- करोड़ों के ठेके की आग में झुलसती व्यापारियों की उम्मीदें, सन्नाटे की मार से सिसकता ऐतिहासिक व्यापार
काशीपुर। ऐतिहासिक और आध्यात्मिक क्षितिज पर लगने वाले सुप्रसिद्ध चैती मेले की रंगत इस बार कुछ ऐसी फीकी पड़ी है कि पिछले पंद्रह साल से यहाँ अपनी जड़ें जमाए बैठे अनुभवी व्यापारियों के चेहरे पर भी चिंता की गहरी लकीरें साफ देखी जा सकती हैं। पंद्रह साल का एक लंबा कालखंड होता है, जिसमें इंसान ने वक्त के कई उतार-चढ़ाव और व्यापार के बदलते स्वरूप देखे होते हैं, लेकिन इस बार चैती के मैदान में जो मंजर दिखाई दे रहा है, उसने पुराने से पुराने दुकानदारों की रातों की नींद उड़ा दी है। जब हमने यहाँ के धूल भरे गलियारों में घूमकर जमीनी हकीकत टटोलने की कोशिश की, तो हर कोने से एक ही सवाल बार-बार गूँजता सुनाई दिया कि आखिर वह जनसैलाब कहाँ खो गया जो कभी इस मेले की असली पहचान और इसकी धड़कन हुआ करता था? यहाँ के दुकानदार अब डरी हुई आवाज में स्पष्ट रूप से स्वीकार कर रहे हैं कि जैसी भीड़ अब दिखाई दे रही है, वैसी वीरानी और सन्नाटा उन्होंने अपने पूरे व्यापारिक जीवन में पहले कभी नहीं देखा
व्यापारिक गिरावट के इस दौर में मेले के भीतर का नजारा किसी त्रासदी से कम नहीं है, जहाँ दुकानदार सुबह से शाम तक केवल ग्राहकों की राह तकते रहते हैं। “ग्राहक काम क्यों दिख रहे हैं” का यह सवाल आज हर छोटे-बड़े स्टाल के मालिक के चेहरे पर एक स्थायी शिकन की तरह चस्पा हो गया है। दुकानदारों का कहना है कि उन्होंने अपने पूरे कैरियर में कभी ऐसा समय नहीं देखा जब उन्हें दिन के उजाले में आराम करने का अवसर मिले, क्योंकि पहले तो उन्हें भोजन करने तक की फुरसत नहीं मिलती थी। आज स्थिति यह है कि वे अत्यधिक खाली समय के कारण केवल आराम कर रहे हैं और आपस में ही चर्चा कर रहे हैं कि आखिर जनता कहाँ गायब हो गई है। यह केवल एक अस्थायी मंदी नहीं है, बल्कि एक ऐसा आर्थिक झटका है जो उन हजारों परिवारों की नींव हिला सकता है जो साल भर इस मेले की कमाई पर आश्रित रहते हैं। सजी-धजी दुकानें और ग्राहकों के इंतजार में लगी खाली कुर्सियां इस समय मेले की सबसे कड़वी और दुखद हकीकत बनकर उभरी हैं।
इस अभूतपूर्व और डरावनी आर्थिक मंदी के पीछे जब हमने गहराई से कारणों की पड़ताल की, तो एक बहुत ही चौंकाने वाला और कड़वा सामाजिक तथ्य सामने निकलकर आया। मेले के स्थानीय दुकानदारों और क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि सोशल मीडिया और सूचना क्रांति के इस युग में खबरें आग की तरह फैलती हैं, जिसका नकारात्मक प्रभाव इस बार व्यापार पर पड़ा है। जनमानस में यह खबर पूरी तरह फैल चुकी है कि इस बार मेले का ठेका अत्यधिक ऊंची और रिकॉर्ड तोड़ कीमतों पर दिया गया है। लोगों के मन में यह मनोवैज्ञानिक डर बैठ गया है कि अगर ठेका करोड़ों रुपयों का है, तो दुकानदार उस भारी खर्च की भरपाई करने के लिए आम ग्राहकों से सामान की दोगुनी या तिगुनी कीमतें वसूलेंगे। चार करोड़ का ठेका होने की चर्चा ने मध्यवर्गीय ग्राहकों के मन में एक मानसिक अवरोध पैदा कर दिया है, जिससे वे मेले की ओर कदम बढ़ाने से कतरा रहे हैं।
ग्राहकों के बीच यह आम धारणा बन गई है कि “हमारे कपड़े उतर जाएंगे” अगर हम इस बार मेले में खरीदारी करने का जोखिम उठाएंगे, क्योंकि उन्हें लगता है कि हर चीज के दाम उनकी पहुँच से बाहर होंगे। इसके अलावा, मेले के भीतर बुनियादी मानवीय सुविधाओं का भी इस बार घोर अभाव देखा जा रहा है। धूल, गंदगी और अव्यवस्था के बीच किसी भी तरह की साफ-सुथरी सुविधा उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण दूर-दराज से आने वाली पब्लिक मेले में रुकने के बजाय जल्दी घर लौटने में ही अपनी भलाई समझ रही है। सरकारी और प्रशासनिक दावों के बावजूद, जमीनी स्तर पर अव्यवस्था का यह आलम है कि दुकानदार अब खुलेआम कह रहे हैं कि “प्रशासन को अपने अंडर में लेकर मेला इसको सुधारना चाहिए”, वरना वह दिन दूर नहीं जब यह गौरवशाली परंपरा इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी। करोड़ों का यह ठेका व्यापारियों के लिए वरदान के बजाय एक अभिशाप साबित हो रहा है।
