spot_img
दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, वह खुद बनिए. - महात्मा गांधी
Homeउत्तराखंडनैनीतालपीएनजी महाविद्यालय में बौद्धिक संपदा अधिकार कार्यशाला से छात्रों को नवाचार की...

पीएनजी महाविद्यालय में बौद्धिक संपदा अधिकार कार्यशाला से छात्रों को नवाचार की नई दिशा

यूकोस्ट के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में विशेषज्ञों ने विद्यार्थियों और शोधार्थियों को पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क तथा नवाचार की सुरक्षा से जुड़ी प्रक्रियाओं की विस्तृत जानकारी देकर जागरूक किया।

रामनगर। पीएनजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में बौद्धिक संपदा अधिकार जैसे महत्वपूर्ण विषय को लेकर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला ने शिक्षा जगत और विद्यार्थियों के बीच ज्ञान, नवाचार और रचनात्मकता की सुरक्षा को लेकर नई जागरूकता पैदा की। यूकोस्ट के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में बौद्धिक संपदा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई और विद्यार्थियों को आधुनिक समय में इसके महत्व से अवगत कराया गया। कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर शिक्षा जगत से जुड़े कई प्रतिष्ठित विद्वानों की मौजूदगी ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ा दिया। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक भारतीय परंपरा के अनुसार दीप प्रज्वलन के साथ हुई, जिसमें मुख्य अतिथि पूर्व निदेशक उच्च शिक्षा उत्तराखंड प्रो. सी.डी. सूंठा, मुख्यवक्ता प्रो. नन्दा गोपाल साहू, महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एम. सी. पाण्डे तथा चीफ प्रॉक्टर प्रो. एस. एस. मौर्या ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर उपस्थित सभी शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने कार्यक्रम को ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायी बताया। महाविद्यालय परिसर में आयोजित इस कार्यशाला का उद्देश्य केवल शैक्षणिक चर्चा तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके माध्यम से विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को यह समझाने का प्रयास भी किया गया कि आधुनिक युग में बौद्धिक संपदा का संरक्षण कितना आवश्यक है और इससे समाज तथा राष्ट्र के विकास में किस प्रकार योगदान मिल सकता है।

कार्यक्रम की शुरुआत में कार्यशाला संयोजक तथा बौद्धिक संपदा अधिकार प्रकोष्ठ के संयोजक डॉ. पवन टम्टा ने स्वागत भाषण के माध्यम से उपस्थित अतिथियों और प्रतिभागियों का अभिनंदन किया तथा कार्यशाला की प्रस्तावना प्रस्तुत की। अपने संबोधन में उन्होंने बताया कि बौद्धिक संपदा अधिकार वर्तमान समय में शोध, नवाचार और रचनात्मक कार्यों की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। उन्होंने कहा कि आज जब दुनिया तेजी से ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही है, तब बौद्धिक संपदा के संरक्षण की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है। डॉ. पवन टम्टा ने इस बात पर भी जोर दिया कि उच्च शिक्षा संस्थानों में इस विषय पर निरंतर संवाद और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ताकि विद्यार्थियों और शोधार्थियों को अपने शोध कार्यों और नवाचारों की सुरक्षा के बारे में स्पष्ट जानकारी मिल सके। उन्होंने यह भी कहा कि यूकोस्ट द्वारा प्रायोजित यह कार्यशाला विद्यार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है, जिसके माध्यम से वे बौद्धिक संपदा से जुड़े कानूनी और व्यावहारिक पहलुओं को समझ सकेंगे। अपने वक्तव्य में उन्होंने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए उम्मीद जताई कि यह कार्यक्रम प्रतिभागियों के लिए ज्ञानवर्धक साबित होगा और उन्हें अपने शोध और रचनात्मक कार्यों को सुरक्षित रखने की दिशा में प्रेरित करेगा।

