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देहरादून स्मार्ट सिटी परियोजना में अनियमितताएं और वित्तीय लापरवाही ने सवाल खड़े किए

कैग रिपोर्ट में स्मार्ट रोड, सीवरेज, ई-गवर्नेंस और शैक्षिक परियोजनाओं में देरी, अनुचित भुगतान और उपकरणों के अप्रभावी उपयोग सहित कई गंभीर अनियमितताओं का खुलासा, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठे हैं।

देहरादून। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की नवीनतम रिपोर्ट ने देहरादून स्मार्ट सिटी परियोजना में हुई अनियमितताओं को सार्वजनिक कर दिया है, जिससे नगर निगम और परियोजना प्रबंधन पर कई गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। केंद्रीय सरकार की स्मार्ट सिटी मिशन योजना के तहत साल 2017 में देहरादून को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए चयनित किया गया था। इसके बाद 2018 से 2023 तक किए गए कार्यों का ऑडिट करने पर कई परियोजनाओं में नियमों के उल्लंघन, लापरवाही और अनुचित वित्तीय प्रबंधन के मामले सामने आए हैं। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया कि 2.93 करोड़ रुपए के कार्य बिना टेंडर प्रक्रिया के करवाए गए, जबकि ब्रिज एंड रूफ कंपनी (इंडिया) लिमिटेड को अनुचित कार्य संचालन के चलते बाहर किया गया। इसके बावजूद 19.06 करोड़ रुपए की बची हुई राशि की वसूली नहीं की गई। इससे यह संकेत मिलता है कि परियोजना में न केवल वित्तीय अनुशासन का अभाव था बल्कि कार्य निष्पादन और परियोजना निगरानी में भी गंभीर कमी रही। यह मामला देहरादून स्मार्ट सिटी लिमिटेड की जवाबदेही और पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।

कैग की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2019 में देहरादून स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने ब्रिज एंड रूफ कंपनी के साथ स्मार्ट रोड, सीवरेज कार्य और ड्रेनेज कार्यों के लिए एमओयू किया था। इस एमओयू के तहत कंपनी को कुल 76.84 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया, ताकि काम समय पर पूरा हो सके। निर्धारित समय सीमा दिसंबर 2020 और जुलाई 2021 तक थी, लेकिन काम में देरी और गुणवत्ता में कमी के कारण आवागमन और दैनिक जीवन प्रभावित हुआ। इसके चलते सितंबर 2022 में देहरादून स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने एमओयू समाप्त कर कंपनी को बाहर का रास्ता दिखा दिया। इस अवधि में ब्रिज एंड रूफ कंपनी ने कुल 76.84 करोड़ रुपए में से 57.78 करोड़ रुपए खर्च किए, लेकिन बची हुई 19.06 करोड़ रुपए की राशि वसूली नहीं की गई। कैग रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि स्मार्ट सिटी को इस धनराशि की वसूली करनी चाहिए थी, लेकिन जिम्मेदारों ने कोई कार्रवाई नहीं की। यह स्थिति वित्तीय अनुशासन और परियोजना प्रबंधन की गंभीर कमी को दर्शाती है, जिससे यह प्रश्न उठता है कि क्या ऐसे परियोजनाओं में उचित निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित की जा रही है।

स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत हुए अनुबंधों में लापरवाही और देरी के मामले अन्य कार्यों में भी सामने आए हैं। परेड ग्राउंड जीर्णोद्धार परियोजना के लिए अक्टूबर 2019 में ठेकेदार के साथ 18.92 करोड़ रुपए का अनुबंध किया गया था, जिसे एक वर्ष में यानी अक्टूबर 2020 तक पूरा किया जाना था। लेकिन फरवरी 2023 तक यह कार्य पूरा नहीं हो सका। ठेकेदार से अनुबंध समाप्त कर दिया गया, जबकि 1.41 करोड़ रुपए का अर्थदंड वसूलना आवश्यक था, जिसे लागू नहीं किया गया। कैग रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि स्मार्ट सिटी परियोजना का काम जून 2023 तक पूरा होना था, लेकिन इसे 2024 तक बढ़ा दिया गया। परियोजना के लिए कुल 1000 करोड़ रुपए का बजट निर्धारित किया गया था, जिसमें से 2023 तक 737 करोड़ रुपए जारी किए गए, जबकि 634.11 करोड़ रुपए ही खर्च किए गए। इस वित्तीय प्रबंधन ने स्पष्ट किया कि योजना और कार्यान्वयन में समय प्रबंधन, बजट नियंत्रण और अनुशासन का अभाव रहा।

