रामनगर। केंद्र सरकार द्वारा रविवार को संसद में पेश किए गए बजट 2026 को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया है। इसी कड़ी में युवा कांग्रेस के नेता एडवोकेट फैजुल हक ने इस बजट को आम जनता की उम्मीदों पर पानी फेरने वाला दस्तावेज़ बताया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने एक बार फिर बड़े-बड़े आंकड़ों, प्रतिशतों और योजनाओं की लंबी सूची के माध्यम से एक आकर्षक तस्वीर पेश करने की कोशिश की है, लेकिन जब इस बजट को ज़मीनी हकीकत के चश्मे से देखा जाता है, तो यह आम आदमी की परेशानियों को और गहरा करता दिखाई देता है। उनके अनुसार यह बजट केवल काग़ज़ों और भाषणों तक सीमित है, जबकि देश का युवा, छोटा व्यापारी और मध्यम वर्ग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लगातार बढ़ते आर्थिक दबाव से जूझ रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस बजट में न तो राहत है, न ही भविष्य के लिए कोई भरोसेमंद रास्ता दिखाई देता है, बल्कि यह निराशा और असंतोष को बढ़ाने वाला साबित हुआ है।
युवा कांग्रेस नेता एडवोकेट फैजुल हक का कहना है कि बजट 2026 का सबसे बड़ा नकारात्मक पहलू वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी को लेकर सरकार का रवैया है। उन्होंने याद दिलाया कि जीएसटी लागू हुए सात वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन इसके बावजूद इसे आज तक सरल और व्यापार-अनुकूल नहीं बनाया जा सका है। छोटे और मध्यम व्यापारियों को आज भी जटिल नियमों, तकनीकी दिक्कतों और बार-बार बदलते प्रावधानों से जूझना पड़ रहा है। एक छोटे व्यापारी को साल भर में बीस से अधिक रिटर्न दाखिल करने पड़ते हैं, जिससे उसका समय, ऊर्जा और संसाधन कर अनुपालन में ही खर्च हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार बार-बार “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” की बात करती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर जीएसटी ने व्यापार को आसान नहीं, बल्कि और अधिक बोझिल बना दिया है, जो बजट 2026 में भी साफ दिखाई देता है।
एडवोकेट फैजुल हक ने जीएसटी संग्रह के आंकड़ों पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार हर महीने औसतन एक लाख साठ से एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपये का जीएसटी संग्रह हो रहा है, जो अपने आप में एक बहुत बड़ी राशि है। इसके बावजूद सरकार ने न तो टैक्स स्लैब कम करने की कोई ठोस पहल की और न ही आवश्यक वस्तुओं को सस्ता करने के लिए कोई बड़ा कदम उठाया। उन्होंने कहा कि आम आदमी महंगाई से त्रस्त है और उम्मीद कर रहा था कि बजट के ज़रिये उसे कुछ राहत मिलेगी, लेकिन सरकार ने कर संरचना में किसी तरह की नरमी नहीं दिखाई। इससे यह संदेश जाता है कि सरकार की प्राथमिकता अधिक से अधिक वसूली है, न कि आम नागरिक की जेब पर पड़ने वाले बोझ को कम करना। उनके अनुसार जीएसटी के नाम पर जनता से लगातार अधिक पैसा लिया जा रहा है, लेकिन बदले में उसे सुविधाएँ या राहत नहीं मिल पा रही हैं।
व्यापारियों की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक इनपुट टैक्स क्रेडिट यानी आईटीसी रिफंड में होने वाली देरी को लेकर भी एडवोकेट फैजुल हक ने बजट 2026 को निराशाजनक बताया। उन्होंने कहा कि कई मामलों में व्यापारियों को महीनों तक रिफंड का इंतज़ार करना पड़ता है, जिससे उनकी कार्यशील पूंजी बुरी तरह प्रभावित होती है। छोटे और मध्यम स्तर के कारोबारी पहले ही सीमित संसाधनों के साथ काम कर रहे हैं, ऐसे में जब उनका पैसा सरकार के पास फंसा रहता है तो वे न तो नए निवेश कर पाते हैं और न ही रोज़मर्रा के खर्च आसानी से उठा पाते हैं। उन्होंने कहा कि बजट में इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस और समयबद्ध व्यवस्था नहीं दिखाई देती, जिससे यह साफ होता है कि सरकार व्यापारियों की वास्तविक चुनौतियों को समझने में विफल रही है।
