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बजट से पहले उत्तराखंड का आर्थिक बहीखाता कमाई खर्च और सरकार की असली वित्तीय तस्वीर

केंद्र से मिलने वाली मदद, टैक्स और नॉन टैक्स रेवेन्यू, बढ़ता वेतन-पेंशन बोझ और धामी सरकार के आखिरी बजट सत्र से पहले उत्तराखंड की आर्थिक स्थिति का गहराई से विश्लेषण।

देहरादून(सुनील कोठारी)। बजट से पहले उत्तराखंड का बहीखाता एक बार फिर राज्य की आर्थिक स्थिति और सरकार की प्राथमिकताओं को समझने का अहम आधार बनकर सामने आया है, क्योंकि हर साल की तरह इस बार भी आय और व्यय का पूरा गणित न केवल सरकार की योजनाओं बल्कि आम जनता की उम्मीदों से भी जुड़ा हुआ है। राज्य का बजट केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि यह उस दिशा को दर्शाता है, जिसमें सरकार अगले एक वर्ष तक चलने वाली नीतियों और कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने का इरादा रखती है। उत्तराखंड जैसे भौगोलिक रूप से संवेदनशील और सीमित संसाधनों वाले राज्य में बजट का संतुलन साधना किसी चुनौती से कम नहीं माना जाता। एक तरफ विकास कार्यों की जरूरत है तो दूसरी तरफ कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, प्रशासनिक खर्च और आपदा प्रबंधन जैसे अनिवार्य मद हैं, जिन पर बड़ी राशि खर्च होती है। ऐसे में बजट से पहले राज्य का बहीखाता यह साफ करता है कि सरकार को पैसा कहां से मिलता है और उसे किन क्षेत्रों में खर्च करना मजबूरी बन जाता है।

आर्थिक नजरिये से देखा जाए तो उत्तराखंड सरकार की आय के मुख्य स्रोत टैक्स और नॉन टैक्स रेवेन्यू पर आधारित हैं, जिनमें केंद्र सरकार से मिलने वाली सहायता की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। राज्य को टैक्स के रूप में जीएसटी में हिस्सेदारी, राज्य कर और अन्य करों से आय होती है, जबकि नॉन टैक्स रेवेन्यू के अंतर्गत विभिन्न सेवाओं से मिलने वाली फीस, लाइसेंस शुल्क, रॉयल्टी और अन्य आय शामिल रहती है। इसके अलावा केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदान और सहायता राज्य की वित्तीय स्थिति को संभालने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड को केंद्र से लगभग 17000 करोड़ रुपये की राशि मिलती है, जो राज्य के बजट की रीढ़ मानी जाती है। इस राशि से कई महत्वपूर्ण योजनाएं और विकास कार्य पूरे किए जाते हैं, जिनके बिना राज्य की आर्थिक गति बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।

राज्य की कमाई के नॉन टैक्स रेवेन्यू हिस्से को अगर गहराई से देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि उत्तराखंड के पास संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि चुनौती उनके संतुलित उपयोग की है। पर्यटन, जल विद्युत परियोजनाएं, वन संसाधन, खनिज रॉयल्टी और विभिन्न विभागों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं से राज्य को नॉन टैक्स रेवेन्यू प्राप्त होता है। पहाड़ी राज्य होने के कारण उत्तराखंड में प्राकृतिक संसाधनों की भरपूर संभावनाएं हैं, लेकिन पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। यही कारण है कि नॉन टैक्स रेवेन्यू बढ़ाने के प्रयासों में सावधानी बरती जाती है। इसके बावजूद सरकार की कोशिश रहती है कि इस आय को धीरे-धीरे मजबूत किया जाए, ताकि केंद्र पर निर्भरता कम हो और राज्य अपने विकास कार्यों के लिए अधिक आत्मनिर्भर बन सके।

खर्च के मोर्चे पर आते ही उत्तराखंड सरकार के सामने सबसे बड़ा और स्थायी दबाव वेतन और पेंशन का दिखाई देता है, जो हर साल बढ़ता जा रहा है। राज्य में सरकारी कर्मचारियों और पेंशनधारकों की संख्या लगातार बढ़ने के कारण राजस्व खर्च का बड़ा हिस्सा इन्हीं मदों में चला जाता है। आंकड़ों के मुताबिक केवल पेंशन पर ही लगभग 8000 करोड़ रुपये खर्च होते हैं, जो अपने आप में एक बड़ी रकम है। इसके अलावा कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और अन्य प्रशासनिक खर्च भी बजट का बड़ा हिस्सा घेर लेते हैं। ऐसे में विकास कार्यों और नई योजनाओं के लिए सीमित संसाधन बचते हैं, जिससे सरकार को हर साल बजट बनाते समय कठिन फैसले लेने पड़ते हैं। विभागीय खर्च की बात करें तो उत्तराखंड सरकार के सामने सभी विभागों की जरूरतों को संतुलित करना एक बड़ी चुनौती होती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, लोक निर्माण, ग्रामीण विकास, शहरी विकास, सिंचाई और परिवहन जैसे विभागों के अपने-अपने दावे और आवश्यकताएं होती हैं। हर विभाग चाहता है कि उसे अधिक बजट मिले ताकि योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। लेकिन वित्त विभाग को कुल उपलब्ध संसाधनों के भीतर रहकर ही यह तय करना पड़ता है कि किस विभाग को कितनी राशि दी जाए। पहाड़ी इलाकों में सड़क निर्माण, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार और शिक्षा का बुनियादी ढांचा मजबूत करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहता है, लेकिन इसके साथ-साथ प्रशासनिक खर्च और रखरखाव पर भी बड़ी राशि खर्च होती है।

