काशीपुर। वैकल्पिक चिकित्सा और समग्र स्वास्थ्य जागरूकता को नई दिशा देने वाली पहल इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है, जहां डॉ. अमर प्रताप सिंह ने प्रेस वार्ता के दौरान बताया कि प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय तथा भारतीय एक्यूप्रेशर संस्थान, लखनऊ के संयुक्त सहयोग से शहर में अनूठे स्वास्थ्य अभियान का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने जानकारी दी कि “असाध्य रोगों का बिना दवा उपचार” विषय पर आधारित राजयोग मेडिटेशन एवं एक्यूप्रेशर चिकित्सा प्रशिक्षण शिविर 9 फरवरी 2026 से 24 फरवरी 2026 तक आयोजित किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य आम लोगों को प्राकृतिक चिकित्सा की शक्ति से जोड़ना और उन्हें आत्मनिर्भर स्वास्थ्य की दिशा में प्रेरित करना है। शहर के आवास विकास क्षेत्र स्थित 480 शुभ विहार परिसर में आयोजित यह शिविर स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नागरिकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है और लगातार लोग इसमें भाग लेने के लिए पहुंच रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह अभियान केवल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को ऐसी चिकित्सा पद्धति सिखाने का प्रयास है, जिससे वे स्वयं और अपने परिवार को कई गंभीर रोगों से बचा सकें।
डॉ. अमर प्रताप सिंह ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि लगभग 30 वर्ष पूर्व प्रयागराज में इस विद्या को व्यवस्थित रूप से विकसित करने के लिए एक केंद्र की स्थापना की गई थी, जहां आज 50 से अधिक चिकित्सक इस पद्धति के माध्यम से लोगों का उपचार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह चिकित्सा प्रणाली भारत की प्राचीन धरोहर है, जो समय के साथ लोगों की जानकारी से दूर होती चली गई और विदेशों तक पहुंच गई। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोग इसे अक्सर विदेशी चिकित्सा पद्धति समझते हैं, जबकि इसकी जड़ें भारतीय ऋषि-मुनियों के अनुसंधान में निहित हैं। उनका कहना था कि प्रयागराज में गंगा तट पर स्थापित केंद्र में वर्षों से हजारों मरीजों को बिना दवा केवल एक्यूप्रेशर तकनीकों से राहत प्रदान की जा रही है, जिससे लोगों का भरोसा इस चिकित्सा प्रणाली पर लगातार बढ़ रहा है।
शिविर के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि इस प्रशिक्षण के माध्यम से लोगों को यह सिखाया जा रहा है कि शरीर के विभिन्न अंगों से जुड़े बिंदु हाथों और पैरों में मौजूद होते हैं, जिन्हें सही तरीके से दबाने या सक्रिय करने से अनेक बीमारियों में तुरंत आराम मिल सकता है। उन्होंने दावा किया कि कई जटिल रोग जैसे किडनी संबंधी समस्याएं, हृदय रोग, रीढ़ की हड्डी से जुड़ी परेशानियां और जन्मजात बीमारियों में भी इस चिकित्सा पद्धति के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। उन्होंने बताया कि यह ज्ञान समाज तक पहुंचाने के लिए संस्था ने “ईच वन टीच वन, ईच वन रीच वन, ईच वन ट्रीट वन” का संदेश अपनाया है, जिसका उद्देश्य हर घर तक इस विद्या को पहुंचाना है ताकि लोग छोटी-मोटी बीमारियों का उपचार स्वयं कर सकें और स्वस्थ जीवन जी सकें।
काशीपुर में आयोजित शिविर के बारे में उन्होंने बताया कि वह पिछले तीन महीनों से शहर में सक्रिय हैं और इससे पहले भी दो से तीन शिविर सफलतापूर्वक आयोजित किए जा चुके हैं। ब्रह्माकुमारी आश्रम में आयोजित वर्तमान कार्यक्रम में लोगों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ उपचार भी किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि शरीर की संरचना को समझना बेहद सरल है और यदि व्यक्ति अपनी हथेली के बिंदुओं को पहचान ले तो वह शरीर के लगभग सभी अंगों का प्रतिनिधित्व समझ सकता है। उन्होंने बताया कि बीच की दो उंगलियां पैरों से संबंधित होती हैं, किनारे की उंगलियां हाथों का प्रतिनिधित्व करती हैं, हथेली का दबा भाग पेट का और उभरा भाग छाती का संकेत देता है, जबकि अंगूठा सिर का प्रतिनिधित्व करता है और हथेली के पीछे का भाग रीढ़ से संबंधित माना जाता है।
