रामनगर। केंद्र सरकार द्वारा रविवार को संसद में पेश किए गए बजट 2026 के बाद देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों ही मोर्चों पर प्रतिक्रियाओं का सिलसिला तेज़ हो गया है। बजट को लेकर जहां सत्तापक्ष इसे विकासोन्मुखी और सुधारवादी बता रहा है, वहीं विपक्ष और सामाजिक संगठनों की ओर से इसके जमीनी असर पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी क्रम में युवा कांग्रेस के नेता एडवोकेट फैजुल हक ने बजट 2026 को छोटे व्यापारियों के लिए चुनौतीपूर्ण बताते हुए कहा कि यह बजट टैक्स सिस्टम को सरल करने के बजाय उसे और जटिल बनाता हुआ दिखाई देता है। उनका कहना है कि बजट के भीतर छिपे प्रावधानों से छोटे दुकानदारों पर अप्रत्यक्ष रूप से अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है, जिससे पहले से संघर्ष कर रहे स्थानीय व्यापार को और मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। एडवोकेट फैजुल हक ने स्पष्ट किया कि यह बजट कागज़ों में भले ही आधुनिक और डिजिटल दिखता हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत में यह छोटे व्यापारी के लिए “छोटा व्यापार, बड़ा दबाव” जैसी स्थिति पैदा कर रहा है, जो आने वाले समय में गंभीर सामाजिक और आर्थिक परिणाम ला सकती है।
बजट 2026 में डिजिटल ट्रैकिंग, ई-इनवॉइस, यूपीआई मॉनिटरिंग और जीएसटी अनुपालन को और अधिक सख़्त बनाने के संकेत साफ़ दिखाई देते हैं। एडवोकेट फैजुल हक के अनुसार, सरकार का यह तर्क है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और टैक्स चोरी रुकेगी, लेकिन छोटे दुकानदार की वास्तविक स्थिति को इसमें नज़रअंदाज़ कर दिया गया है। कस्बों और मोहल्लों में काम करने वाले व्यापारी न तो महंगे अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर खरीद सकते हैं और न ही हर महीने चार्टर्ड अकाउंटेंट रखने की स्थिति में होते हैं। एडवोकेट फैजुल हक कहते है कि कई दुकानदार आज भी सीमित साधनों और अनुभव के आधार पर कारोबार चला रहे हैं। ऐसे में रिटर्न फाइल करने में ज़रा-सी चूक पर नोटिस, जुर्माना और ब्याज का खतरा बना रहता है। नकद लेन-देन पर लगातार निगरानी और उसकी सीमाओं के कारण उनकी घूमती पूँजी पर सीधा असर पड़ता है। परिणामस्वरूप, व्यापार बढ़ाने के बजाय दुकानदार अपना अधिकांश समय काग़ज़ी कार्यवाही और नियमों को समझने में गंवाने को मजबूर हो जाता है, जिससे उसका आत्मविश्वास और व्यवसायिक क्षमता दोनों प्रभावित होती हैं।
एडवोकेट फैजुल हक का कहना है कि बजट को लेकर यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि अप्रत्यक्ष रूप से इसका सबसे अधिक लाभ बड़े कॉरपोरेट और ऑनलाइन कंपनियों को मिलता नज़र आ रहा है। भले ही सरकार “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” की बात करे, लेकिन एडवोकेट फैजुल हक का कहना है कि यह सुविधा ज़मीनी स्तर पर केवल बड़े रिटेल चेन, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और कॉरपोरेट डिस्काउंट मॉडल तक ही सीमित रहती है। छोटे दुकानदार न तो भारी छूट देने की स्थिति में होते हैं और न ही मुफ्त डिलीवरी जैसी सुविधाएँ दे सकते हैं। एडवोकेट फैजुल हक का कहना है कि बड़े खिलाड़ी लंबे समय तक घाटे में बेचकर बाज़ार पर कब्ज़ा करने की रणनीति अपनाते हैं, जबकि छोटे व्यापारी के लिए ऐसा करना असंभव है। इसका सीधा असर यह होता है कि ग्राहक धीरे-धीरे स्थानीय दुकानों से दूर होकर बड़े प्लेटफॉर्म की ओर आकर्षित होने लगते हैं। नतीजतन, मोहल्ले और कस्बों की दुकानें धीरे-धीरे अपना ग्राहक आधार खोती जाती हैं और बाज़ार पर नियंत्रण कुछ गिने-चुने बड़े कारोबारी समूहों के हाथ में सिमटता चला जाता है।
महँगाई और बढ़ते खर्च का दबाव भी बजट 2026 के बाद छोटे व्यापारियों के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है। एडवोकेट फैजुल हक ने बताया कि बजट के बाद जिन मदों में लागत बढ़ने की आशंका है, उनमें बिजली, परिवहन, पैकेजिंग, किराया और मज़दूरी प्रमुख हैं। ये सभी खर्च सीधे तौर पर छोटे दुकानदार के मुनाफ़े को प्रभावित करते हैं। समस्या यह है कि छोटे व्यापारी के पास अपने उत्पादों या सेवाओं की कीमतें मनचाहे ढंग से बढ़ाने की आज़ादी नहीं होती, क्योंकि ग्राहक पहले से ही महँगाई के कारण कम खर्च कर रहा है। ऐसे में दुकानदार कीमत बढ़ाता है तो ग्राहक खोने का डर रहता है और कीमत नहीं बढ़ाता तो मुनाफ़ा समाप्त हो जाता है। इस दोहरी मार का परिणाम यह होता है कि बिक्री का स्तर लगभग वही रहता है, लेकिन लाभ शून्य या कई बार घाटे में बदल जाता है, जिससे व्यापार को लंबे समय तक चलाना मुश्किल हो जाता है।

