काशीपुर। उत्तर भारत की सुप्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में विख्यात काशीपुर का चैती मेला इन दिनों अपनी पौराणिकता से अधिक व्यवस्थागत खामियों और रसूखदारों की अवैध वसूली के चलते सुर्खियों के केंद्र में आ गया है। आगामी 19 अप्रैल तक चलने वाले इस भव्य मेले का आगाज बीते 17 मार्च को सांसद अजय भट्ट द्वारा अत्यंत हर्षाेल्लास के साथ किया गया था, किंतु वर्तमान में यह मेला श्रद्धा के संगम के बजाय विवादों का अखाड़ा बनता नजर आ रहा है। शासन और प्रशासन की नाक के नीचे जिस प्रकार से अवैध पार्किंग का काला खेल खेला जा रहा है, उसने मेले की शुचिता और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। रसूखदारों के संरक्षण में फल-फूल रहे इस अवैध धंधे में संलिप्त लोगों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि उन्हें न तो कानून का खौफ है और न ही खाकी का डर, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण तब देखने को मिला जब एक जागरूक पत्रकार ने इस धांधली पर सवाल उठाने का साहस किया।
पार्किंग सिंडिकेट का भंडाफोड़ तब हुआ जब क्षेत्र के निर्भीक पत्रकार प्रोमद कुमार उर्फ़ रोशन सिंह को स्थानीय नागरिकों और मेलार्थियों की ओर से लगातार शिकायतें प्राप्त होने लगीं। शिकायतों का मुख्य केंद्र बिंदु चैती मेला परिसर के बाहर निजी भूखंडों में संचालित की जा रही वह अवैध पार्किंग थी, जिसका न तो कोई आधिकारिक टेंडर था और न ही कोई विधिक आधार। टेंडर की शर्तों के अनुसार पार्किंग के लिए केवल दो स्थान नियत किए गए थे, लेकिन माफियाओं ने प्रशासन की आंखों में धूल झोंकते हुए परिसर के बाहर एक निजी प्लॉट में जबरन वसूली का अड्डा बना लिया। जब पत्रकार प्रोमद कुमार ने इस मामले की जमीनी हकीकत जानने के लिए वहां का रुख किया, तो जो मंजर सामने आया वह चौंकाने वाला था। वहां आने वाले श्रद्धालुओं को जो पार्किंग की रसीदें थमाई जा रही थीं, उन पर न तो पार्किंग शुल्क अंकित था और न ही वाहन का नंबर दर्ज किया जा रहा था, जो सीधे तौर पर एक बड़े वित्तीय घोटाले और धोखाधड़ी की ओर इशारा कर रहा था।
पत्रकारिता के धर्म का निर्वहन करते हुए जब रोशन सिंह ने इन अवैध वसूली करने वालों से जानकारी मांगी और उनकी इस संदिग्ध कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाया, तो वहां मौजूद दबंगों ने मर्यादा की सभी सीमाएं लांघ दीं। खुद को रसूखदारों का करीबी बताने वाले इन गुर्गों ने न केवल पत्रकार के साथ अभद्रता की और हाथापाई की, बल्कि उन्हें सरेआम जान से मारने की धमकी तक दे डाली। यह घटना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि काशीपुर में कानून व्यवस्था की स्थिति कितनी लचर हो चुकी है कि माफिया अब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार करने से भी नहीं हिचकिचा रहे हैं। माफियाओं का यह दुस्साहस केवल पत्रकार के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था के विरुद्ध एक खुली चुनौती है जो निष्पक्षता और न्याय का दावा करती है। पत्रकार के साथ हुई इस बदसलूकी ने पूरे क्षेत्र के मीडिया जगत में आक्रोश की लहर दौड़ा दी है और अब यह मामला केवल पार्किंग तक सीमित न रहकर प्रेस की स्वतंत्रता और सुरक्षा का मुद्दा बन गया है।
इस गंभीर मामले की सूचना जैसे ही पुलिस प्रशासन के कानों तक पहुँची, महकमे में हड़कंप मच गया और आनन-फानन में पुलिस बल ने सक्रियता दिखाते हुए अवैध पार्किंग संचालकों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर अवैध रूप से संचालित हो रही पार्किंग को बंद कराने और दोषियों को गिरफ्त में लेने का प्रयास किया, लेकिन माफियाओं का तंत्र इतना गहरा है कि उन्होंने तुरंत अपने राजनीतिक संपर्कों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। बताया जा रहा है कि जैसे ही पुलिस ने शिकंजा कसा, वैसे ही कई प्रभावशाली गलियारों से फोन आने शुरू हो गए और जांच को प्रभावित करने के लिए दबाव बनाने की कोशिशें तेज हो गईं। रसूखदार लोग इस पूरे मामले को रफा-दफा करने और अपने चहेतों को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं।
पीड़ित पत्रकार प्रोमद कुमार ने इस पूरी घटनाक्रम और जानलेवा धमकी के संबंध में आईटीआई थाने में लिखित तहरीर देकर न्याय की गुहार लगाई है और दोषियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है। अब संपूर्ण क्षेत्र की नजरें काशीपुर पुलिस और प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई हैं कि क्या वे इन राजनीतिक दबावों के आगे घुटने टेक देंगे या फिर सच का साथ देते हुए इस माफिया तंत्र को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे। यह प्रश्न भी हवा में तैर रहा है कि क्या चैती मेले के नाम पर हो रही यह सरेआम लूट बंद होगी या फिर सत्ता के संरक्षण में यह खेल इसी तरह निर्बाध रूप से चलता रहेगा। यदि समय रहते इन अवैध पार्किंग और वसूली माफियाओं पर लगाम नहीं कसी गई, तो यह न केवल चैती मेले की प्रतिष्ठा को धूमिल करेगा, बल्कि आम जनता का शासन-प्रशासन पर से विश्वास भी पूरी तरह से उठ जाएगा।
चैती मेले के इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि धार्मिक आयोजनों की आड़ में किस प्रकार भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हो चुकी हैं और कैसे मुट्ठी भर लोग व्यवस्था को बंधक बनाकर अपनी जेबें भरने में लगे हैं। अजय भट्ट द्वारा उद्घाटित यह मेला आज प्रशासन की कार्यक्षमता की परीक्षा ले रहा है, जहाँ एक तरफ निर्दाेष जनता से वसूली हो रही है और दूसरी तरफ सच्चाई दिखाने वाले पत्रकार को धमकियाँ मिल रही हैं। पुलिस के लिए यह चुनौती केवल एक केस को सुलझाने की नहीं है, बल्कि उस रसूखदार तंत्र को बेनकाब करने की है जो पर्दे के पीछे से इन अपराधियों को खाद-पानी दे रहा है। आने वाले दिनों में आईटीआई थाने की पुलिस का रुख यह तय करेगा कि काशीपुर में कानून का राज है या फिर रसूखदारों की मर्जी ही कानून है, क्योंकि इस मामले का अंजाम ही तय करेगा कि भविष्य में कोई पत्रकार ऐसी धांधलियों के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत जुटा पाएगा या नहीं।