समाज में बढ़ती बीमारियों को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए डॉ. अमर प्रताप सिंह ने कहा कि पहले के समय में लोग श्रम प्रधान जीवन जीते थे, जिससे उनका शरीर स्वाभाविक रूप से सक्रिय रहता था। महिलाओं द्वारा हाथ से मसाला पीसना, कुएं से पानी निकालना, चक्की चलाना और खेतों में काम करना सामान्य जीवनशैली का हिस्सा था, जिससे लोग शारीरिक रूप से मजबूत रहते थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जीवनशैली पूरी तरह बदल चुकी है, जहां मशीनों पर निर्भरता बढ़ने, अनियमित खानपान और तनावपूर्ण दिनचर्या के कारण बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। उनका मानना है कि यदि लोग एक्यूप्रेशर तकनीक को अपनाएं तो डायबिटीज, गठिया, कैंसर और ट्यूमर जैसी गंभीर बीमारियों से बचाव संभव है।
शिविर में आयोजित प्रशिक्षण सत्रों की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि रोजाना सुबह 8 बजे से 9 बजे तक ब्रह्माकुमारी आश्रम में बोर्ड के माध्यम से प्रशिक्षण दिया जाता है, जिसमें लोगों को कलम और कॉपी लेकर आने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है ताकि वे इस विद्या को सही ढंग से सीख सकें। जो लोग सुबह प्रशिक्षण में शामिल नहीं हो पाते उनके लिए शाम 5 बजे से 6 बजे तक आवास विकास क्षेत्र में डॉ. बी.सी. जोशी के सामने प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि एक बार व्यक्ति इस चिकित्सा प्रणाली को सीख ले तो वह जीवनभर इसका लाभ उठा सकता है और स्वयं के साथ अपने परिवार के स्वास्थ्य की रक्षा कर सकता है।
मसाज और एक्यूप्रेशर के अंतर को स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि सामान्य मसाज में शरीर के विभिन्न हिस्सों पर दबाव पड़ता है, जबकि एक्यूप्रेशर में शरीर के विशिष्ट बिंदुओं पर सटीक दबाव देकर रोग के मूल कारण का उपचार किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह पद्धति केवल लक्षणों को नहीं बल्कि बीमारी की जड़ को समाप्त करने पर आधारित है, जिससे रोग स्वतः नियंत्रित हो जाता है। उन्होंने बताया कि कई एलोपैथिक चिकित्सक इस पद्धति पर सवाल उठाते हैं, लेकिन उन्होंने कहा कि आयुर्वेद और चरक संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों में मर्मस्थलों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो इस चिकित्सा प्रणाली की वैज्ञानिकता को प्रमाणित करता है।
एलोपैथी चिकित्सा पर अपने विचार साझा करते हुए उन्होंने कहा कि यह चिकित्सा प्रणाली भी महत्वपूर्ण है और कई परिस्थितियों में आवश्यक होती है, लेकिन एक्यूप्रेशर में भी आपातकालीन उपचार की क्षमता मौजूद है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मिर्गी के दौरे की स्थिति में हाथ के एक विशेष बिंदु को दबाने से मरीज को तुरंत होश में लाया जा सकता है, जबकि हृदयाघात की स्थिति में उंगली के विशेष बिंदु पर दबाव डालने से व्यक्ति के प्राण बचाए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह तकनीक केवल उपचार तक सीमित नहीं बल्कि बीमारियों की रोकथाम में भी प्रभावी भूमिका निभाती है।
रंग चिकित्सा और चुंबकीय उपचार के बारे में विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा कि शरीर पांच तत्वों से बना है और सूर्य की किरणों के सात रंग शरीर की ऊर्जा को प्रभावित करते हैं। उन्होंने बताया कि शरीर में ऊर्जा असंतुलन होने पर रंगों के प्रयोग से संतुलन स्थापित किया जा सकता है। उदाहरण के रूप में उन्होंने कहा कि गैस, जलन या खुजली की स्थिति में हरे रंग का प्रयोग लाभकारी होता है, जबकि उच्च रक्तचाप की स्थिति में नीले रंग का प्रयोग किया जाता है। उन्होंने कहा कि पुरानी बीमारियों में चुंबक का प्रयोग किया जाता है, जिससे शरीर की ऊर्जा संतुलित होती है और रोग धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।