कार्यशाला के मुख्यवक्ता प्रो. नन्दा गोपाल साहू ने अपने विस्तृत व्याख्यान में बौद्धिक संपदा अधिकार की अवधारणा, उसकी उपयोगिता और वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि बौद्धिक संपदा अधिकार का अर्थ है किसी व्यक्ति के आविष्कार, रचनात्मक कार्य, ट्रेडमार्क, डिज़ाइन, साहित्यिक या कलात्मक कृतियों पर उसका कानूनी अधिकार सुनिश्चित करना। प्रो. नन्दा गोपाल साहू ने विद्यार्थियों को यह भी समझाया कि यदि किसी व्यक्ति ने कोई नया आविष्कार किया है या कोई मौलिक रचना तैयार की है तो उसे कानून के माध्यम से सुरक्षा प्रदान की जा सकती है, ताकि कोई अन्य व्यक्ति बिना अनुमति के उसका उपयोग न कर सके। उन्होंने राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा जागरूकता योजना के बारे में भी जानकारी दी और बताया कि भारत सरकार इस क्षेत्र में जागरूकता बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम चला रही है। प्रो. साहू ने अपने व्याख्यान के दौरान उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि किस प्रकार पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क और डिज़ाइन जैसे अधिकार नवाचार को प्रोत्साहित करते हैं और शोध कार्यों को कानूनी संरक्षण प्रदान करते हैं। उनके संबोधन ने उपस्थित विद्यार्थियों और शिक्षकों को बौद्धिक संपदा अधिकार के महत्व को गहराई से समझने का अवसर प्रदान किया।

कार्यक्रम के दौरान आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में भी प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। इस सत्र में विद्यार्थियों और प्राध्यापकों ने बौद्धिक संपदा अधिकार से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर प्रो. नन्दा गोपाल साहू ने विस्तार से दिया। उन्होंने बौद्धिक संपदा अधिकार की प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से समझाते हुए बताया कि किसी भी नवाचार या शोध कार्य को कानूनी संरक्षण प्राप्त करने के लिए कई चरणों से गुजरना पड़ता है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले नवीन शोध या आविष्कार की पहचान की जाती है, उसके बाद संबंधित प्राधिकरण के पास आवेदन प्रस्तुत किया जाता है। इसके पश्चात उस आवेदन की जांच की जाती है और यदि सभी शर्तें पूरी होती हैं तो उसका प्रकाशन किया जाता है। अंत में औपचारिक पंजीकरण के माध्यम से उस आविष्कार या रचना को कानूनी संरक्षण प्रदान किया जाता है। इस विस्तृत जानकारी से विद्यार्थियों को यह समझने में मदद मिली कि बौद्धिक संपदा अधिकार केवल एक सैद्धांतिक विषय नहीं है, बल्कि यह व्यावहारिक रूप से शोध और नवाचार को सुरक्षित रखने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व निदेशक उच्च शिक्षा उत्तराखंड प्रो. सी. डी. सूंठा ने अपने संबोधन में बौद्धिक संपदा अधिकार को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि आज के प्रतिस्पर्धी दौर में नवाचार और रचनात्मकता की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक हो गई है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में होने वाले शोध कार्य केवल अकादमिक उपलब्धियां नहीं होते, बल्कि वे समाज और राष्ट्र के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रो. सी. डी. सूंठा ने यह भी कहा कि यदि शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को अपने कार्यों पर कानूनी अधिकार प्राप्त हो तो इससे उनमें नए विचारों और आविष्कारों को विकसित करने की प्रेरणा मिलती है। उन्होंने शिक्षकों और विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे बौद्धिक संपदा अधिकार से जुड़े नियमों और प्रक्रियाओं को समझें और अपने नवाचारों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। उनके विचारों ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी प्रतिभागियों को प्रेरित किया और यह संदेश दिया कि ज्ञान, अनुसंधान और रचनात्मकता की रक्षा करना शिक्षा जगत की बड़ी जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम के अध्यक्ष तथा महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एम. सी. पाण्डे ने भी अपने संबोधन में कार्यशाला की उपयोगिता पर प्रकाश डाला और इसे वर्तमान समय की आवश्यकता बताया। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह विद्यार्थियों को नई सोच और नए विचारों को विकसित करने का अवसर भी प्रदान करती है। प्रो. एम. सी. पाण्डे ने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकार जैसे विषयों पर आयोजित इस प्रकार के कार्यक्रम विद्यार्थियों को न केवल कानूनी जानकारी देते हैं बल्कि उन्हें शोध और नवाचार के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी करते हैं। उन्होंने कार्यशाला के सफल आयोजन के लिए सभी आयोजकों को बधाई दी और विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे इस अवसर का पूरा लाभ उठाएं तथा अपने ज्ञान को समाज के हित में उपयोग करें। कार्यक्रम के दौरान गणित विभाग प्रभारी डॉ. प्रमोद जोशी और डॉ. मूलचन्द्र शुक्ल सहित कई शिक्षकों और विद्यार्थियों ने भी वर्तमान समय में बौद्धिक संपदा अधिकार की प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किए और इस विषय से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।