बजट में घोषित सस्ते और आसान ऋण की योजनाओं पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। एडवोकेट फैजुल हक के अनुसार, हर बजट में एमएसएमई लोन, क्रेडिट गारंटी और वित्तीय सहायता की बड़ी-बड़ी घोषणाएँ की जाती हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे काफी अलग है। बैंक ऋण देने से पहले गारंटी, सिबिल स्कोर और विस्तृत बैलेंस शीट की मांग करते हैं, जो अधिकांश छोटे दुकानदारों के पास उपलब्ध नहीं होती। कई छोटे व्यापारी आज भी अनौपचारिक तरीके से कारोबार करते हैं, जहां आय-व्यय का पूरा रिकॉर्ड रखना संभव नहीं हो पाता। इसके अलावा, ऋण आवेदन की प्रक्रिया जटिल और लंबी होने के कारण छोटे दुकानदार हतोत्साहित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, बजट में घोषित धनराशि बड़े कारोबारियों तक तो पहुँच जाती है, लेकिन छोटा व्यापारी मजबूरी में साहूकारों और अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर रहता है, जहां ब्याज की दरें अत्यधिक होती हैं और आर्थिक संकट और गहराता चला जाता है।
डिजिटल इंडिया को तेज़ करने की दिशा में बजट 2026 कई नए कदम उठाता हुआ दिखाई देता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू छोटे दुकानदारों के लिए चिंता का कारण बन रहा है। एडवोकेट फैजुल हक ने कहा कि यह मान लेना कि हर दुकानदार तकनीक में दक्ष है, एक बड़ी भूल है। खासकर बुज़ुर्ग व्यापारी डिजिटल सिस्टम से डरते हैं और नई तकनीक अपनाने में उन्हें समय और प्रशिक्षण दोनों की ज़रूरत होती है। सर्वर फेल होने, तकनीकी गड़बड़ी या नेटवर्क समस्या का सीधा नुकसान व्यापारी को उठाना पड़ता है, जबकि गलती उसकी नहीं होती। डिजिटल भुगतान या ऑनलाइन सिस्टम में आई थोड़ी सी रुकावट से पूरा दिन का कारोबार प्रभावित हो सकता है। ऐसे में जो व्यापारी डिजिटल व्यवस्था के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते, उनके लिए बाज़ार में टिके रहना मुश्किल होता जा रहा है और वे धीरे-धीरे प्रतिस्पर्धा से बाहर होते चले जाते हैं।
सरकारी खरीद और योजनाओं में छोटे व्यापारियों की भागीदारी को लेकर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए गए हैं। एडवोकेट फैजुल हक के अनुसार, सरकारी टेंडर, सप्लाई और विभिन्न योजनाओं की शर्तें अक्सर इस तरह तय की जाती हैं कि वे बड़ी कंपनियों के अनुकूल होती हैं। सुरक्षा जमा की राशि अधिक होती है, तकनीकी शर्तें जटिल होती हैं और भुगतान में देरी आम बात है। इन परिस्थितियों में छोटे दुकानदार न तो टेंडर प्रक्रिया में भाग ले पाते हैं और न ही सरकारी आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बन पाते हैं। परिणामस्वरूप, वे सरकारी सिस्टम से धीरे-धीरे कटते चले जाते हैं। इससे न केवल उनके व्यवसाय के अवसर सीमित होते हैं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि छोटे व्यापारियों की भागीदारी से ही स्थानीय स्तर पर रोज़गार और आय का सृजन होता है।
बजट 2026 के सामाजिक प्रभावों को लेकर भी एडवोकेट फैजुल हक ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि जब छोटे कारोबार पर लगातार दबाव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर समाज पर पड़ता है। कई मामलों में दुकानों को बंद करना पड़ता है, जिससे दो से चार लोगों की नौकरी एक साथ चली जाती है। छोटे दुकानदार का परिवार कर्ज़ के बोझ तले दब जाता है और आर्थिक असुरक्षा बढ़ जाती है। रोजगार के अवसर कम होने से युवाओं का पलायन तेज़ होता है और सामाजिक असंतोष की स्थिति पैदा होती है। स्थानीय बाज़ार जो कभी सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करते थे, धीरे-धीरे अपनी रौनक खोने लगते हैं। इससे न केवल आर्थिक ढांचा कमजोर होता है, बल्कि सामाजिक ताना-बाना भी प्रभावित होता है, जिसका असर लंबे समय तक महसूस किया जाता है।
एडवोकेट फैजुल हक ने बजट 2026 की सबसे बड़ी कमी के रूप में “नीतियाँ एक जैसी, हालात अलग” वाली सोच को बताया है। उनका कहना है कि एक ही नियम, एक ही टैक्स और एक ही सिस्टम सभी पर समान रूप से लागू करना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि छोटे और बड़े कारोबारी की परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं होतीं। बड़े कारोबारी संसाधनों, विशेषज्ञों और पूंजी की मदद से नियमों का पालन कर लेते हैं, जबकि छोटा दुकानदार हर नए प्रावधान के साथ संघर्ष करता है। जब तक नीतियाँ ज़मीनी सच्चाई और छोटे व्यापारियों की क्षमता को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जाएँगी, तब तक छोटा दुकानदार इस व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी बना रहेगा। उन्होंने सरकार से मांग की कि बजट और आर्थिक नीतियों को बनाते समय छोटे व्यापारियों की आवाज़ को भी गंभीरता से सुना जाए, ताकि विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक समान रूप से पहुँच सके।