शिविर की अवधि और प्रशिक्षण प्रक्रिया के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि यह 15 दिवसीय शिविर है, जिसमें पहले नौ दिनों तक सैद्धांतिक प्रशिक्षण और चार दिनों तक व्यावहारिक प्रशिक्षण कराया जाता है। उन्होंने बताया कि अब तक लगभग 400 से 500 मरीजों का उपचार किया जा चुका है और कई लोग इस चिकित्सा प्रणाली को सीखकर सेवा कार्य में योगदान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि संस्था का लक्ष्य काशीपुर में स्थायी केंद्र स्थापित करना है, जहां लोगों को निशुल्क उपचार और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा सके। सरकारी मान्यता के संबंध में उन्होंने बताया कि प्रयागराज में स्थापित संस्थान का नाम माता प्रसाद खेमका एक्यूप्रेशर महाविद्यालय है और इस संस्था को उच्च न्यायालय तथा कई सरकारी विभागों का सहयोग प्राप्त है। उन्होंने कहा कि आयुष मंत्रालय द्वारा इस चिकित्सा प्रणाली पर अध्ययन और सर्वेक्षण किया जा रहा है और भविष्य में इसे पूर्ण मान्यता मिलने की संभावना है। उन्होंने कहा कि योग की तरह एक्यूप्रेशर भी आने वाले समय में व्यापक स्तर पर स्वीकार किया जाएगा और इसके लिए पांच वर्षीय डिग्री कोर्स शुरू करने की योजना पर भी कार्य किया जा रहा है।
प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी प्रयागराज में आयोजित एक शिविर का उद्घाटन कर चुके हैं और इस चिकित्सा प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए सकारात्मक पहल की जा रही है। उन्होंने कहा कि जैसे योग, होम्योपैथी और नेचुरोपैथी को मान्यता मिली है, उसी प्रकार भविष्य में एक्यूप्रेशर को भी व्यापक स्वीकृति मिलेगी। डॉ. अमर प्रताप सिंह ने समाज से अपील करते हुए कहा कि लोग अपने व्यस्त जीवन से थोड़ा समय निकालकर इस चिकित्सा प्रणाली को सीखें और स्वस्थ जीवन की दिशा में कदम बढ़ाएं। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक घर में एक व्यक्ति इस विद्या को सीख ले तो समाज में बीमारियों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। उन्होंने बताया कि संस्था द्वारा तीन वर्षीय डिप्लोमा कोर्स भी संचालित किया जा रहा है, जिसमें ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्यमों से प्रशिक्षण दिया जाता है और काशीपुर के कई लोग इस कोर्स में भाग ले रहे हैं।
स्वास्थ्य जागरूकता को नई पहचान दिलाने वाला यह शिविर शहर में उत्साह और विश्वास का वातावरण बना रहा है। बड़ी संख्या में नागरिक इसमें भाग लेकर प्राकृतिक और वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के प्रति अपनी रुचि जता रहे हैं। शिविर में लोगों को बिना दवा उपचार, जीवनशैली सुधार और मानसिक संतुलन के महत्व के बारे में जागरूक किया जा रहा है, जिससे प्रतिभागियों में स्वास्थ्य को लेकर सकारात्मक सोच विकसित हो रही है। आयोजकों का कहना है कि यह पहल केवल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को आत्मनिर्भर बनाकर उन्हें स्वयं अपने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित कर रही है। उनका मानना है कि यदि इस तरह के कार्यक्रम लगातार आयोजित होते रहे तो समाज में बीमारियों की रोकथाम संभव होगी और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा मिलेगा। आने वाले समय में ऐसे अभियानों से आमजन को व्यापक लाभ मिलने और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और अधिक मजबूत होने की उम्मीद व्यक्त की जा रही है।





