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चोलामंडलम फाइनेंस शाखा में किसानों का हंगामा भुगतान अटकने पर बैंक परिसर बना धरना स्थल

लोन स्वीकृत होने के बावजूद खातों में राशि नहीं पहुंचने का आरोप, ईएमआई नोटिस मिलने से भड़का आक्रोश, बैंक और एग्रो कंपनी के बीच विवाद का खामियाजा भुगतने का दावा करते हुए ग्राहकों ने शुरू किया विरोध प्रदर्शन।

काशीपुर। चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड की शाखा सोमवार को उस समय अचानक सुर्खियों में आ गई, जब दर्जनों किसान और वाहन स्वामी बैंक परिसर के भीतर ही दरी बिछाकर धरने पर बैठ गए। देखते ही देखते बैंक के अंदर का माहौल पूरी तरह बदल गया और सामान्य बैंकिंग गतिविधियों के बीच विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि उन्होंने बैंक की सभी औपचारिकताएं पूरी करते हुए अपने वाहनों पर ऋण स्वीकृत कराया, लेकिन लोन की राशि उनके खातों तक पहुंचने के बजाय एक कथित एग्रो कंपनी के खाते में भेज दी गई। कई दिनों तक बैंक, ब्रोकर और संबंधित एजेंसी के चक्कर लगाने के बावजूद जब उन्हें उनकी धनराशि नहीं मिली तो मजबूर होकर उन्होंने बैंक परिसर के भीतर ही धरना शुरू कर दिया। प्रदर्शन में शामिल लोगों का कहना था कि यदि बैंक और उसके माध्यम से काम करने वाली एजेंसियों के बीच किसी प्रकार का आर्थिक विवाद चल रहा है तो उसका खामियाजा ग्राहकों को क्यों भुगतना पड़ रहा है। उनका कहना था कि उन्होंने बैंक पर विश्वास कर पूरी प्रक्रिया अपनाई, लेकिन अब न तो पैसा उनके हाथ में है और न ही उन्हें स्पष्ट जवाब मिल रहा है। प्रदर्शनकारियों ने साफ शब्दों में कहा कि जब तक उनकी रकम उनके खाते में नहीं पहुंचती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।

धरने में शामिल वाहन स्वामी गुरविंदर सिंह ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी कमर्शियल गाड़ी पर लगभग पाँच लाख रुपये का ऋण स्वीकृत कराया था। उनका आरोप है कि ऋण स्वीकृत होने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि धनराशि सीधे उनके खाते में आएगी ताकि वह अपने आवश्यक भुगतान कर सकें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनका कहना है कि बैंक की ओर से पूरी राशि एक एग्रो कंपनी को भेज दी गई, जबकि उन्हें आज तक एक भी रुपया प्राप्त नहीं हुआ। गुरविंदर सिंह का कहना था कि बैंक और उस एग्रो कंपनी के बीच जो भी व्यवस्था या समझौता हो, उससे उनका कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने बैंक के माध्यम से प्रक्रिया पूरी की थी, इसलिए उनकी जिम्मेदारी केवल बैंक तक सीमित है। उनका आरोप था कि बैंक और बीच में काम करने वाले कथित ब्रोकर ने उन्हें लगातार आश्वासन दिया कि एक-दो दिन में पैसा उनके खाते में आ जाएगा, लेकिन यह आश्वासन कई सप्ताह से केवल आश्वासन ही बना हुआ है। उन्होंने कहा कि अब उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी हो चुकी है कि वाहन चलाने के बजाय उन्हें बैंक के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं और परिवार भी इस समस्या से प्रभावित हो रहा है।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए गुरविंदर सिंह ने बताया कि उनका ऋण 28 जून को स्वीकृत हुआ था और उसी दिन से वह अपनी धनराशि का इंतजार कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके बैंक खाते का पूरा विवरण उपलब्ध है, जिससे स्पष्ट हो जाएगा कि अब तक उनके खाते में लोन की एक भी किश्त जमा नहीं हुई। सबसे हैरान करने वाली बात, उनके अनुसार, यह है कि धनराशि न मिलने के बावजूद उन्हें ऋण की किस्त जमा करने के संदेश लगातार भेजे जा रहे हैं। उनका कहना था कि जब उन्हें पैसा ही नहीं मिला तो आखिर वह किस आधार पर ईएमआई का भुगतान करें। उन्होंने आरोप लगाया कि कई बार बैंक कर्मचारियों और संबंधित लोगों से संपर्क करने पर हर बार केवल एक-दो दिन का समय मांगा गया। कभी कहा गया कि मामला सुलझ रहा है, कभी बताया गया कि संबंधित व्यक्ति रास्ते में है और कभी कहा गया कि उच्च अधिकारियों से अनुमति मिलते ही भुगतान हो जाएगा। लेकिन इतने लंबे समय के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई है। उनका कहना था कि लगातार आश्वासन मिलने के बावजूद जब कोई समाधान नहीं निकला तो आखिरकार उन्हें अन्य लोगों के साथ बैंक परिसर में धरना देने का कठिन निर्णय लेना पड़ा।

