहकर ज्ञान के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। देवांतक ने इस अवसर पर कहा कि वाल्मीकि जयंती को ‘जन्मोत्सव’ के रूप में नहीं बल्कि ‘वाल्मीकि पावन प्रकृति दिवस’ के रूप में मनाया जाना चाहिए, क्योंकि परमात्मा वाल्मीकि का जन्म किसी ग्रंथ में वर्णित नहीं है, वे तो ज्ञान और आत्मबोध के स्वरूप के रूप में प्रकट हुए थे।
जितेंद्र देवांतक ने आगे बताया कि यदि “चर्षणी माता” का उल्लेख मिलता है, तो उसका अर्थ जलाशय या तालाब है, जो शुद्धता और सृजन का प्रतीक माना गया है। उन्होंने कहा कि भगवान वाल्मीकि का प्रकट होना ब्रह्मा के तत्वज्ञान और आत्ममोक्ष की प्रेरणा से जुड़ा है। जब माता सीता को ब्रह्मा के आदेश से वनवास जाना पड़ा, तब उनकी प्रार्थना से ही परमात्मा वाल्मीकि का प्राकट्य हुआ। उस समय उन्होंने यह उद्घोष किया कि मोक्ष न तो यज्ञ, दान या कर्मकांडों से मिलता है, बल्कि केवल सच्चे ज्ञान से प्राप्त होता है। इसी संदेश को महर्षि वाल्मीकि ने ‘रामायण’ के माध्यम से समाज तक पहुंचाया। उन्होंने यह भी कहा कि ऋषि वाल्मीकि ने सदैव पाखंड और आडंबरों का विरोध किया और ज्ञान को ही सच्चे धर्म का स्वरूप बताया।
भक्तों से घिरी शोभायात्रा जब नगर के मुख्य मार्गों से गुजर रही थी, तब हर घर और छत से पुष्पवृष्टि हो रही थी। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सभी इस दिव्य आयोजन का हिस्सा बनते दिखाई दिए। वातावरण में ‘जय वाल्मीकि’, ‘महर्षि वाल्मीकि अमर रहें’ जैसे उद्घोष गूंज रहे थे। डीजे की तालों पर नृत्य करते युवाओं और झांकियों के अद्भुत प्रदर्शन ने इस आयोजन को अविस्मरणीय बना दिया। पूरा नगर मानो एकता, समानता और भक्ति के रंगों में रंगा हुआ प्रतीत हो रहा था। देवांतक ने कहा कि वाल्मीकि जी ने यह सिखाया कि सच्चा धर्म वह है जो सबमें मानवता, करुणा और ज्ञान की भावना उत्पन्न करे। उन्होंने बताया कि उनके जीवन का हर पहलू यह प्रेरणा देता है कि किसी भी समाज की प्रगति का आधार केवल शिक्षा और समानता हो सकती है।
आयोजन के समापन पर जितेंद्र देवांतक ने कहा कि आज भी समाज में जिस जाति पर धार्मिक बंधन और बोझ लादे गए, वही सबसे पहले भगवान वाल्मीकि की जयंती को मनाने में अग्रसर है, जबकि वाल्मीकि जी ने स्वयं सभी भेदभावों का विरोध किया था। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब पूरे देश में वाल्मीकि पावन प्रकृति दिवस को प्रत्येक धर्म, जाति और वर्ग के लोग समान भाव से मनाएं। ऐसा करने से ज्ञान, समानता और आत्मबोध की वह ज्योति हर हृदय में प्रज्वलित होगी, जिसकी कल्पना स्वयं महर्षि वाल्मीकि ने की थी। शोभायात्रा के समापन पर श्रद्धालुओं ने प्रभु वाल्मीकि के जयकारे लगाए और इस आयोजन को जीवन का अविस्मरणीय क्षण बताया, जिसने एक बार फिर यह संदेश दिया कि सच्ची भक्ति वही है, जो समाज को एक सूत्र में बांध दे।



