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नारों से नीतियों तक लोकतंत्र की असलियत पर आनंद रावत का तीखा राजनीतिक प्रहार

चुनावी नारों की ऐतिहासिक भूमिका, सैनिक-किसान नीतियों, अग्निवीर योजना, एमएसपी, आर्थिक असमानता और जनकल्याण पर सवाल उठाते हुए हरिद्वार विधानसभा प्रत्याशी आनंद रावत ने मौजूदा राजनीति की दिशा पर गहन और बेबाक दृष्टि रखी।

काशीपुर। हरिद्वार विधानसभा प्रत्याशी आनंद रावत ने देश की आज़ादी के बाद से लेकर वर्तमान राजनीतिक दौर तक चुनावी नारों और सरकारी नीतियों के प्रभाव को लेकर तीखा राजनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में नारे केवल शब्द नहीं होते, बल्कि वे देश की नीतियों, प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा तय करने का माध्यम बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद से कई ऐसे राजनीतिक उद्घोष सामने आए जिन्होंने आम जनता की सोच को प्रभावित किया और सरकारों की कार्यशैली को निर्धारित किया। उनके अनुसार साठ और सत्तर के दशक में दिया गया नारा जय जवान जय किसान केवल एक नारा नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का मूल मंत्र था, जिसने सैनिकों और किसानों को देश की रीढ़ के रूप में स्थापित किया। आनंद रावत ने कहा कि उस दौर में राजनीतिक नेतृत्व ने इन वर्गों को सशक्त बनाने के लिए योजनाओं और नीतियों को प्राथमिकता दी, जिससे देश की सुरक्षा और खाद्य आत्मनिर्भरता को मजबूती मिली और भारत वैश्विक स्तर पर आत्मविश्वास के साथ उभरने लगा।

राजनीतिक परिस्थितियों के ऐतिहासिक विश्लेषण में आनंद रावत ने कहा कि जब जय जवान जय किसान का उद्घोष किया गया तो उस समय कांग्रेस की सरकारों ने रक्षा और कृषि दोनों क्षेत्रों में व्यापक सुधारों की शुरुआत की। उन्होंने बताया कि भारतीय सेना को मजबूत करने के लिए आधुनिक संसाधनों और प्रशिक्षण सुविधाओं को बढ़ावा दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप सेना ने कई युद्धों में अपनी वीरता का परिचय दिया। आनंद रावत ने उल्लेख किया कि चाहे 1962 का युद्ध रहा हो, 1965 का संघर्ष हो, 1971 का ऐतिहासिक युद्ध या फिर कारगिल युद्ध, हर बार भारतीय सेना ने देश की रक्षा करते हुए अपनी क्षमता साबित की। उन्होंने कहा कि इन सफलताओं के पीछे सैनिकों के साहस के साथ-साथ सरकारों की दूरदर्शी नीतियां भी जिम्मेदार थीं, जिन्होंने सेना को मजबूत आधार प्रदान किया और सैनिकों के मनोबल को ऊंचा बनाए रखा।

सैनिकों के कल्याण से जुड़े विषयों पर बोलते हुए आनंद रावत ने कहा कि कांग्रेस सरकारों ने सैनिकों के पुनर्वास और सामाजिक सुरक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू की थीं। उन्होंने बताया कि जब कोई सैनिक सेवा से सेवानिवृत्त होकर अपने घर लौटता था तो सैनिक कल्याण बोर्ड के माध्यम से उसके परिवार की आर्थिक सहायता सुनिश्चित की जाती थी। आनंद रावत ने कहा कि सैनिकों की बेटियों की शादी के लिए इक्यावन हजार रुपये तक का अनुदान दिया जाता था और उनके बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए मेडिकल कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज में आरक्षित सीटों की व्यवस्था की गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि इन योजनाओं ने सैनिक परिवारों को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर दिया और युवाओं में सेना में भर्ती होने की प्रेरणा पैदा की, जिससे देश की रक्षा व्यवस्था मजबूत बनी रही।

उत्तराखंड के सैन्य परंपरा का उल्लेख करते हुए आनंद रावत ने कहा कि राज्य के जवानों ने हमेशा देश सेवा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने कुमाऊं रेजिमेंट, गढ़वाल रेजिमेंट और गोरखा रेजिमेंट का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि इन रेजिमेंटों के सैनिकों ने युद्ध के मैदान में अदम्य साहस दिखाया और भारत की सैन्य प्रतिष्ठा को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया। आनंद रावत ने कहा कि कांग्रेस सरकारों ने इन रेजिमेंटों के सैनिकों के पुनर्वास और उनके परिवारों के कल्याण के लिए कई योजनाएं संचालित की थीं, जिससे सैनिकों का मनोबल बढ़ा और समाज में सेना के प्रति सम्मान और विश्वास मजबूत हुआ। उन्होंने कहा कि यह नीतिगत सोच केवल सैनिकों की सुरक्षा तक सीमित नहीं थी बल्कि उनके सामाजिक और आर्थिक जीवन को भी सशक्त बनाने का प्रयास था।

कृषि क्षेत्र पर चर्चा करते हुए आनंद रावत ने कहा कि आज़ादी के बाद भारत को गंभीर खाद्यान्न संकट का सामना करना पड़ा था और उस समय अकाल तथा भुखमरी जैसी समस्याएं देश के सामने बड़ी चुनौती थीं। उन्होंने बताया कि कांग्रेस सरकारों ने किसानों को मजबूत बनाने के लिए सिंचाई परियोजनाओं और कृषि अनुसंधान को प्राथमिकता दी। आनंद रावत ने कहा कि भाखड़ा नगर डैम जैसे बड़े बांधों का निर्माण करके सिंचाई व्यवस्था को मजबूत किया गया और उन्नत बीजों के विकास के लिए वैज्ञानिक प्रयोगों को बढ़ावा दिया गया। उन्होंने कहा कि पंत नगर विश्व विद्यालय जैसे कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना ने कृषि अनुसंधान को नई दिशा दी और हरित क्रांति के माध्यम से देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ।

