काशीपुर। उत्तराखंड की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने वाले प्रमुख पर्वों में शामिल फूलदेई के पावन अवसर पर कांग्रेस महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए इस पर्व को उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग बताया। उन्होंने कहा कि पहाड़ की लोकसंस्कृति में रचे-बसे इस उत्सव का महत्व केवल एक परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति आस्था, सामाजिक सद्भाव और सामूहिक खुशहाली की भावना का जीवंत प्रतीक है। अपने संदेश में उन्होंने कहा कि सदियों से मनाया जा रहा यह पर्व प्रदेश की सांस्कृतिक आत्मा को दर्शाता है और लोगों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। उनके अनुसार उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर में ऐसे अनेक पर्व हैं जो समाज को एकसूत्र में बांधते हैं, लेकिन फूलदेई का स्थान उनमें विशेष है। उन्होंने यह भी कहा कि यह पर्व हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीना ही सच्चे अर्थों में समृद्धि का मार्ग है। समाज में बढ़ती भागदौड़ और आधुनिक जीवनशैली के बीच ऐसे लोकपर्व हमें हमारी परंपराओं और संस्कारों की याद दिलाते हैं और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का कार्य करते हैं।
पर्व के महत्व को रेखांकित करते हुए अलका पाल ने कहा कि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में सदियों से चली आ रही फूलदेई की परंपरा लोकजीवन की खुशबू समेटे हुए है। यह त्योहार केवल उत्सव नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। उन्होंने कहा कि इस दिन छोटे-छोटे बच्चे सुबह होते ही रंग-बिरंगे फूलों से भरी टोकरियां लेकर गांवों और मोहल्लों के हर घर की दहलीज पर जाते हैं और घर की समृद्धि, सुख-शांति तथा खुशहाली की मंगलकामना करते हैं। इस परंपरा में मासूम बच्चों की भागीदारी इसे और भी विशेष बना देती है, क्योंकि उनके माध्यम से समाज में प्रेम, अपनापन और सौहार्द का संदेश फैलता है। उन्होंने कहा कि जब बच्चे फूलों की सुगंध के साथ घरों की देहली पर मंगलकामना करते हैं तो वह दृश्य किसी भी व्यक्ति के मन में आनंद और सकारात्मकता का संचार कर देता है। यही कारण है कि उत्तराखंड के लोगों के लिए यह पर्व केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने का भी माध्यम है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी परंपराएं समाज को एकजुट रखती हैं और लोगों को प्रकृति से जुड़कर जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं।
सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने की आवश्यकता पर बल देते हुए अलका पाल ने कहा कि उत्तराखंड की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ उसकी समृद्ध लोकसंस्कृति से भी बनती है। उन्होंने कहा कि फूलदेई जैसे लोकपर्व पीढ़ियों से यहां के जनजीवन में रचे-बसे हैं और इन्हें संरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आधुनिकता और तेज़ी से बदलती जीवनशैली के कारण कई पारंपरिक त्योहारों की चमक धीरे-धीरे कम होती जा रही है, ऐसे में समाज के हर वर्ग को आगे आकर इन परंपराओं को बचाने के लिए प्रयास करना होगा। उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं को इन लोकपर्वों के महत्व से परिचित कराना बेहद आवश्यक है ताकि वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें और भविष्य में भी इन परंपराओं को आगे बढ़ा सकें। उनके अनुसार जब नई पीढ़ी अपने त्योहारों और सांस्कृतिक विरासत के प्रति गर्व महसूस करेगी तभी समाज में सांस्कृतिक निरंतरता बनी रह सकेगी। उन्होंने यह भी कहा कि फूलदेई का उत्सव समाज को यह संदेश देता है कि सामूहिकता, प्रेम और प्रकृति के प्रति सम्मान ही जीवन को संतुलित और खुशहाल बनाते हैं।

लोकपर्व की परंपराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि फूलदेई को विशेष रूप से बच्चों का त्योहार माना जाता है। पहाड़ के गांवों में इस दिन सुबह की शुरुआत ही उत्साह और उमंग के साथ होती है। बच्चे छोटी-छोटी टोकरी या डलिया लेकर आस-पास के बगीचों, खेतों और जंगलों में खिलने वाले रंग-बिरंगे फूलों को चुनते हैं और उन्हें सजाकर अपने साथ ले जाते हैं। इसके बाद वे गांव या मोहल्ले के हर घर की देहली पर जाकर फूल बिखेरते हैं और घर-परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। इस दौरान बच्चे पारंपरिक लोकगीत “फूलदेई छम्मा देई, दैणी द्वार भर भकार” गाते हुए आगे बढ़ते हैं। यह लोकगीत उत्तराखंड की लोकभाषा और संस्कृति का जीवंत उदाहरण है, जिसका अर्थ है कि घर की देहली फूलों से सजी रहे, परिवार में सुख-शांति बनी रहे और घर का भंडार अन्न से भरा रहे। इस मधुर गीत के साथ जब बच्चे फूल बिखेरते हैं तो पूरे वातावरण में एक अलग ही उल्लास और आनंद का माहौल बन जाता है। यही कारण है कि इस पर्व का इंतजार बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को रहता है।
