देहरादून। देवभूमि की शांत वादियों और अपनी उत्कृष्ट शिक्षा व्यवस्था के लिए विश्वभर में विख्यात देहरादून इन दिनों अपराध की काली परछाईं के साये में सिसकने को मजबूर है, जहां हर बीतता दिन किसी न किसी नई खौफनाक वारदात की गवाही दे रहा है। जिसे कभी ‘एजुकेशन हब’ और ‘रिटायरमेंट पैराडाइज’ कहा जाता था, वह अब अपराधियों की सुरक्षित पनाहगाह और युवाओं के भटकते रास्तों का गवाह बनता जा रहा है, जिससे न केवल स्थानीय नागरिकों में दहशत का माहौल है बल्कि शासन-प्रशासन के माथे पर भी गहरी चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। वर्तमान में राजधानी में बढ़ती ये आपराधिक घटनाएं केवल खाकी वर्दी और पुलिसिया गश्त के लिए एक कठिन चुनौती भर नहीं हैं, बल्कि यह हमारे भीतर बसने वाले उस जागरूक समाज, संस्कारी परिवार और नैतिकता सिखाने वाली शिक्षा व्यवस्था तीनों के लिए एक बहुत बड़ी और अंतिम चेतावनी के रूप में सामने आई हैं। यदि समय रहते हमने अपने गिरते हुए नैतिक मूल्यों और सामाजिक ताने-बाने को नहीं संभाला, तो वह दिन दूर नहीं जब देहरादून अपनी पुरानी गौरवशाली पहचान खोकर अपराध और अराजकता की एक नई और डरावनी वैश्विक पहचान के साथ जाना जाने लगेगा।
पर्यटन और शिक्षा के इस संगम में अपराध की जड़ें इतनी गहरी होती जा रही हैं कि अब हर घर के भीतर एक अनजाना डर समाया हुआ है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक सुरक्षित भविष्य दे पा रहे हैं। इस बदलते और असुरक्षित माहौल के पीछे सबसे बड़ा कारण हमारी वर्तमान पेरेंटिंग शैली में आई वह गिरावट है, जहां भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ में माता-पिता अपने बच्चों को संस्कार और समय देने के बजाय महंगे गैजेट्स और अनियंत्रित आजादी सौंप रहे हैं। अगर समय रहते परवरिश के इन पुराने और मजबूत तरीकों में सुधार नहीं किया गया, तो आधुनिकता की यह चकाचौंध हमारे नौनिहालों को अपराध की उस अंधी गली में धकेल देगी जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं बचता है। परिवारों के भीतर संवाद की कमी और बच्चों की गतिविधियों पर नजर न रखना ही वह प्रमुख छिद्र है, जिससे होकर अपराध की मानसिकता धीरे-धीरे हमारे घरों में प्रवेश कर रही है और युवाओं को गलत रास्तों पर चलने के लिए उकसा रही है।
उत्तराखंड की इस राजधानी में स्थित बड़े-बड़े नामी शिक्षा संस्थानों ने भी अपनी उस बुनियादी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया है, जो कभी केवल किताबी ज्ञान देने तक सीमित नहीं थी बल्कि एक चरित्रवान नागरिक बनाने का आधार हुआ करती थी। आज के ये संस्थान केवल भारी-भरकम फीस वसूलने वाले व्यापारिक केंद्र बनकर रह गए हैं, जहां छात्रों की मानसिक स्थिति और उनकी नैतिक प्राथमिकताओं पर ध्यान देने वाला कोई नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप कैंपस के भीतर और बाहर नशीले पदार्थों का सेवन और गुटबाजी एक आम बात हो गई है। जब तक ये शिक्षण संस्थान अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे और शिक्षा के साथ-साथ अनुशासन एवं मानवीय मूल्यों का पाठ नहीं पढ़ाएंगे, तब तक देहरादून की सड़कों पर युवाओं के हाथों में किताबों की जगह हथियार और नशा ही दिखाई देगा। यह बेहद दुखद है कि जिस शहर को ज्ञान का मंदिर माना जाता था, वहां के छात्र ही अब छोटी-छोटी बातों पर खूनी संघर्ष और गंभीर अपराधों में लिप्त पाए जा रहे हैं, जो हमारी पूरी शैक्षणिक व्यवस्था की विफलता का एक जीता-जागता प्रमाण है।

आज के इस दौर में देहरादून के युवाओं ने भी अपनी जीवन की प्राथमिकताओं को जिस तरह से बदला है, उसने समाज के बुद्धिजीवियों को गहरा सदमा पहुँचाया है क्योंकि अब उनका ध्यान शिक्षा और करियर के बजाय शॉर्टकट से पैसा कमाने और दिखावे की दुनिया में अपनी धाक जमाने पर अधिक केंद्रित हो गया है। सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल और वेब सीरीज में दिखाई जाने वाली ग्लैमरस अपराध की दुनिया ने किशोरों के दिमाग में इस कदर घर कर लिया है कि वे अब कानून तोड़ने को अपनी बहादुरी समझने लगे हैं। यदि युवाओं ने स्वयं अपनी सोच को नहीं बदला और अपनी असीम ऊर्जा को सकारात्मक कार्यों और राष्ट्र निर्माण में नहीं लगाया, तो इस एजुकेशन हब का नाम धीरे-धीरे काली स्याही से लिखा जाएगा और यहाँ की फिजाओं में सिर्फ खौफ का बसेरा होगा। प्राथमिकताएं बदलने का अर्थ केवल बेहतर करियर चुनना नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदार इंसान बनकर अपने शहर की गरिमा को बनाए रखना भी है, लेकिन दुर्भाग्यवश वर्तमान स्थिति इसके बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है।