बेरोज़गारी के मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए युवा कांग्रेस नेता एडवोकेट फैजुल हक ने कहा कि बजट 2026 ने देश के युवाओं को गहरी निराशा दी है। उनके अनुसार देश में बेरोज़गारी दर आज भी लगभग सात से आठ प्रतिशत के आसपास बनी हुई है और करोड़ों युवा रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं। उन्होंने कहा कि हर साल लाखों युवा शिक्षा पूरी कर श्रम बाज़ार में प्रवेश करते हैं, लेकिन उनके लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं हैं। बजट से यह उम्मीद की जा रही थी कि इसमें प्रत्यक्ष रोज़गार सृजन के लिए ठोस योजनाएँ, स्पष्ट लक्ष्य और निश्चित समयसीमा दिखाई देगी, लेकिन ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आता। केवल कौशल विकास, स्टार्ट-अप या आत्मनिर्भरता जैसे शब्दों का दोहराव युवाओं के भविष्य को सुरक्षित नहीं कर सकता।

एडवोकेट फैजुल हक ने यह भी कहा कि सरकार रोजगार के नाम पर अक्सर अप्रत्यक्ष उपायों और दीर्घकालिक वादों की बात करती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर तुरंत असर दिखाने वाली योजनाओं का अभाव है। उन्होंने कहा कि बजट 2026 में न तो सरकारी भर्तियों को लेकर कोई स्पष्ट रोडमैप है और न ही निजी क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने के लिए कोई ठोस प्रोत्साहन पैकेज सामने आया है। इससे यह संदेश जाता है कि सरकार बेरोज़गारी की गंभीरता को स्वीकार करने के बजाय उससे मुंह मोड़ रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि युवाओं को समय रहते अवसर नहीं मिले, तो इसका असर केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता पर भी पड़ेगा, जिसकी ज़िम्मेदारी सरकार की होगी।
महंगाई के मोर्चे पर भी बजट 2026 को लेकर एडवोकेट फैजुल हक ने कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि देश में खुदरा महंगाई दर लगभग पाँच से छह प्रतिशत के आसपास बनी हुई है, जिसका सीधा असर आम परिवारों की रसोई पर पड़ रहा है। रोज़मर्रा की ज़रूरतों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और आम आदमी की आय उसके अनुरूप नहीं बढ़ पा रही है। उन्होंने कहा कि खाद्य पदार्थ, रसोई गैस, दवाइयाँ और अन्य आवश्यक सेवाएँ आम लोगों की पहुँच से धीरे-धीरे दूर होती जा रही हैं। बजट से यह उम्मीद थी कि सरकार महंगाई पर नियंत्रण के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाएगी, लेकिन इसमें ऐसे किसी स्पष्ट उपाय की झलक नहीं मिलती।
युवा कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि महंगाई केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह आम नागरिक के जीवन स्तर से जुड़ा हुआ सवाल है। जब दूध, दाल, सब्ज़ी और रसोई गैस महंगी होती है, तो उसका असर सीधे परिवार के बजट पर पड़ता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार महंगाई को नियंत्रित करने के बजाय केवल सांख्यिकीय औसत दिखाकर स्थिति को सामान्य बताने की कोशिश कर रही है। बजट 2026 में सब्सिडी या राहत के मोर्चे पर भी कोई बड़ा ऐलान नहीं किया गया, जिससे मध्यम वर्ग और गरीब तबके को कुछ सुकून मिल सके। उनके अनुसार यह बजट महंगाई से जूझ रही जनता की व्यथा को अनदेखा करता है।
समग्र रूप से देखते हुए एडवोकेट फैजुल हक ने बजट 2026 को जीएसटी के ज़रिये अधिक वसूली, बेरोज़गारी पर चुप्पी और महंगाई पर बेबसी का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि यह बजट उन वर्गों के लिए बनाया गया प्रतीत होता है, जिनके पास पहले से संसाधन हैं, जबकि छोटे व्यापारी, युवा और आम नागरिक खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं। उनके अनुसार सरकार ने सामाजिक संतुलन और समावेशी विकास की भावना को नज़रअंदाज़ किया है। बजट में जो प्राथमिकताएँ दिखाई देती हैं, वे आम जनता की रोज़मर्रा की ज़रूरतों से मेल नहीं खातीं, जिससे असंतोष का माहौल बनना स्वाभाविक है।
अंत में युवा कांग्रेस नेता एडवोकेट फैजुल हक ने स्पष्ट कहा कि उनकी पार्टी और वे स्वयं इस बजट को आम जनता, छोटे व्यापारियों और युवाओं के हितों के खिलाफ मानते हैं। उन्होंने कहा कि देश को ऐसे बजट की ज़रूरत है, जो केवल आंकड़ों की बाज़ीगरी न होकर ज़मीनी सच्चाइयों पर आधारित हो। जब तक जीएसटी को सरल नहीं बनाया जाता, बेरोज़गारी के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते और महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया जाता, तब तक बजट आम लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सकता। उन्होंने सरकार से मांग की कि वह आत्ममंथन करे और भविष्य की नीतियों में जनता की आवाज़ को प्राथमिकता दे, ताकि देश का आर्थिक विकास वास्तव में सभी के लिए लाभकारी बन सके।