कार्यक्रम के संचालन की जिम्मेदारी डॉ. प्रकाश विष्ट ने निभाई, जिन्होंने पूरे आयोजन को सुव्यवस्थित और प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाया। कार्यक्रम के अंत में चीफ प्रॉक्टर प्रो. एस. एस. मौर्या ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं विद्यार्थियों को नए विषयों की जानकारी देने के साथ-साथ उनके दृष्टिकोण को भी व्यापक बनाती हैं। कार्यशाला में महाविद्यालय के कई प्राध्यापक और शोधार्थी भी उपस्थित रहे, जिनमें प्रो. जे. एस. नेगी, प्रो. अनुमिता अग्रवाल, डॉ. पुनीता कुशवाहा, डॉ. लवकुश कुमार, डॉ. सुमन कुमार, डॉ. शरद भट्ट और डॉ. सिराज अहमद सहित विभिन्न संकायों के शिक्षक शामिल थे। इसके अलावा स्नातकोत्तर और शोध स्तर के अनेक विद्यार्थी भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे और उन्होंने विषय से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त कीं।

कार्यशाला के सफल आयोजन में कई शिक्षकों और कर्मचारियों का विशेष योगदान रहा। आयोजक सचिव डॉ. पवन टम्टा के नेतृत्व में इस कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई, जबकि सह आयोजक सचिव डॉ. योगेश चन्द्र और डॉ. सुभाष चन्द्र पोखरियाल ने आयोजन की व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अलावा डॉ. दीपक खाती, गोविन्द जगपांगी और बलवन्त सिंह ने भी कार्यक्रम को सफल बनाने में सक्रिय सहयोग दिया। दो दिनों तक चले इस ज्ञानवर्धक आयोजन ने विद्यार्थियों और शिक्षकों को बौद्धिक संपदा अधिकार जैसे महत्वपूर्ण विषय की गहराई से समझ प्रदान की। कार्यक्रम के अंत में यह विश्वास व्यक्त किया गया कि इस प्रकार की कार्यशालाएं भविष्य में भी आयोजित होती रहेंगी, ताकि उच्च शिक्षा संस्थानों में शोध, नवाचार और रचनात्मकता को प्रोत्साहन मिल सके तथा विद्यार्थियों को अपने बौद्धिक कार्यों की सुरक्षा के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त हो सके।

