काशीपुर। परीक्षाओं के मौसम के बीच अभिभावकों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश सामने आया है, जहां समाजसेवी एवं डी बाली ग्रुप की डायरेक्टर श्रीमती उर्वशी दत्त बाली ने शिक्षा और परवरिश से जुड़े संवेदनशील मुद्दे पर स्पष्ट राय व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि कई विद्यालयों में परीक्षाएं शुरू हो चुकी हैं, जबकि कुछ संस्थानों में जल्द ही परीक्षा सत्र प्रारंभ होने वाला है। ऐसे समय में अभिभावकों की भूमिका अत्यंत अहम हो जाती है, क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि बच्चों के अपेक्षा से कम अंक आने पर माता-पिता सबसे पहले विद्यालय बदलने का विचार करने लगते हैं। श्रीमती उर्वशी दत्त बाली का कहना है कि यह मानसिकता समस्या का समाधान नहीं बल्कि बच्चों के भविष्य को और अधिक उलझाने वाली स्थिति पैदा कर सकती है। उनका मानना है कि अंक कम आने की स्थिति में दोष केवल विद्यालय पर डालना उचित नहीं है, बल्कि बच्चों की पढ़ाई पर परिवार का ध्यान और निगरानी भी उतनी ही जरूरी होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कई परिवारों में दो या तीन बच्चे एक ही विद्यालय में पढ़ते हैं, जिनमें से कुछ बच्चों के अंक उत्कृष्ट होते हैं जबकि कुछ का प्रदर्शन कमजोर रहता है। यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि विद्यालय समान होने के बावजूद परिणामों में अंतर घर के वातावरण, अनुशासन और पढ़ाई पर दिए जाने वाले समय से तय होता है।
शैक्षणिक परिणामों को लेकर समाज में बनी धारणाओं पर प्रकाश डालते हुए श्रीमती उर्वशी दत्त बाली ने समय प्रबंधन को सफलता की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी बताया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक विद्यार्थी के पास दिन के चौबीस घंटे समान रूप से उपलब्ध होते हैं, लेकिन इन घंटों के उपयोग का तरीका ही भविष्य तय करता है। जो छात्र कक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त करता है, उसके पास भी वही समय होता है जो औसत अंक लाने वाले विद्यार्थी या पढ़ाई में संघर्ष करने वाले छात्र के पास होता है। उन्होंने कहा कि अक्सर अभिभावक कम अंक आने पर जल्दबाजी में विद्यालय परिवर्तन का निर्णय ले लेते हैं, जबकि यह सोच अब समय के अनुरूप नहीं रही है। विद्यालय बदलने से बच्चों का समय नष्ट होता है और उनकी पढ़ाई की निरंतरता भी प्रभावित होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस विद्यालय में श्रेष्ठ अंक प्राप्त करने वाला छात्र पढ़ रहा है, उसी विद्यालय में कम अंक लाने वाला विद्यार्थी भी अध्ययन कर रहा होता है, जहां शिक्षक, पाठ्यक्रम और संसाधन समान होते हैं। ऐसे में केवल विद्यालय को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं कहा जा सकता। उनका मानना है कि असली प्रश्न यह है कि घर से बच्चों को किस प्रकार का मार्गदर्शन और अध्ययन का वातावरण मिल रहा है।
परिवार की भूमिका को रेखांकित करते हुए श्रीमती उर्वशी दत्त बाली ने बताया कि एक विद्यार्थी अपने दिन का अधिकांश समय घर पर बिताता है। उन्होंने कहा कि सामान्य रूप से बच्चा लगभग सोलह से सत्रह घंटे घर में रहता है, जबकि विद्यालय और ट्यूशन का समय मिलाकर केवल पांच से छह घंटे ही शिक्षा संस्थानों में व्यतीत करता है। इस परिस्थिति में अभिभावकों की जिम्मेदारी और भी अधिक बढ़ जाती है। उनका कहना है कि विद्यालय और ट्यूशन केंद्र बच्चों को दिशा प्रदान करते हैं, लेकिन उस दिशा पर निरंतर चलने के लिए परिवार का सहयोग अनिवार्य होता है। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे बच्चों की दिनचर्या पर ध्यान दें, उन्हें समय प्रबंधन की आदत सिखाएं और पढ़ाई के प्रति सकारात्मक वातावरण तैयार करें। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों से नियमित संवाद बनाए रखना बेहद आवश्यक है, जिससे वे मानसिक दबाव या हीन भावना का शिकार न हों। उनका मानना है कि यदि अभिभावक बच्चों की मेहनत को समझेंगे और उन्हें भावनात्मक सहयोग देंगे, तो विद्यार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित होंगे।
पढ़ाई में एकाग्रता को लेकर भी श्रीमती उर्वशी दत्त बाली ने महत्वपूर्ण सुझाव साझा किए। उन्होंने कहा कि जब बच्चे अपने समय को व्यवस्थित रूप से बांटना सीख जाते हैं, तो उनके परिणाम स्वाभाविक रूप से बेहतर होने लगते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को सलाह दी कि पढ़ाई शुरू करने से पहले मन को शांत और स्थिर करने का अभ्यास अपनाया जाना चाहिए। इसके लिए उन्होंने सुझाव दिया कि विद्यार्थी अध्ययन प्रारंभ करने से पहले आंखें बंद करके इक्कीस बार “ॐ भूर् भुवः स्वः” का उच्चारण करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी धार्मिक परंपरा का हिस्सा नहीं बल्कि मानसिक एकाग्रता और स्थिरता बढ़ाने का सरल उपाय है। उनका कहना है कि शिक्षा ग्रहण करने के लिए शांत और केंद्रित मन अत्यंत आवश्यक होता है, क्योंकि विचलित मानसिक स्थिति में किया गया अध्ययन प्रभावी नहीं होता। उन्होंने परीक्षाओं के इस दौर में विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि अच्छे अंक प्राप्त करना खुशी की बात है, लेकिन यदि परिणाम अपेक्षा के अनुसार न आएं तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने बच्चों को निरंतर प्रयास करने और आत्मविश्वास बनाए रखने की प्रेरणा दी।
भविष्य निर्माण में अनुशासन और मार्गदर्शन की अहमियत पर जोर देते हुए श्रीमती उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि बच्चों का भविष्य केवल अंकों से तय नहीं होता, बल्कि अनुशासित जीवनशैली, परिश्रम और सही दिशा ही सफलता की असली नींव बनाते हैं। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि यदि आने वाली पीढ़ी को बेहतर बनाना है तो सबसे पहले माता-पिता को अपनी सोच और जिम्मेदारियों को सकारात्मक दिशा में ले जाना होगा। उनका कहना है कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों के व्यक्तित्व विकास, आत्मविश्वास और जीवन मूल्यों को मजबूत करने का माध्यम भी है। उन्होंने कहा कि परिवार, विद्यालय और समाज के सामूहिक प्रयास से ही बच्चों का समग्र विकास संभव है। श्रीमती उर्वशी दत्त बाली ने उम्मीद जताई कि यदि अभिभावक अपने दायित्वों को समझते हुए बच्चों को समय और सही मार्गदर्शन देंगे, तो आने वाली पीढ़ी न केवल शैक्षणिक क्षेत्र में बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करेगी।