वर्तमान राजनीतिक दौर पर टिप्पणी करते हुए आनंद रावत ने कहा कि वर्ष 2014 के बाद भारतीय राजनीति में चुनावी नारों की दिशा बदल गई और ‘‘अच्छे दिन आएंगे’’, ‘‘अबकी बार मोदी सरकार’’, ‘‘अबकी बार चार सौ पार जैसे नारे लोकप्रिय हुए। उन्होंने कहा कि इन नारों के माध्यम से जनता के सामने विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के बड़े वादे किए गए, लेकिन इन वादों के परिणामों पर आज सवाल उठ रहे हैं। आनंद रावत ने कहा कि जनता ने इन नारों पर भरोसा करके सत्ता परिवर्तन किया, लेकिन समय के साथ लोगों को यह महसूस होने लगा कि जमीनी स्तर पर अपेक्षित बदलाव नहीं हुए और कई वर्गों को अपनी समस्याओं का समाधान नहीं मिल पाया।

सैनिकों से जुड़े मुद्दों पर वर्तमान नीतियों की आलोचना करते हुए आनंद रावत ने कहा कि अग्नि वीर योजना के लागू होने के बाद युवाओं में सेना में भर्ती को लेकर उत्साह कम हुआ है। उन्होंने कहा कि पहले सेना में भर्ती युवाओं के लिए सम्मान और स्थिर करियर का प्रतीक मानी जाती थी, लेकिन अब चार वर्ष की अस्थायी सेवा के बाद भविष्य की अनिश्चितता युवाओं को चिंतित कर रही है। आनंद रावत ने कहा कि अग्नि वीर योजना के तहत सेवा समाप्त होने के बाद सैनिकों को न तो पेंशन मिलती है और न ही अन्य सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं, जिससे युवाओं का मनोबल प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि केवल हथियारों और आधुनिक उपकरणों की खरीद से सेना मजबूत नहीं बनती, बल्कि उसे चलाने वाले सैनिकों का आत्मविश्वास और सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण होती है।

रक्षा बजट में वृद्धि के बावजूद आनंद रावत ने कहा कि सैनिकों की मूलभूत सुरक्षा और स्थिरता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि सेना की रीढ़ माने जाने वाले जवानों को ही भविष्य को लेकर चिंता होगी तो देश की रक्षा व्यवस्था पर भी असर पड़ेगा। आनंद रावत ने कहा कि भारत की सैन्य शक्ति केवल तकनीकी संसाधनों से नहीं बल्कि सैनिकों की निष्ठा और आत्मबल से बनती है और इसलिए नीतियों को इस दिशा में संतुलित होना चाहिए।

कृषि क्षेत्र में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए आनंद रावत ने कहा कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी का वादा किया गया था, लेकिन यह वादा पूरी तरह लागू नहीं हो पाया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में किसानों की आय को 2022 तक दोगुना करने का दावा किया गया था, लेकिन आज 2026 में भी किसान आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। आनंद रावत ने कहा कि किसानों को लागत बढ़ने, फसल का उचित मूल्य नहीं मिलने और बाजार में अस्थिरता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों पर चिंता जताते हुए आनंद रावत ने कहा कि अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौते से भारतीय किसानों को नुकसान होने की आशंका है। उन्होंने कहा कि यदि अमेरिकी कृषि उत्पाद सस्ते दामों पर भारतीय बाजार में उपलब्ध होंगे तो देश के किसानों की उपज की मांग कम हो जाएगी। आनंद रावत ने यह भी कहा कि भारतीय किसानों को अमेरिका में अपनी उपज बेचने पर अठारह प्रतिशत तक कर देना पड़ता है, जबकि अमेरिकी किसानों को भारत में शून्य प्रतिशत कर का लाभ मिलता है, जिससे प्रतिस्पर्धा असंतुलित हो रही है।

आम जनता से जुड़े मुद्दों पर बोलते हुए आनंद रावत ने कहा कि कांग्रेस का नारा कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ केवल राजनीतिक घोषणा नहीं था, बल्कि इसे नीतियों के माध्यम से लागू किया गया। उन्होंने कहा कि सूचना का अधिकार कानून लाकर सरकार की पारदर्शिता बढ़ाई गई और मनरेगा योजना के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर प्रदान किए गए। आनंद रावत ने कहा कि मध्यान्ह भोजन योजना ने गरीब परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सामाजिक समानता को बढ़ावा दिया।

वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए आनंद रावत ने कहा कि आज देश में अस्सी करोड़ लोग मुफ्त राशन लेने को मजबूर हैं, जो यह संकेत देता है कि आर्थिक असमानता बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि यदि आम जनता आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होगी तो देश का विकास भी संतुलित नहीं हो पाएगा। आनंद रावत ने कहा कि चुनावी नारों का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं होना चाहिए, बल्कि उन नारों के अनुरूप नीतियां बनाकर जनता को वास्तविक लाभ पहुंचाना आवश्यक है। हरिद्वार विधानसभा प्रत्याशी आनंद रावत ने अंत में कहा कि देश की जनता अब राजनीतिक नारों के पीछे की वास्तविकता को समझने लगी है और आने वाले समय में मतदाता केवल वादों पर नहीं बल्कि नीतियों और कार्यों के आधार पर निर्णय लेंगे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है जब सरकारें सैनिकों, किसानों और आम नागरिकों की समस्याओं को प्राथमिकता दें और राष्ट्र निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाएं।

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