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फिल्म यादव जी की लव स्टोरी के खिलाफ यादव समाज का उग्र प्रदर्शन और पुतला दहन

काशीपुर में यादव समाज ने फिल्म यादव जी की लव स्टोरी को समाज की छवि धूमिल करने वाला करार देते हुए जोरदार विरोध जताया और सरकार से तुरंत प्रतिबंध की कार्रवाई करने की चेतावनी दी।

काशीपुर। उस समय माहौल गरमा गया, जब यादव समाज से जुड़े सैकड़ों लोगों ने एकजुट होकर फिल्म यादव जी की लव स्टोरी’’ के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस फिल्म में यादव समाज को तथाकथित लव जिहाद के संदर्भ में जोड़कर जानबूझकर बदनाम करने का प्रयास किया गया है, जिससे पूरे यादव हिंदू समाज की छवि को देशभर में धूमिल करने की साजिश रची गई है। समाज के लोगों का कहना है कि किसी भी जाति या समुदाय को इस प्रकार की कहानी के माध्यम से नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करना न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि सामाजिक सौहार्द के लिए भी खतरनाक है। इसी आक्रोश के चलते यादव समाज के लोगों ने फिल्म के निर्माता संदीप तोमर और निर्देशक अंकित भड़ाना का पुतला दहन कर अपना विरोध दर्ज कराया। प्रदर्शन के दौरान नारेबाजी करते हुए समाज के लोगों ने भारत सरकार से मांग की कि इस फिल्म पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाए, ताकि समाज की भावनाओं को और अधिक ठेस न पहुंचे।

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यह फिल्म केवल एक मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि इसके जरिए यादव समाज को एक विशेष सांचे में ढालकर पेश करने की कोशिश की गई है, जो पूरी तरह अस्वीकार्य है। यादव समाज के वरिष्ठ लोगों ने आरोप लगाया कि फिल्म की कहानी और प्रस्तुति में ऐसे दृश्य और संवाद शामिल किए गए हैं, जिनसे यह संदेश जाता है कि यादव समाज किसी षड्यंत्र का हिस्सा है। समाज के लोगों ने इसे सीधे-सीधे बदनाम करने का प्रयास करार दिया। उन्होंने कहा कि यादव समाज का इतिहास देशभक्ति, सामाजिक योगदान और सांस्कृतिक विरासत से भरा हुआ है, लेकिन इस फिल्म में उसी समाज को संदेह और नफरत के चश्मे से दिखाया गया है। प्रदर्शन में शामिल लोगों ने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी रचनात्मक स्वतंत्रता के विरोध में नहीं हैं, लेकिन जब रचनात्मकता के नाम पर किसी पूरे समाज को कलंकित किया जाए, तो उसका विरोध करना उनका नैतिक और सामाजिक दायित्व बन जाता है।

आक्रोशित यादव समाज ने फिल्म सेंसर बोर्ड को भी कड़ी चेतावनी दी। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यदि समय रहते इस फिल्म को प्रतिबंधित नहीं किया गया, तो आंदोलन और भी उग्र रूप ले सकता है। उन्होंने कहा कि सेंसर बोर्ड की जिम्मेदारी केवल फिल्मों को प्रमाणित करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी भी फिल्म के जरिए समाज में वैमनस्य और नफरत न फैलाई जाए। यादव समाज के लोगों ने सवाल उठाया कि आखिर किस आधार पर ऐसी फिल्म को अनुमति दी गई, जिसमें एक पूरे समुदाय को संदिग्ध नजरिए से दिखाया गया है। प्रदर्शन के दौरान यह चेतावनी भी दी गई कि यदि प्रशासन और सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया, तो यादव समाज देशव्यापी आंदोलन छेड़ने से पीछे नहीं हटेगा।

इस दौरान यादव समाज के प्रतिनिधियों ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वे पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रहे हैं, लेकिन उनकी भावनाओं की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। समाज के लोगों ने कहा कि यह केवल एक फिल्म का मामला नहीं है, बल्कि यह सम्मान और पहचान से जुड़ा प्रश्न है। उन्होंने आरोप लगाया कि फिल्म निर्माता और निर्देशक ने जानबूझकर विवादित विषय को चुना, ताकि प्रचार के नाम पर समाज की भावनाओं से खेला जा सके। यादव समाज ने दो टूक कहा कि वे इस तरह की मानसिकता को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। प्रदर्शन में युवाओं के साथ-साथ बुजुर्ग और महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल रहीं, जिससे यह साफ नजर आया कि इस मुद्दे को लेकर पूरे समाज में गहरा रोष है।