आपदा की दृष्टि से संवेदनशील राज्य होने के कारण उत्तराखंड के बजट में आपदा प्रबंधन का विशेष महत्व रहता है। हर साल राज्य को भूकंप, भूस्खलन, बादल फटना और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है, जिससे जन-धन की हानि होती है। ऐसे में एसडीआरएफ ग्रांट के रूप में मिलने वाली करोड़ों रुपये की सहायता राज्य के लिए बेहद अहम हो जाती है। इस ग्रांट का उपयोग राहत और बचाव कार्यों, पुनर्वास योजनाओं और आपदा से निपटने की तैयारियों को मजबूत करने में किया जाता है। बजट में इस मद के लिए पर्याप्त प्रावधान करना सरकार की प्राथमिकता में शामिल रहता है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके।

वित्तीय प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया पर रोशनी डालते हुए उत्तराखंड शासन में वित्त सचिव के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे दिलीप जावलकर ने स्पष्ट किया है कि इस समय वित्त विभाग पूरी सक्रियता के साथ बजट निर्माण की दिशा में काम कर रहा है। उनका कहना है कि बजट को संतुलित और व्यवहारिक बनाने के उद्देश्य से सभी विभागों से लगातार बातचीत की जा रही है, ताकि उनकी आवश्यकताओं, प्राथमिकताओं और प्रस्तावों को ठीक से समझा जा सके। वित्त सचिव के अनुसार, बजट केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि यह सरकार की नीतिगत सोच और भविष्य की योजनाओं का प्रतिबिंब होता है, इसलिए इसमें हर विभाग की वास्तविक जरूरतों को शामिल करना जरूरी है। उन्होंने बताया कि वित्त विभाग सभी सुझावों का गहन अध्ययन कर रहा है, जिससे विकास और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाया जा सके। दिलीप जावलकर ने यह भी उम्मीद जताई कि पूर्व वर्षों की तरह इस बार भी बजट की रूपरेखा को समयबद्ध तरीके से अंतिम रूप दे दिया जाएगा। उनके इस बयान से यह संकेत मिलता है कि सरकार बजट को लेकर पूरी तरह गंभीर है और किसी भी स्तर पर जल्दबाजी या लापरवाही नहीं बरतना चाहती।

राजनीतिक नजरिये से देखा जाए तो यह बजट सत्र धामी सरकार के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसे मौजूदा कार्यकाल का आखिरी बजट सत्र माना जा रहा है। ऐसे में सरकार के सामने यह अवसर भी है और चुनौती भी कि वह अपने पूरे कार्यकाल की नीतियों, योजनाओं और फैसलों को बजट के माध्यम से ठोस आधार दे सके। माना जा रहा है कि इस बजट में विकास योजनाओं को विशेष प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि सड़कों, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और अन्य बुनियादी ढांचे से जुड़े कार्यों को गति मिल सके। इसके साथ ही सामाजिक कल्याण से संबंधित कार्यक्रमों पर भी सरकार का फोकस रहने की संभावना है, जिससे आम जनता को सीधे लाभ मिल सके। आखिरी बजट होने के कारण सरकार यह भी ध्यान में रखेगी कि वित्तीय संतुलन बना रहे और खर्च इस तरह किया जाए कि भविष्य की सरकार पर अनावश्यक आर्थिक दबाव न पड़े। इसलिए बजट में न केवल घोषणाओं बल्कि वित्तीय अनुशासन और दीर्घकालिक सोच की भी झलक दिखाई देने की उम्मीद की जा रही है।

समग्र दृष्टि से अगर देखा जाए तो बजट से पहले उत्तराखंड का बहीखाता राज्य की आर्थिक हकीकत को पूरी स्पष्टता के साथ सामने रखता है, जिसमें अवसरों के साथ-साथ कई गंभीर चुनौतियां भी दिखाई देती हैं। एक तरफ केंद्र सरकार से मिलने वाले लगभग 17000 करोड़ रुपये और नॉन टैक्स रेवेन्यू जैसे आय के स्रोत हैं, जो राज्य की वित्तीय व्यवस्था को सहारा देते हैं, वहीं दूसरी ओर वेतन, पेंशन और विभिन्न विभागों के नियमित खर्च जैसे बड़े दायित्व सरकार पर लगातार दबाव बनाए रखते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद विकास कार्यों को आगे बढ़ाना और सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करना सरकार के लिए आसान नहीं होता। ऐसे हालात में बजट बनाते समय सबसे बड़ी परीक्षा यही होती है कि आय और व्यय के बीच संतुलन किस तरह साधा जाए। वित्त सचिव दिलीप जावलकर के नेतृत्व में तैयार हो रहा बजट इस संतुलन को कितनी मजबूती से स्थापित कर पाता है, यह आने वाले बजट सत्र में स्पष्ट हो जाएगा। यही बजट राज्य की आर्थिक दिशा और सरकार की प्राथमिकताओं को तय करने वाला अहम दस्तावेज साबित होगा।

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