देहरादून। उत्तराखंड परिवहन निगम से जुड़े लगभग पांच हजार कर्मचारियों के जीवन में वेतन संकट ने गहरा असर डाल दिया है, जिससे उनके परिवारों में आर्थिक अस्थिरता के साथ सामाजिक और भावनात्मक तनाव भी तेजी से बढ़ रहा है। तीन महीने से वेतन न मिलने के कारण कर्मचारियों का जीवन संघर्ष और अनिश्चितताओं से भर गया है। जिन कर्मचारियों ने वर्षों तक यात्रियों की सेवा करते हुए राज्य की परिवहन व्यवस्था को मजबूत बनाए रखा, आज वही कर्मचारी अपने परिवार की बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आर्थिक संकट का यह दौर केवल पैसों की कमी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे पारिवारिक रिश्तों में भी दरार पड़ने लगी है। कई कर्मचारियों ने बताया कि वे नियमित रूप से ड्यूटी निभा रहे हैं, लेकिन घर लौटने पर उन्हें बच्चों की फीस, राशन और दवाइयों की चिंता सताती है। लगातार बढ़ती परेशानियों ने कर्मचारियों के मानसिक संतुलन को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है, जिससे उनका दैनिक जीवन कठिन परिस्थितियों में गुजर रहा है।
परिस्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई कर्मचारियों के बच्चों को फीस जमा न करने के कारण स्कूल से निकाल दिया गया है। रिपोर्ट में बताया गया कि एक परिचालक का दस वर्षीय बेटा हाल ही में रोते हुए घर लौटा क्योंकि स्कूल प्रशासन ने साफ शब्दों में कह दिया कि फीस जमा होने तक उसे कक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह घटना कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति का दर्दनाक उदाहरण बनकर सामने आई है। परिवार पहले से ही उधार लेकर राशन चला रहे थे और अब स्कूल फीस की व्यवस्था करना उनके लिए असंभव हो गया है। कर्मचारी पिता ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि नौकरी होने के बावजूद बच्चों को शिक्षा से वंचित करना उनके लिए सबसे बड़ी पीड़ा है। उन्होंने कहा कि यदि वेतन समय पर मिलता तो उनके बच्चे को इस अपमान का सामना नहीं करना पड़ता। इस घटना ने कर्मचारियों के बीच गहरी चिंता और असंतोष पैदा कर दिया है।
वेतन संकट का असर केवल बच्चों की पढ़ाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे सामाजिक रिश्तों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि एक चालक, जिसकी शादी छह महीने पहले तय हुई थी, उसकी सगाई टूट गई क्योंकि लड़की पक्ष ने यह कहते हुए रिश्ता समाप्त कर दिया कि नौकरी होने के बावजूद आय नहीं है तो भविष्य सुरक्षित कैसे होगा। इस घटना ने कर्मचारी के परिवार को मानसिक रूप से तोड़कर रख दिया है। कर्मचारी ने बताया कि तीन महीने से वेतन न मिलने के कारण उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई और शादी की तैयारियां भी अधूरी रह गईं। परिवार के सदस्यों को समाज के सामने शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। यह घटना बताती है कि वेतन संकट ने कर्मचारियों के व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक प्रतिष्ठा को भी प्रभावित किया है। ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं, जहां आर्थिक अस्थिरता ने पारिवारिक संबंधों को कमजोर कर दिया है।
काशीपुर डिपो से सामने आई घटनाओं ने इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट कर दिया है। डिपो से जुड़े चालक उत्तम सिंह ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि नौकरी होने के बावजूद उनके हाथ खाली हैं और परिवार की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि जेब में पैसे न होने के कारण उन्हें रोजमर्रा के खर्चों के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। उत्तम सिंह ने बताया कि परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए उन्होंने पहले बचत का सहारा लिया, लेकिन अब वह भी समाप्त हो चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि कई कर्मचारियों की स्थिति उनसे भी अधिक खराब है, जहां घर का खर्च चलाना लगभग असंभव हो गया है। उनकी बातों से स्पष्ट हुआ कि वेतन संकट ने कर्मचारियों के आत्मविश्वास और जीवनशैली को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
आर्थिक तंगी का असर कर्मचारियों के घरेलू जीवन पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। कई परिवारों ने बताया कि किराने की दुकानों से उधार मिलना बंद हो गया है क्योंकि पुराने बकाया का भुगतान नहीं हो पाया है। दुकानदारों ने कर्मचारियों से साफ कह दिया है कि पहले पुराने पैसे चुकाएं, तभी नया सामान दिया जाएगा। कई घरों में गैस सिलेंडर खाली पड़े हैं और परिवार भोजन के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। कुछ कर्मचारियों ने बताया कि घर में राशन समाप्त हो चुका है और बच्चों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है। यह स्थिति कर्मचारियों के लिए बेहद पीड़ादायक बन गई है। परिवारों को अब उधार मांगने में भी संकोच महसूस होने लगा है, जिससे उनकी सामाजिक स्थिति भी प्रभावित हो रही है।
