देहरादून। ‘‘हिन्दी दैनीक सहारा प्रजातंत्र’’ ने सबसे पहले आपको यह खबर बताई थी कि देश की संसद में बहुप्रतीक्षित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ का संशोधन पेश होने की मुकम्मल तैयारी कर ली गई है। उत्तराखंड की राजनीति के गलियारों में इन दिनों एक ऐसी प्रचंड हलचल मची है जिसने सत्ता के गलियारों से लेकर पहाड़ की दुर्गम कंदराओं तक एक नई और गरमागरम बहस को जन्म दे दिया है। इस ऐतिहासिक कदम का सबसे व्यापक, गहरा और दूरगामी प्रभाव अगर किसी राज्य पर पड़ने वाला है, तो वह निश्चित रूप से उत्तराखंड ही होगा, क्योंकि यहाँ की भौगोलिक चुनौतियां और सामाजिक ताना-बाना पूरी तरह से महिलाओं की कर्मठता के इर्द-गिर्द घूमता है। विशेषज्ञों और राजनीतिक पंडितों के बीच इस बात को लेकर भारी चर्चा है कि यदि श्पचास औरत फलां फॉर्मूलेश् को धरातल पर उतारा जाता है, तो उत्तराखंड विधानसभा की तस्वीर और भूगोल पूरी तरह बदल जाएगा। इस नए गणित के अनुसार प्रदेश में सीटों की संख्या वर्तमान से बढ़कर एक सौ पाँच तक पहुँचने की प्रबल संभावना है। इस बदलाव का सबसे आकर्षक पहलू यह होगा कि सदन में पैंतीस महिलाएं सीधे तौर पर जीत कर आएंगी, क्योंकि उनके लिए ये सीटें विशेष रूप से आरक्षित कर दी जाएंगी, जो राज्य की सियासत में आधी आबादी की भागीदारी को एक नया और बेहद सशक्त आयाम प्रदान करेगा।
इसी सियासी गहमागहमी के बीच राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कंडवाल ने एक अचानक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर राजनीतिक हलकों में सबको चौंका दिया है। इस औचक वार्ता से गलियारों में यह सवाल तेजी से तैरने लगा है कि क्या भारतीय जनता पार्टी इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर एक व्यापक और मजबूत जमीन तैयार कर रही है। कुसुम कंडवाल ने मीडिया के सामने आकर जिस बेबाकी से अपनी बातें रखीं, उससे यह साफ संकेत मिलता है कि केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के महिला आयोगों में इसी तरह की प्रेस कॉन्फ्रेंस का एक सुनियोजित दौर शुरू हो गया है, जो किसी बहुत बड़े राष्ट्रीय बदलाव की ओर स्पष्ट इशारा करता है। महिला आयोग की अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरगामी सोच और उनके साहसी नेतृत्व की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि यह कदम महिलाओं को देश के नीति निर्धारण की मुख्यधारा में लाने का एक सुनहरा और ऐतिहासिक अवसर है। उन्होंने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया कि अब तक महिलाओं के लिए केवल नीतियां बनाई जाती थीं, लेकिन इस अधिनियम के लागू होने के बाद महिलाएं स्वयं नीति निर्माता (च्वसपबल डंामत) की भूमिका में नजर आएंगी, जो वास्तव में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक क्रांतिकारी और युगांतरकारी कदम साबित होने वाला है।
इस अचानक बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस के पीछे छिपे गहरे निहितार्थों को समझाते हुए कुसुम कंडवाल ने कहा कि महिला आयोग सदैव महिलाओं के सुख और दुख में उनके साथ एक अभिभावक की तरह खड़ा रहता है। जब देश में इतना बड़ा और सकारात्मक परिवर्तन आने जा रहा हो, तो आयोग का महिलाओं के साथ खड़ा होना न केवल नैतिक है बल्कि अनिवार्य भी है। उन्होंने आगामी संसद सत्र की संवेदनशीलता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि सोलह से अठारह तारीख के बीच संसद के विशेष सत्र में इस महत्वपूर्ण संशोधन को औपचारिक रूप से सदन के पटल पर रखा जाएगा। अध्यक्ष ने उत्तराखंड की महिलाओं की संघर्षशीलता का भावुक