इसी प्रदर्शन के दौरान यादव समाज के कई पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने अपने विचार रखे। समाज के लोगों ने एक स्वर में कहा कि यादव हिंदू समाज इस फिल्म का पूर्णतः विरोध करता है और जब तक इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा। उनका कहना था कि देश में पहले से ही सामाजिक तनाव के कई मुद्दे मौजूद हैं, ऐसे में इस तरह की फिल्में आग में घी डालने का काम करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को चाहिए कि वह ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाए, ताकि भविष्य में कोई भी निर्माता या निर्देशक किसी समाज को बदनाम करने का दुस्साहस न कर सके।

प्रदर्शन के दौरान यादव समाज की ओर से सतविंदर यादव, आकाश कांबोज और राजकुमार यादव ने भी अपनी बात मजबूती से रखी। उन्होंने कहा कि यह फिल्म यादव समाज को एक खास नजरिए से जोड़कर पेश करती है, जिससे समाज की वर्षों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचती है। सतविंदर यादव ने कहा कि यादव समाज ने हमेशा देश और समाज के लिए सकारात्मक भूमिका निभाई है, लेकिन कुछ लोग सस्ती लोकप्रियता के लिए समाज को बदनाम करने पर उतारू हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह विरोध किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ है, जो समाज को बांटने का काम करती है। आकाश कांबोज ने कहा कि फिल्म में दिखाई गई कथित कहानी पूरी तरह काल्पनिक और भ्रामक है, लेकिन इसका असर वास्तविक जीवन में समाज की छवि पर पड़ता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस तरह की फिल्मों को रोका नहीं गया, तो आने वाले समय में सामाजिक सौहार्द और भी कमजोर होगा।

राजकुमार यादव ने अपने बयान में कहा कि यादव समाज की भावनाओं को बार-बार नजरअंदाज किया जा रहा है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यादव समाज हिंदू समाज का अभिन्न हिस्सा है और उसे किसी भी प्रकार से अलग या संदिग्ध दिखाना स्वीकार्य नहीं है। उनका कहना था कि फिल्म निर्माता संदीप तोमर और निर्देशक अंकित भड़ाना को समाज से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए, क्योंकि उनके कृत्य से पूरे समाज की भावनाएं आहत हुई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि निर्माता और निर्देशक अपनी गलती नहीं मानते, तो यादव समाज कानूनी रास्ता अपनाने पर भी विचार करेगा। राजकुमार यादव ने यह साफ किया कि यह आंदोलन केवल काशीपुर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर इसे प्रदेश और देश स्तर तक ले जाया जाएगा।

प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन से भी इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की। उनका कहना था कि यदि किसी फिल्म से कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की आशंका है, तो प्रशासन को पहले ही कदम उठाना चाहिए। यादव समाज के लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ ताकतें जानबूझकर समाज के बीच नफरत फैलाने का प्रयास कर रही हैं, ताकि राजनीतिक या व्यावसायिक लाभ उठाया जा सके। उन्होंने सरकार से अपील की कि वह इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए और यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में किसी भी समुदाय को इस तरह से निशाना न बनाया जाए।

काशीपुर में हुए इस विरोध प्रदर्शन ने साफ संकेत दे दिया है कि यादव समाज इस मुद्दे को लेकर किसी भी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं है। समाज के लोगों का कहना है कि यदि सरकार और सेंसर बोर्ड ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, तो आंदोलन और भी व्यापक रूप ले सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि सम्मान की रक्षा है। यादव समाज का मानना है कि सिनेमा जैसे प्रभावशाली माध्यम का उपयोग समाज को जोड़ने के लिए होना चाहिए, न कि किसी विशेष समुदाय को बदनाम करने के लिए। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, ताकि कला के नाम पर समाज में जहर न घोला जाए।

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