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जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में पर्यटकों की भारी गिरावट और करोड़ों के राजस्व का बड़ा संकट

खराब प्रबंधन और महंगी सफारी से जिम कॉर्बेट की चमक पड़ी फीकी, 58 हजार सैलानियों ने फेरा मुंह, करोड़ों का राजस्व डूबा और नए पर्यटन जोनों की बढ़ती धमक से खतरे में विश्व प्रसिद्ध पार्क का वजूद।

रामनगर। विश्व विख्यात जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के गलियारों से इस बार बेहद चौंकाने वाली और चिंताजनक खबर सामने आ रही है, जिसने पर्यटन जगत के दिग्गजों और वन्यजीव प्रेमियों की नींद उड़ा दी है। कभी बाघों की दहाड़ और पर्यटकों की भारी भीड़ से गुलजार रहने वाला यह स्वर्ग इस वित्तीय वर्ष में सन्नाटे और आर्थिक गिरावट की गिरफ्त में नजर आ रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के विश्लेषण से यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि प्रकृति की गोद में बसने वाले इस पार्क की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है, जिससे न केवल सैलानियों की संख्या में भारी कमी आई है बल्कि पार्क के खजाने को भी करोड़ों की चपत लगी है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान कॉर्बेट की खूबसूरती का दीदार करने के लिए महज 4,00,946 शौकीन ही यहां पहुंच सके, जिनमें 3,89,997 देसी भारतीय और केवल 10,949 विदेशी मेहमान शामिल थे। इस भारी गिरावट के चलते पार्क का कुल राजस्व सिमटकर 27 करोड़ 75 लाख 28 हजार रुपए के स्तर पर पहुंच गया है, जो कि भविष्य के लिए एक बड़ा खतरे का संकेत माना जा रहा है।

पर्यटन के इस गिरते साम्राज्य की तुलना अगर पिछले वित्तीय वर्ष 2024-25 से की जाए, तो तस्वीर और भी भयावह नजर आती है क्योंकि उस दौरान रिकॉर्ड 4,59,395 पर्यटकों ने जंगल की सैर का आनंद लिया था। इसका सीधा मतलब यह है कि महज एक साल के भीतर ही करीब 58 हजार से अधिक सैलानियों ने जिम कॉर्बेट से अपना मुंह मोड़ लिया है और यह संख्या कोई सामान्य गिरावट नहीं बल्कि एक बड़े संकट की आहट है। वन्यजीव विशेषज्ञ और जमीनी स्तर पर काम करने वाले वरिष्ठ नेचर गाइड संजय छिमवाल इस स्थिति के पीछे की कड़वी सच्चाई बयां करते हुए कहते हैं कि सफारी की कीमतों में की गई बेतहाशा बढ़ोतरी ने मध्यम वर्गीय परिवारों के बजट का गणित पूरी तरह बिगाड़ दिया है। आज के समय में जब महंगाई अपने चरम पर है, लोग घूमने-फिरने से पहले अपनी जेब का आकलन बहुत बारीकी से करते हैं और कॉर्बेट का महंगा सफर अब आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है, जिससे वे अन्य सस्ते और सुलभ विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।

कॉर्बेट के इस फीके पड़ते आकर्षण के पीछे सिर्फ पैसा ही एकमात्र कारण नहीं है, बल्कि ऑनलाइन बुकिंग की पेचीदा और सिरदर्द पैदा करने वाली प्रक्रिया ने भी पर्यटकों के उत्साह को ठंडा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ढिकाला जैसे विश्व प्रसिद्ध और लोकप्रिय जोन में रात गुजारने या सफारी करने के लिए परमिट हासिल करना अब किसी जंग जीतने जैसा हो गया है, जहां समय पर बुकिंग न मिलने के कारण निराश होकर लोग अपना रास्ता बदल लेते हैं। इसके विपरीत, सीताबनी और फाटो जैसे नए उभरते हुए पर्यटन क्षेत्रों ने अपनी आसान बुकिंग प्रणाली और शानदार टाइगर साइटिंग की संभावनाओं के दम पर पर्यटकों को अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया के इस दौर में इन वैकल्पिक जोनों का आक्रामक प्रचार और वहां मिलने वाली नाइट स्टे की बेहतर सुविधाएं सैलानियों को एक नया और रोमांचक अनुभव प्रदान कर रही हैं, जबकि मुख्य कॉर्बेट पार्क अपने पुराने ढर्रे और जटिल नियमों के जाल में उलझकर अपनी पुरानी चमक खोता हुआ प्रतीत हो रहा है।

बाजार की इस बदली हुई रणनीति में ट्रैवल एजेंटों की भूमिका भी एक बड़े खेल के रूप में सामने आई है, जिस पर वन्यजीव प्रेमी राजेश भट्ट ने तीखी टिप्पणी की है। उनका मानना है कि कई चतुर एजेंट पर्यटकों को लुभाने के लिए जिम कॉर्बेट के नाम का बड़ा ब्रांड तो इस्तेमाल करते हैं, लेकिन असलियत में वे उन्हें कम शुल्क वाले और निजी मुनाफे वाले वैकल्पिक क्षेत्रों जैसे कि फाटो या हाथीडंगर की ओर मोड़ देते हैं। रामनगर के तराई पश्चिमी और वन प्रभाग में स्थित ये क्षेत्र एजेंटों के लिए अधिक कमीशन का जरिया बन रहे हैं क्योंकि मुख्य जोनों में वाहनों की संख्या सीमित है और प्रवेश प्रक्रिया बहुत कठोर है। पवलगड़, सीताबनी और कॉर्बेट हेरिटेज जैसे जोन भले ही मुख्य पार्क की सीमाओं से बाहर हों, लेकिन एजेंटों की चतुराई और आसान उपलब्धता के चलते पर्यटक वहीं खुश हो जाते हैं, जिसका खामियाजा सीधे तौर पर कॉर्बेट के आधिकारिक राजस्व और उसकी गरिमा को भुगतना पड़ रहा है, जो कि प्रशासनिक विफलता का भी एक बड़ा उदाहरण है।

वर्तमान में कॉर्बेट पार्क के भीतर ढिकाला, बिजरानी, झिरना, ढेला, दुर्गादेवी, सोननदी, गर्जिया और पाखरो जैसे कुल 8 महत्वपूर्ण सफारी जोन मौजूद हैं, जिनमें से कुछ तो पूरे साल खुले रहते हैं लेकिन फिर भी वे पर्यटकों को रोकने में नाकाम साबित हो रहे हैं। राजेश भट्ट और अन्य विशेषज्ञों का साफ तौर पर कहना है कि समस्या सिर्फ फीस बढ़ने की नहीं है, बल्कि असली चुनौती पार्क के प्रबंधन में पारदर्शिता और आधुनिकता लाने की है। अगर प्रशासन ने जल्द ही एक पारदर्शी बुकिंग सिस्टम और सभी जोनों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित नहीं किया, तो कॉर्बेट का वह पारंपरिक ढांचा जिसके लिए रामनगर पूरी दुनिया में जाना जाता है, पूरी तरह चरमरा जाएगा। अब वक्त आ गया है कि पार्क प्रशासन अपनी गलतियों से सबक ले और उन कमियों को दूर करे जो सैलानियों को दूर भगा रही हैं, वरना आने वाले वर्षों में यह ऐतिहासिक पार्क सिर्फ फाइलों में ही अपनी पुरानी शानो-शौकत के लिए याद किया जाएगा और धरातल पर सन्नाटा पसरा रहेगा।

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