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चौधरी समरपाल सिंह की फोटो हटाने से जाट समाज में उभरा गहरा आक्रोश

स्वर्गीय चौधरी समरपाल सिंह की तस्वीर हटाए जाने के विवाद ने कांग्रेस संगठन में हलचल मचा दी, जाट समाज में गुस्सा भड़का और नेताओं के बीच बयानबाज़ी तेज़ हुई

काशीपुर शहर में कांग्रेस पार्टी को लेकर एक नया विवाद सामने आने के बाद राजनीतिक माहौल अचानक गर्म हो गया है। प्रदेश के पूर्व सहकारिता मंत्री और कांग्रेस संगठन के मजबूत स्तंभ रहे स्वर्गीय चौधरी समरपाल सिंह की तस्वीर कांग्रेस नवचेतना भवन द्रोणासागर से हटाए जाने की घटना ने भारी बवाल खड़ा कर दिया है। इस कदम को लेकर जाट समाज में गहरी नाराज़गी पनप गई है और समर्थक इसे स्वर्गीय नेता के योगदान और सम्मान से जुड़ा हुआ मामला मान रहे हैं। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा का विषय बन गया है कि आखिर जिस नेता ने कांग्रेस पार्टी की नींव को मजबूत करने में अपना पूरा जीवन लगा दिया, उनकी स्मृति से जुड़ी तस्वीर को हटाना क्यों ज़रूरी समझा गया।

स्वर्गीय चौधरी समरपाल सिंह की पुत्री श्रीमती मुक्ता सिंह ने इस पूरे प्रकरण की कड़ी आलोचना की और इसे कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं की ओछी सोच का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि यह वही लोग हैं जिन्होंने उनके पिता की मृत्यु के बाद उनकी पार्थिव देह पर कांग्रेस का झंडा चढ़ाया था और आज वही उनकी यादों से जुड़ी तस्वीर को पार्टी कार्यालय से हटाने का दुस्साहस कर रहे हैं। श्रीमती मुक्ता सिंह का कहना था कि उनके पिता ने कांग्रेस के लिए न केवल वर्षों तक काम किया बल्कि प्रदेश की राजनीति में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया। उन्होंने इसे न केवल अपमानजनक बल्कि घोर निंदनीय बताया और कहा कि जाट समाज इस कदम को अपने सम्मान से जोड़कर देख रहा है। इस घटना ने समाज के भीतर गहरा रोष पैदा कर दिया है, क्योंकि लोग इसे जाट शिरोमणि की छवि को धूमिल करने का प्रयास मान रहे हैं।

प्रदेश की राजनीति में चौधरी समरपाल सिंह का योगदान किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वे सहकारिता मंत्री के पद पर रहते हुए किसानों और आम नागरिकों के हितों के लिए हमेशा आवाज़ उठाते रहे। इसके अलावा वे इफको के वाइस चेयरमैन भी रहे और यहां भी उन्होंने संगठनात्मक क्षमता और नेतृत्व का लोहा मनवाया। काशीपुर की मार्केटिंग सोसाइटी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों को गति दी। साथ ही वे डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक और केन सोसाइटी के अध्यक्ष भी रहे, जहां उनके निर्णयों ने सहकारी ढांचे को मजबूती दी। ऐसे बहुमुखी योगदान देने वाले नेता की तस्वीर का कांग्रेस भवन से हटाया जाना उनके समर्थकों के लिए भावनात्मक आघात से कम नहीं है। समर्थकों का कहना है कि यह केवल एक तस्वीर का मामला नहीं बल्कि समर्पण और निष्ठा की अवहेलना है, जो किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकती।

इस घटना को लेकर जब वरिष्ठ कांग्रेस नेत्री श्रीमती अलका पाल से सवाल किया गया तो उन्होंने मामले की अलग ही व्याख्या प्रस्तुत की। उनका कहना था कि भवन में चल रहे सफाई अभियान के दौरान तस्वीर का हुक टूट जाने से उसे अस्थायी तौर पर हटाना पड़ा था। बाद में उसे पुनः उसी स्थान पर सम्मान के साथ स्थापित कर दिया गया। श्रीमती अलका पाल ने आरोप लगाया कि इस विषय को अनावश्यक रूप से तूल दिया जा रहा है और सच्चाई को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि स्वर्गीय चौधरी समरपाल सिंह कांग्रेस पार्टी के लिए हमेशा आदरणीय रहेंगे और उनके योगदान को पार्टी का हर कार्यकर्ता हृदय से याद करता है। उनके अनुसार पार्टी के भीतर किसी तरह का अपमान करने का इरादा कभी नहीं था और यह पूरी तरह से तकनीकी कारणों से हुआ अस्थायी व्यवधान था।

घटना के बाद काशीपुर में राजनीतिक हलचल और बढ़ गई है। एक तरफ जाट समाज के लोग इस प्रकरण को लेकर सड़कों से लेकर बैठकों तक आक्रोश जता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के नेता मामले को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विवाद ने कांग्रेस पार्टी की आंतरिक एकता और नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि ऐसी संवेदनशील घटनाओं को समय रहते सावधानी से नहीं संभाला गया तो यह पार्टी के भीतर गुटबाज़ी को और गहरा कर सकता है। जाट समाज में व्याप्त असंतोष कांग्रेस की चुनावी रणनीति के लिए भी चुनौती बन सकता है क्योंकि चौधरी समरपाल सिंह का नाम इस समाज के बीच हमेशा बड़े सम्मान से लिया जाता रहा है।

काशीपुर में घटित इस विवाद ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि राजनीति में केवल विचारधारा या संगठन ही नहीं बल्कि सम्मान और परंपरा की भी अहम भूमिका होती है। स्वर्गीय चौधरी समरपाल सिंह जैसे नेता की स्मृति का अपमान कहीं न कहीं उस भावना को चोट पहुंचाता है जो जनता और समाज के दिलों में उनके लिए बसती है। अब देखने वाली बात यह होगी कि कांग्रेस इस घटना से उपजे रोष को शांत करने के लिए क्या कदम उठाती है और पार्टी के भीतर से उठ रहे विरोधी स्वर को कैसे नियंत्रित करती है। इस पूरे विवाद ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि संवेदनशील मुद्दों को ध्यानपूर्वक नहीं सुलझाया गया तो यह भविष्य में पार्टी की राजनीतिक राह में बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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