संबंधित ख़बरें
शहर की भीड़भाड़ और बढ़ती बीमारियों के दौर में जब चिकित्सा जगत को नए और भरोसेमंद विकल्पों की तलाश थी, उसी समय काशीपुर से उभरती एक संस्था ने अपनी गुणवत्ता, विशेषज्ञता और इंसानी सेहत के प्रति समर्पण की मिसाल कायम कर दी। एन.एच.-74, मुरादाबाद रोड पर स्थित “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” आज उस भरोसे का नाम बन चुका है, जिसने अपनी प्रतिबद्धता, सेवा और उन्नत चिकित्सा व्यवस्था के साथ लोगों के दिलों में एक अलग स्थान स्थापित किया है। इस संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ इलाज का आधार केवल दवा नहीं, बल्कि रोगी की पूरी जीवनशैली, उसकी भावनाओं और उसके व्यवहार तक को समझकर उपचार उपलब्ध कराया जाता है। संस्था के केंद्र में वर्षों से सेवा कर रहे डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा का अनुभव, उनकी अंतरराष्ट्रीय योग्यता और कार्य के प्रति उनका गहरा समर्पण उन्हें चिकित्सा जगत में एक विशिष्ट पहचान देता है। अपनी अलग सोच और उच्च स्तरीय चिकित्सा व्यवस्था के कारण यह संस्थान न केवल स्थानीय लोगों का विश्वास जीत रहा है, बल्कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले मरीज भी यहाँ भरोसे के साथ उपचार लेने पहुँचते हैं। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” ने NABH Accreditation और ISO 9001:2008 व 9001:2015 प्रमाणपत्र हासिल कर यह साबित कर दिया है कि यहाँ इलाज पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया, गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के साथ किया जाता है। संस्थान की दीवारों पर सजे सैकड़ों प्रमाणपत्र, सम्मान और पुरस्कार इस बात के गवाह हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा ने उपचार को केवल पेशा नहीं, बल्कि मानव सेवा की जिम्मेदारी माना है। यही वजह है कि उन्हें भारतीय चिकित्सा रत्न जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है। रोगियों के प्रति संवेदनशीलता और आधुनिक तकनीकी समझ को मिलाकर जो उपचार मॉडल यहाँ तैयार हुआ है, वह लोगों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है। संस्थान के भीतर मौजूद विस्तृत कंसल्टेशन रूम, मेडिकल फाइलों की सुव्यवस्थित व्यवस्था और अत्याधुनिक निरीक्षण प्रणाली इस बात को स्पष्ट दिखाती है कि यहाँ मरीज को पूर्ण सम्मान और ध्यान के साथ सुना जाता है। पोस्टर में दर्शाए गए दृश्य—जहाँ डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मानित होते दिखाई देते हैं—उनकी निष्ठा और चिकित्सा जगत में उनकी मजबूत प्रतिष्ठा को और मजबूत बनाते हैं। उनकी विदेशों में प्राप्त डिग्रियाँ—बीएचएमएस, एमडी (होम.), डी.आई.एच. होम (लंदन), एम.ए.एच.पी (यूके), डी.एच.एच.एल (यूके), पीएच.डी—स्पष्ट करती हैं कि वे केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिकित्सा अनुसंधान और उपचार के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। काशीपुर जैसे शहर में आधुनिक विचारों और उच्च गुणवत्ता वाले उपचार का ऐसा संयोजन मिलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। संस्था की ऊँची इमारत, सुगम पहुँच और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित परिसर मरीजों को एक शांत, सकारात्मक और उपचार के अनुकूल माहौल प्रदान करता है। इसी माहौल में रोगियों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली वैज्ञानिक होम्योपैथिक औषधियाँ उनके लंबे समय से चले आ रहे दर्द और समस्याओं को जड़ से ठीक करने की क्षमता रखती हैं। उपचार के दौरान रोगी को केवल दवा देना ही उद्देश्य नहीं होता, बल्कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य पुनर्स्थापन पर यहाँ विशेष ध्यान दिया जाता है। यही वह कारण है कि मरीज वर्षों बाद भी इस संस्थान को याद रखते हुए अपने परिवार और परिचितों को यहाँ भेजना पसंद करते हैं। समाज के विभिन्न समूहों से सम्मान प्राप्त करना, राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों द्वारा सराहना मिलना, और बड़े मंचों पर चिकित्सा सेवाओं के लिए सम्मानित होना—ये सभी तस्वीरें इस संस्था की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को और अधिक उजागर करती हैं। पोस्टर में दिखाई देने वाले पुरस्कार न केवल उपलब्धियों का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा लगातार लोगों की सेहत सुधारने और चिकित्सा के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने में जुटे हुए हैं। उनका सरल स्वभाव, रोगियों के प्रति समर्पण और ईमानदारी के साथ सेवा का भाव उन्हें चिकित्सा जगत में एक उल्लेखनीय व्यक्तित्व बनाता है। संपर्क के लिए उपलब्ध नंबर 9897618594, ईमेल drrajneeshhom@hotmail.com और आधिकारिक वेबसाइट www.cureme.org.in संस्थान की पारदर्शिता और सुविधा की नीति को मजबूत बनाते हैं। काशीपुर व आसपास के क्षेत्रों के लिए यह संस्थान विकसित और उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बन चुका है जहाँ लोग बिना किसी डर, संदेह या हिचकिचाहट के पहुँचते हैं। बढ़ते रोगों और बदलती जीवनशैली के समय में इस प्रकार की संस्था का होना पूरा क्षेत्र के लिए बड़ी राहत और उपलब्धि है। आने वाले समय में भी यह संस्था चिकित्सा सेवा के नए आयाम स्थापित करती रहेगी, यही उम्मीद लोगों की जुबान पर साफ झलकती है।
स्वच्छ, सुंदर और विकसित काशीपुर के संकल्प संग गणतंत्र दिवस

लेटेस्ट

ख़ास ख़बरें

error: Content is protected !!