स्मार्ट सिटी की सभी 22 परियोजनाओं का ऑडिट करने पर कई तकनीकी और उपकरण संबंधी अनियमितताएं भी सामने आईं। उदाहरण के लिए, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर परियोजना के तहत ई-गवर्नेंस समाधान में 04.55 करोड़ रुपए की लागत से बायोमेट्रिक और सेंसर प्रणाली विकसित की गई थी, जिसे मार्च 2022 में लागू करना था, लेकिन इसे फरवरी 2025 तक लागू नहीं किया गया। स्मार्ट अपशिष्ट वाहन योजना के तहत 90 लाख रुपए खर्च कर खरीदा गया ई-रिक्शा दो वर्षों तक संचालित नहीं हुआ। देहरादून शहर में मौसम संबंधी जानकारी के लिए 2.06 करोड़ रुपए की लागत से पर्यावरण सेंसर लगाए गए, लेकिन उनका उपयोग नहीं किया गया। मल्टी यूटिलिटी डक्ट पर 3.24 करोड़ रुपए खर्च किए गए, लेकिन इसका कार्यान्वयन भी नहीं हुआ। इसी तरह, सिटीज इन्वेस्टमेंट टू इनोवेट, इंटीग्रेट एंड सस्टेन परियोजना के लिए परियोजना प्रबंधन सलाहकार को 5.19 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया, जो अनुचित पाया गया। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि स्मार्ट सिटी परियोजना के सभी पहलुओं में निगरानी और कार्यान्वयन की गंभीर कमी रही है।

शैक्षिक संस्थानों में स्मार्ट तकनीक के उपयोग के मामले में भी कैग ने कई गंभीर अनियमितताएं पाई हैं। तीन सरकारी स्कूलों में 5.91 करोड़ रुपए की लागत से प्रोजेक्टर, ई-कंटेंट, इंटरेक्टिव बोर्ड, कंप्यूटर लैब, सीसीटीवी और बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली स्थापित की गई थी, लेकिन अत्यधिक बिजली बिल आने के कारण इन सभी स्मार्ट उपकरणों का संचालन प्रभावी ढंग से नहीं हो पाया। माडर्न दून लाइब्रेरी परियोजना में 24.70 लाख रुपए का अधिक भुगतान किया गया। स्मार्ट रोड परियोजना के तहत चकराता रोड के 1.9 किमी भाग में से 950 मीटर भाग तय प्रक्रिया के बाहर शामिल कर 19.47 करोड़ रुपए का अनुचित व्यय किया गया। इसके अलावा वित्तीय वर्ष 2017-18 से 2020-21 तक दो करेंट खातों में राशि जमा कराने के कारण 6.2 करोड़ रुपए के ब्याज का नुकसान हुआ। इन सभी मुद्दों ने यह संकेत दिया कि परियोजना में वित्तीय पारदर्शिता और नियामक अनुपालन की गंभीर कमी रही है।

देहरादून स्मार्ट सिटी परियोजना की यह रिपोर्ट इस बात को भी उजागर करती है कि तकनीकी और डिजिटल पहल की योजना बनाने और उनका कार्यान्वयन करने में गंभीर लापरवाही हुई। कई परियोजनाओं में समय पर कार्य पूरा नहीं हुआ, उपकरणों का सही उपयोग नहीं किया गया और अनुबंधों में देरी के बावजूद अर्थदंड की वसूली नहीं की गई। स्मार्ट सिटी के इन कार्यों में समय प्रबंधन और जिम्मेदारी का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। इससे नागरिकों के जीवन और शहर के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। रिपोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि भविष्य में ऐसी परियोजनाओं में नियामक प्रावधानों और वित्तीय अनुशासन को कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए।

कुल मिलाकर, देहरादून स्मार्ट सिटी परियोजना के ऑडिट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बड़े बजट वाली सरकारी परियोजनाओं में पारदर्शिता, समय प्रबंधन और वित्तीय नियंत्रण अत्यंत आवश्यक हैं। ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया कि कई कार्य बिना टेंडर प्रक्रिया के कराए गए, कुछ अनुबंधों में लापरवाही बरती गई और कई ठेकेदारों से बची हुई राशि की वसूली नहीं की गई। इसके परिणामस्वरूप परियोजनाओं में देरी हुई, तकनीकी उपकरणों का सही उपयोग नहीं हो पाया और जनता के लिए बनाए गए स्मार्ट समाधान पूरी तरह से प्रभावी नहीं रह सके। इस प्रकार की अनियमितताएं न केवल परियोजना की सफलता पर सवाल उठाती हैं, बल्कि जनता का विश्वास और सरकारी संसाधनों का सही उपयोग भी प्रभावित होता है। यह रिपोर्ट प्रशासन और नागरिक दोनों के लिए चेतावनी के रूप में काम करती है कि योजनाओं की निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना स्मार्ट सिटी जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

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