समाज में अपनत्व और स्नेह की परंपरा को दर्शाते हुए अलका पाल ने कहा कि फूलदेई के दौरान घरों के लोग भी बच्चों का बड़े प्रेम और आदर के साथ स्वागत करते हैं। जब बच्चे घर की दहलीज पर फूल डालते हैं और मंगलकामनाएं करते हैं तो घर के सदस्य उन्हें आशीर्वाद देते हैं और बदले में गुड़, मिठाई, चावल, अनाज तथा कुछ पैसे भेंट करते हैं। कई स्थानों पर बच्चों को फल और तरह-तरह की मिठाइयां भी दी जाती हैं, जिससे उनकी खुशी कई गुना बढ़ जाती है। इस पूरी परंपरा में सबसे सुंदर पहलू यह है कि इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता और समाज के हर वर्ग के लोग समान उत्साह के साथ इसमें भाग लेते हैं। उन्होंने कहा कि यह पर्व सामाजिक समरसता का भी संदेश देता है, क्योंकि इसमें छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सभी एक साथ मिलकर खुशी साझा करते हैं। बच्चों की हंसी, फूलों की खुशबू और लोकगीतों की मधुर धुन मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं जो लोगों के मन में सकारात्मकता और आत्मीयता भर देता है। यही वजह है कि फूलदेई केवल एक पर्व नहीं बल्कि सामाजिक सौहार्द का उत्सव भी है।
फूलदेई पर्व से जुड़ी धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए अलका पाल ने कहा कि इस लोकपर्व की जड़ें भारतीय आस्था और परंपरा में भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। प्रचलित मान्यता के अनुसार एक समय भगवान शिव लंबे समय तक कठोर तपस्या में लीन थे। उस समय उन्हें जगाने के लिए माता पार्वती ने शिवगणों को बच्चों का रूप धारण करने का निर्देश दिया। कहा जाता है कि शिवगण पीले वस्त्र धारण कर विभिन्न स्थानों से फूल एकत्रित करके उन्हें भगवान शिव को अर्पित करने पहुंचे। फूलों की सुगंध से पूरा कैलाश पर्वत महक उठा और उसी सुगंध ने भगवान शिव की तंद्रा भंग कर दी। तब से फूल अर्पित करने की यह परंपरा लोकजीवन में एक उत्सव के रूप में स्थापित हो गई, जिसे आज फूलदेई पर्व के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि यह कथा इस पर्व को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण बनाती है और लोगों को प्रकृति तथा आस्था के प्रति सम्मान की भावना से जोड़ती है।

पर्व के सामाजिक संदेश को रेखांकित करते हुए अलका पाल ने प्रदेशवासियों से अपील की कि वे इस लोकपर्व को पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाएं। उन्होंने कहा कि समाज में आपसी सद्भाव, भाईचारा और प्रेम की भावना को मजबूत करना ही इस पर्व का मूल उद्देश्य है। जब लोग एक-दूसरे के घर जाकर खुशहाली की कामना करते हैं तो समाज में सकारात्मकता और विश्वास का माहौल बनता है। उन्होंने यह भी कहा कि आज के समय में जब समाज कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसे में फूलदेई जैसे पर्व लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने और सामूहिकता की भावना को मजबूत करने का कार्य करते हैं। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि इस अवसर पर प्रकृति की रक्षा और पर्यावरण संरक्षण का भी संकल्प लें, क्योंकि फूलदेई का संदेश प्रकृति से प्रेम और उसके संरक्षण से भी जुड़ा हुआ है।
अंत में अलका पाल ने कहा कि फूलदेई का यह पावन उत्सव प्रदेश में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आए। उन्होंने प्रदेश के सभी नागरिकों, विशेष रूप से बच्चों और युवाओं को इस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य और खुशहाल जीवन की कामना की। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की यह अनूठी लोकपरंपरा आने वाले समय में भी इसी तरह जीवंत बनी रहे और प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करती रहे। उनके अनुसार फूलदेई केवल फूलों का त्योहार नहीं बल्कि जीवन में खुशियों, सकारात्मकता और सामाजिक एकता का संदेश देने वाला पर्व है। जब पहाड़ों में खिलते फूलों की महक, बच्चों की मुस्कान और लोकगीतों की गूंज एक साथ मिलती है तो यह उत्सव उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा को जीवंत कर देता है। यही कारण है कि फूलदेई आज भी गांव-गांव और शहर-शहर में उसी उत्साह के साथ मनाया जाता है, जैसा सदियों पहले मनाया जाता था, और यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।