वेतन संकट का असर कर्मचारियों के स्वास्थ्य और दैनिक जीवन पर भी पड़ रहा है। कई परिवारों में बीमार माता-पिता की दवाइयों की व्यवस्था करना कठिन हो गया है। बच्चों की पढ़ाई से जुड़े खर्च जैसे कॉपी-किताबें और स्कूल सामग्री खरीदना भी चुनौती बन गया है। कर्मचारियों ने बताया कि रोजमर्रा के खर्चों का बोझ इतना बढ़ गया है कि उन्हें कई जरूरी जरूरतों को नजरअंदाज करना पड़ रहा है। कुछ कर्मचारियों ने बताया कि मकान मालिक लगातार किराया देने का दबाव बना रहे हैं और कई बार घर खाली करने की चेतावनी भी दी जा रही है। यह स्थिति कर्मचारियों और उनके परिवारों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रही है।
कर्मचारियों का दर्द अब इंटरनेट मीडिया के माध्यम से भी सामने आने लगा है। काशीपुर डिपो से जुड़े चालक उत्तम सिंह की आवाज सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद यह मामला व्यापक चर्चा का विषय बन गया है। कर्मचारियों की समस्याओं को परिवहन विभाग के प्रदेश महामंत्री उमेश चौधरी तक भी पहुंचाया गया है। कर्मचारियों ने उम्मीद जताई कि उनकी समस्याओं का समाधान जल्द निकाला जाएगा। वायरल ऑडियो में कर्मचारियों ने बताया कि यदि समय पर वेतन नहीं मिला तो उनके परिवारों का जीवन और अधिक कठिन हो जाएगा। सोशल मीडिया पर यह मुद्दा उठने के बाद कर्मचारियों के बीच जागरूकता और एकजुटता बढ़ने लगी है।
कर्मचारियों का कहना है कि वे राज्य की परिवहन व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए लगातार मेहनत कर रहे हैं, लेकिन उनके अपने परिवार आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। कर्मचारियों ने बताया कि बसों का संचालन नियमित रूप से हो रहा है और यात्रियों को सेवाएं दी जा रही हैं, लेकिन उनकी मेहनत का उचित प्रतिफल नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि वे अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं, लेकिन वेतन न मिलने से उनका मनोबल टूटता जा रहा है। कर्मचारियों ने सरकार और निगम प्रशासन से मांग की है कि उनकी समस्याओं का शीघ्र समाधान किया जाए ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।
इस मामले में निगम प्रशासन की प्रतिक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार जब इस विषय पर निगम के महाप्रबंधक क्रांति सिंह से संपर्क करने की कोशिश की गई तो उन्होंने फोन नहीं उठाया। कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि यदि प्रशासन समय रहते उचित कदम नहीं उठाता तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। कर्मचारियों ने चेतावनी दी कि वेतन न मिलने की स्थिति में उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ सकता है।
परिवारों के टूटते रिश्ते और आर्थिक संकट ने कर्मचारियों के जीवन में निराशा का माहौल बना दिया है। कई कर्मचारियों ने बताया कि वे अपने बच्चों के भविष्य को लेकर बेहद चिंतित हैं। बच्चों की पढ़ाई रुकने और पारिवारिक तनाव बढ़ने से उनका मानसिक संतुलन प्रभावित हो रहा है। परिवारों में तनाव और विवाद बढ़ने लगे हैं, जिससे घरेलू वातावरण भी खराब हो गया है। कर्मचारियों ने कहा कि वे अपने परिवार की खुशियों को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन आर्थिक संकट ने उनकी कोशिशों को कमजोर कर दिया है।
सामाजिक स्तर पर भी इस संकट का असर दिखाई देने लगा है। कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने से उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित हो रही है। कई कर्मचारियों ने बताया कि रिश्तेदारों और परिचितों के सामने उन्हें शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है। आर्थिक संकट ने उनके आत्मसम्मान को भी प्रभावित किया है। कर्मचारियों का कहना है कि यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो उनके परिवारों पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वेतन संकट केवल कर्मचारियों की व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने से स्थानीय बाजार और सामाजिक व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है। यदि कर्मचारियों की आय नियमित नहीं होगी तो इसका प्रभाव पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि निगम प्रशासन और सरकार को इस समस्या का स्थायी समाधान निकालना चाहिए।
उत्तराखंड परिवहन निगम से जुड़े कर्मचारियों का यह संकट अब केवल आर्थिक समस्या नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है। कर्मचारियों ने उम्मीद जताई है कि प्रशासन उनकी समस्याओं को समझेगा और जल्द समाधान निकालेगा। वेतन संकट ने कर्मचारियों के जीवन में जो कठिन परिस्थितियां पैदा की हैं, उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि समय पर वेतन मिलना कर्मचारियों के लिए केवल अधिकार नहीं बल्कि उनके परिवारों के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न बन गया है।