विरोध प्रदर्शन में शामिल अन्य लोगों ने भी लगभग इसी प्रकार की शिकायतें सामने रखीं। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे सभी मेहनतकश लोग हैं, जिनमें अधिकांश किसान, वाहन स्वामी और टैक्सी चालक शामिल हैं। उनका आरोप था कि ऋण लेने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए धनराशि की आवश्यकता थी, लेकिन भुगतान अटक जाने से उनका पूरा काम प्रभावित हो गया। एक टैक्सी चालक ने बताया कि वह रोज गाड़ी चलाकर अपने परिवार का पालन-पोषण करता है, लेकिन पिछले एक महीने से बैंक और संबंधित एजेंसियों के चक्कर लगाने के कारण उसका रोजगार लगभग ठप पड़ गया है। उसका कहना था कि हर दिन उसे यह कहकर टाल दिया जाता है कि आज नहीं तो कल पैसा मिल जाएगा, लेकिन न तो पैसा मिला और न ही कोई निश्चित समय बताया गया। प्रदर्शनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि बैंक से जुड़े कथित ब्रोकर मनोज को लगातार फोन किए जा रहे हैं, लेकिन वह कभी कार्यालय में होने की बात कहते हैं, कभी आधे घंटे में पहुंचने का आश्वासन देते हैं और फिर संपर्क से बाहर हो जाते हैं। धरने पर बैठे लोगों ने स्पष्ट कहा कि अब केवल मौखिक आश्वासन स्वीकार नहीं किए जाएंगे और जब तक लिखित समाधान या भुगतान नहीं होगा, तब तक आंदोलन समाप्त नहीं किया जाएगा।

धरने के दौरान प्रदर्शनकारियों ने यह भी दावा किया कि जिस भुगतान की बात की जा रही है, उसमें कई तरह की विसंगतियां सामने आई हैं। उनका आरोप था कि संबंधित एग्रो कंपनी के माध्यम से भुगतान की जो प्रक्रिया अपनाई गई, उसमें उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी गई। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उन्हें बताया गया था कि भुगतान सुरक्षित तरीके से उनके हित में किया जाएगा, लेकिन अब मामला उलझ गया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके सामने जो चेक और भुगतान संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत किए गए, उनमें भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं। कुछ प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि उन्हें फर्जी भुगतान का संदेह है और इसी कारण उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना था कि यदि बैंक की अधिकृत प्रक्रिया में किसी तीसरे पक्ष को शामिल किया गया है तो उसकी जिम्मेदारी भी बैंक की ही बनती है। धरने पर बैठे लोगों ने कहा कि ग्राहक ने न तो किसी निजी कंपनी के साथ अलग से समझौता किया और न ही किसी निजी एजेंट को अधिकृत किया था। ऐसे में यदि भुगतान बीच में कहीं अटक गया है तो ग्राहक को उसका नुकसान नहीं उठाना चाहिए। उनका कहना था कि बैंक और उससे जुड़े सभी पक्षों को मिलकर तत्काल समाधान निकालना चाहिए।