जिक्र करते हुए कहा कि पहाड़ जैसा कठिन और चुनौतीपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाली यहाँ की महिलाएं नेतृत्व की अद्भुत और जन्मजात क्षमता रखती हैं। पंचायतों में मिले पचास प्रतिशत आरक्षण का लाभ उठाकर उन्होंने पहले ही अपनी प्रशासनिक योग्यता और प्रबंधन कौशल को पूरी दुनिया के सामने सिद्ध कर दिया है। यह कोई रातों-रात बनी योजना नहीं है, बल्कि एक अत्यंत सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत महिलाओं को विधानसभा और लोकसभा में उनकी वाजिब हिस्सेदारी दिलाने की कोशिश की जा रही है, जिससे उनके राजनीतिक भविष्य की एक नई और स्वर्णिम इबारत लिखी जा सके।

वर्तमान में राजनीतिक हलकों में इस बात को लेकर भी भारी कयासबाजी और चर्चाएं हो रही हैं कि क्या इस आरक्षण को वर्ष दौ हज़ार उनतीस के लोकसभा चुनाव से पहले ही लागू किया जा सकता है? विशेषकर उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के संदर्भ में यह चर्चा और भी गर्म है, क्योंकि यहाँ वर्ष दौ हज़ार सत्ताईस में विधानसभा चुनाव होने हैं। हालांकि तकनीकी रूप से जनगणना को आधार बनाए जाने की बातें हो रही हैं और दौ हज़ार ग्यारह की जनगणना इस पूरे परिवर्तन का केंद्र बिंदु बन सकती है, लेकिन कुसुम कंडवाल के आत्मविश्वास भरे बयानों से यह साफ आभास होता है कि देश की महिलाएं इस लंबे इंतजार को अब और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं। उन्होंने इशारों-इशारों में यह भी संकेत दिया कि पंद्रह अप्रैल को एक बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित होने जा रहा है, जो संसद के विशेष सत्र से ठीक पहले महिला शक्ति के भव्य प्रदर्शन का एक सशक्त माध्यम बनेगा। इस पूरी कवायद का सीधा और स्पष्ट मतलब यही निकाला जा रहा है कि सरकार और संगठन मिलकर एक ऐसा मनोवैज्ञानिक माहौल तैयार कर रहे हैं जिससे महिलाओं को यह पूर्ण विश्वास दिलाया जा सके कि उनके सदन में पहुंचने का रास्ता अब पूरी तरह निष्कंटक और साफ हो चुका है। अब उन्हें बस चुनावी रणभूमि में उतरने की मुकम्मल तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।
उत्तराखंड के संदर्भ में एक सौ पाँच सीटों का जो नया और विस्तृत खाका खींचा जा रहा है, वह न केवल संख्या बल की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह राज्य की क्षेत्रीय राजनीति के पुराने समीकरणों को भी पूरी तरह से ध्वस्त और पुनर्निर्मित करने की अद्भुत क्षमता रखता है। सदन के भीतर पैंतीस महिला विधायकों की गरिमामयी उपस्थिति राज्य की मूलभूत समस्याओं, विशेषकर स्वास्थ्य सेवाओं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पहाड़ों से हो रहे निरंतर पलायन जैसे गंभीर मुद्दों पर एक नया, मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रदान करेगी। कुसुम कंडवाल ने जिस तरह से इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से महिलाओं को तैयारी करने का खुला आह्वान किया है, उसने राज्य की सक्रिय महिला कार्यकर्ताओं और नेतृत्व की आकांक्षा रखने वाली युवतियों में एक नया जोश और नई ऊर्जा भर दी है। अब पूरे प्रदेश की नजरें दिल्ली की ओर टिकी हुई हैं, जहां तीन दिवसीय संसद का विशेष सत्र यह अंतिम रूप से तय करेगा कि क्या वास्तव में इसी बार उत्तराखंड की महिलाओं को चुनाव लड़ने का वह ऐतिहासिक मौका मिल पाएगा जिसका वे पिछले कई दशकों से इंतजार कर रही थीं। चूंकि सत्ताईस के चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं रह गए हैं, इसलिए यह संसद सत्र उत्तराखंड की राजनीति के लिए श्गेम चेंजरश् साबित हो सकता है।