अब सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न हमारे सामने यह खड़ा है कि इस बदहाल होती व्यवस्था और बढ़ते हुए अपराध की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा—क्या केवल पुलिस को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारियों से बच सकते हैं, या फिर परिवार और पूरे समाज को कटघरे में खड़ा होना होगा? पुलिस तंत्र निश्चित रूप से कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जवाबदेह है, लेकिन जब तक परिवार अपने बच्चों को सही-गलत का भेद नहीं सिखाएंगे और समाज गलत करने वालों का बहिष्कार करने के बजाय चुप्पी साधे रहेगा, तब तक कोई भी पुलिस बल अपराध को जड़ से खत्म नहीं कर सकता। यह एक सामूहिक जिम्मेदारी का विषय है जिसमें पुलिस, परिवार और समाज को एक इकाई बनकर कार्य करना होगा ताकि देहरादून को उस नरक में तब्दील होने से बचाया जा सके जिसकी ओर यह तेजी से अग्रसर है। सामूहिक जवाबदेही की कमी ही वह सबसे बड़ी वजह है जिसके कारण अपराधी आज बेखौफ हैं और आम नागरिक असहाय महसूस कर रहा है, इसलिए अब समय आ गया है कि हम सभी मिलकर इस चेतावनी को समझें और अपने शहर को बचाने के लिए ठोस कदम उठाएं।
राजधानी देहरादून के गलियों और मोहल्लों में सरेआम होती वारदातों ने यह सिद्ध कर दिया है कि केवल कानून का डंडा चलाने से समाधान नहीं निकलेगा, बल्कि समाज को अपने भीतर झाँकने की सख्त आवश्यकता है ताकि बुराई को पनपने से रोका जा सके। हम अक्सर दूसरों की गलतियों पर उंगली उठाते हैं, लेकिन जब हमारे अपने बच्चे देर रात तक घर से बाहर रहते हैं या अचानक महंगी चीजें खरीदने लगते हैं, तब हमारी खामोशी ही भविष्य के अपराधी को जन्म देती है। यदि प्रत्येक नागरिक अपने आस-पास होने वाली संदिग्ध गतिविधियों के प्रति जागरूक हो जाए और पुलिस का सहयोग करने के लिए आगे आए, तो देहरादून की खोई हुई शांति को पुनः स्थापित किया जा सकता है। पुलिस विभाग को भी चाहिए कि वह केवल केस दर्ज करने तक सीमित न रहे, बल्कि सामुदायिक पुलिसिंग के जरिए युवाओं और परिवारों के साथ सीधा संवाद स्थापित करे ताकि अपराध की जड़ पर प्रहार किया जा सके और एक भयमुक्त वातावरण का निर्माण हो सके।

डिजिटल युग की इस अंधी दौड़ में इंटरनेट और मोबाइल फोन ने अपराध के नए आयाम खोल दिए हैं, जिससे देहरादून जैसे शांत शहर के मासूम बच्चे साइबर क्राइम और हिंसक प्रवृत्तियों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं, जो एक गंभीर सामाजिक संकट है। शिक्षा संस्थानों को अब न केवल सिलेबस पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए, बल्कि उन्हें छात्रों के लिए काउंसलिंग सेशन और मोरल साइंस की कक्षाओं को अनिवार्य बनाना होगा ताकि वे अपनी भावनाओं और कुंठाओं को सही दिशा दे सकें। समाज के प्रबुद्ध वर्ग, रिटायर्ड अधिकारियों और सामाजिक संस्थाओं को भी आगे आकर मोहल्ला स्तर पर कमेटियां बनानी चाहिए जो युवाओं की गतिविधियों पर पैनी नजर रख सकें और उन्हें भटकने से बचा सकें। देहरादून की साख को बचाना अब किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है, बल्कि यह एक मिशन होना चाहिए जिसमें सरकार से लेकर आम जनता तक सबको अपनी आहुति देनी होगी, वरना यह ‘सिटी ऑफ ड्रीम्स’ बहुत जल्द ‘सिटी ऑफ क्राइम’ बनकर रह जाएगा।
देहरादून आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां से एक रास्ता गौरवशाली भविष्य की ओर जाता है और दूसरा बर्बादी की उस गहरी खाई की ओर, जहां से वापस लौटना नामुमकिन होगा। हमें यह समझना होगा कि अपराध की हर घटना हमारे सामाजिक ढांचे में लगी एक छोटी सी दरार है, जो समय के साथ पूरे भवन को ढहा सकती है, इसलिए प्रत्येक नागरिक को सजग प्रहरी बनना होगा। पेरेंटिंग में सुधार, संस्थानों में नैतिक शिक्षा की बहाली और युवाओं में जिम्मेदारी का अहसास ही वे तीन मुख्य स्तंभ हैं जिन पर एक सुरक्षित देहरादून की नींव टिकी हुई है। अगर हम आज भी नहीं जागे और जिम्मेदारी को एक-दूसरे पर थोपते रहे, तो आने वाली नस्लें हमें कभी माफ नहीं करेंगी और एजुकेशन हब की यह देवभूमि सिर्फ अपराध की एक नई और शर्मनाक पहचान बनकर इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी। अब यह फैसला हमारे हाथ में है कि हम पुलिस के डंडे के साये में जीना चाहते हैं या फिर एक संस्कारी और सुरक्षित समाज के निर्माण में अपना योगदान देकर देहरादून की पुरानी रौनक वापस लाना चाहते हैं।