मामले को लेकर बैंक प्रबंधन की ओर से भी अपना पक्ष रखा गया। बैंक के एक जिम्मेदार अधिकारी ने बताया कि गुरविंदर सिंह उनके पास ऋण लेने के लिए डीएसए के माध्यम से पहुंचे थे और पूरा ऋण अधिकृत प्रक्रिया के तहत स्वीकृत किया गया। अधिकारी के अनुसार बैंक की कार्यप्रणाली ऐसी है कि कुछ मामलों में अधिकृत डीलर या आरसी लिमिट वाले एजेंसी खातों में भुगतान किया जाता है। उन्होंने बताया कि संबंधित एग्रो कंपनी बैंक की अधिकृत प्रक्रिया का हिस्सा थी और 29 जून को बैंक की ओर से भुगतान उसी कंपनी को कर दिया गया था। अधिकारी ने कहा कि सामान्य व्यवस्था के अनुसार संबंधित एजेंसी को सात से आठ दिन के भीतर आवश्यक दस्तावेज, आरसी और बीमा संबंधी औपचारिकताएं पूरी कर ग्राहक का भुगतान सुनिश्चित करना होता है। उनका कहना था कि बैंक ने अपनी निर्धारित जिम्मेदारी पूरी कर दी थी, लेकिन इसके बाद एग्रो कंपनी और उससे जुड़े पक्षों के बीच किसी प्रकार का आर्थिक विवाद सामने आ गया। बैंक अधिकारी के अनुसार अब यही विवाद ग्राहकों की परेशानी का कारण बन रहा है।

बैंक अधिकारी ने आगे बताया कि एग्रो कंपनी की ओर से यह जानकारी दी गई है कि उसने संबंधित पक्ष को पहले से लगभग तीन लाख सत्रह हजार रुपये अग्रिम दे रखे थे और शेष राशि बाद में देने की बात कही गई थी। अधिकारी के अनुसार यह पूरा विवाद एग्रो कंपनी और उसके सहयोगी पक्ष के बीच का है, लेकिन इसका सीधा असर ग्राहकों पर पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि गुरविंदर सिंह की ओर से उन्हें एक वीडियो भी उपलब्ध कराया गया, जिसमें संबंधित पक्ष द्वारा यह भरोसा दिया गया था कि धनराशि ग्राहक के खाते में भेज दी जाएगी। अधिकारी का कहना था कि बैंक लगातार इस मामले को गंभीरता से देख रहा है और उच्च अधिकारियों के साथ निरंतर संपर्क में है। उन्होंने बताया कि बैंक ने अपने मुख्य कार्यालय को ई-मेल भेजकर पूरे घटनाक्रम से अवगत कराया है तथा अनुरोध किया है कि या तो इस ऋण प्रकरण को निरस्त किया जाए अथवा किसी वैकल्पिक व्यवस्था के माध्यम से ग्राहक को उसकी धनराशि उपलब्ध कराई जाए। उनका कहना था कि बैंक भी नहीं चाहता कि ग्राहकों का विश्वास प्रभावित हो या संस्था की छवि को नुकसान पहुंचे।

घटनास्थल पर मौजूद लोगों के अनुसार बैंक के भीतर धरना कई घंटों तक जारी रहा और प्रदर्शनकारी लगातार अपने भुगतान की मांग पर अड़े रहे। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यदि बैंक उनकी ईएमआई की जिम्मेदारी तय कर सकता है तो फिर उनकी धनराशि उपलब्ध कराना भी बैंक की ही जिम्मेदारी है। उनका कहना था कि ग्राहकों ने न तो किसी एग्रो कंपनी से ऋण लिया और न ही किसी निजी व्यक्ति से समझौता किया था, इसलिए बैंक अपने दायित्व से पीछे नहीं हट सकता। वहीं बैंक अधिकारियों का कहना था कि वे पूरे मामले का समाधान निकालने के लिए लगातार प्रयासरत हैं और संबंधित कंपनी के साथ बातचीत जारी है ताकि ग्राहकों को जल्द से जल्द राहत मिल सके। फिलहाल धरने पर बैठे लोगों ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक उन्हें उनका भुगतान नहीं मिलता, तब तक उनका विरोध समाप्त नहीं होगा। बैंक परिसर में चले इस घटनाक्रम ने न केवल बैंकिंग व्यवस्था में तीसरे पक्ष की भूमिका पर कई सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दिखाया है कि यदि ऋण वितरण प्रक्रिया में कहीं भी समन्वय की कमी रह जाए तो उसका सबसे बड़ा नुकसान आखिरकार आम ग्राहक को ही उठाना पड़ता है।

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