मेले के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक, रामपुर खादी कंबल भंडार की स्थिति तो और भी अधिक चिंताजनक है, जिसे यहाँ अपनी दुकान लगाते हुए पूरे पैंसठ साल हो गए हैं। पैंसठ वर्षों का यह लंबा सफर गवाह रहा है कि चैती मेले ने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन कंबल भंडार के मालिकों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा बुरा दौर कभी नहीं देखा। पहले उनकी दुकान पर कंबल और खादी के कपड़ों के लिए ग्राहकों की लंबी कतारें लगी रहती थीं, लेकिन आज स्थिति यह है कि उनकी कुर्सियां ग्राहकों का मूक इंतजार कर रही हैं। दुकानदार बहुत दुखी हैं और कह रहे हैं कि अगर यही हाल रहा तो सत्तर प्रतिशत से ज्यादा का आर्थिक नुकसान होना तय है। जिस पूंजी को उन्होंने साल भर मेहनत करके जोड़ा था और इस मेले में निवेश किया था, वह अब डूबती हुई नजर आ रही है।
आस्था और विश्वास के इस केंद्र पर जहाँ माता पर्वती और शिव की कृपा बरसती थी, आज वहाँ का दुकानदार केवल ईश्वरीय मदद की गुहार लगा रहा है। मेले से जुड़े अन्य पुराने घरानों के लोग भी इस सन्नाटे को देखकर अचंभित हैं। दुकानदारों का मानना है कि उनकी लागत वसूल होना अब केवल “माता रानी” के चमत्कार पर ही निर्भर है, क्योंकि मानवीय प्रयास और व्यापारिक गणित पूरी तरह से फेल हो चुके हैं। किसानों की फसल की कटाई और ग्रामीण क्षेत्रों में नकदी की कमी को भी एक कारण माना जा रहा है, लेकिन मुख्य समस्या प्रबंधन की भारी चूक और ठेकेदारी प्रथा का शोषणकारी स्वरूप ही है। व्यापारियों का कहना है किजो स्थिति बनी हुई है उसे साफ है कि आने वाले समय में यहाँ नए दुकानदारों का आना बंद हो जाएगा। मेले की जमीन जो कभी खुशियों और व्यापार से भरी रहती थी, आज वह केवल खाली पड़े मैदानों और अधूरे सपनों की कहानी बयां कर रही है।
इस विकट परिस्थिति में छोटे-छोटे व्यापारियों और उनके परिवारों का भविष्य दांव पर लगा है, जो कर्ज लेकर यहाँ अपनी दुकानें सजाने आए थे। व्यापारियों का कहना है कि उनकी “परेशान दूर होगी” तभी जब उनके कारोबार में जान आएगी, लेकिन फिलहाल तो दूर-दूर तक ऐसी कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। छोटे-छोटे बच्चे जो इस उम्मीद में रहते थे कि मेला उनके लिए खुशियाँ लाएगा, आज उनके माता-पिता अपनी लागत बचाने की जद्दोजहद में जुटे हैं। कारोबार के इस गिरते ग्राफ ने न केवल बड़े दुकानदारों बल्कि उन छोटे रेहड़ी-पटरी वालों की कमर भी तोड़ दी है जो मेले के आकर्षण का मुख्य केंद्र होते थे। सत्तर प्रतिशत से अधिक के घाटे का यह अनुमान केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उन सैकड़ों घरों के चूल्हे बुझने का संकेत है जो इस मेले की सफलता पर निर्भर थे। चैती मेला आज अपनी उस ऐतिहासिक पहचान को वापस पाने के लिए छटपटा रहा है।
मेले के अंतिम दिनों की ओर बढ़ते हुए, अब केवल चमत्कार की ही उम्मीद शेष बची है। दुकानदार खाली बैठे एक-दूसरे का चेहरा निहारते हैं और बीते वर्षों की उन भीड़ों के किस्से सुनाते हैं जब उन्हें पानी पीने तक का समय नहीं मिलता था। आज वे “आराम कर रहे हैं”, पर यह आराम नहीं बल्कि एक मानसिक तनाव है जो उन्हें भीतर ही भीतर खाया जा रहा है। क्या आने वाले समय में प्रशासन अपनी गलतियों से सबक लेगा? क्या करोड़ों के ठेके के बजाय जनता की सुविधाओं और व्यापारियों के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी? ये वो सवाल हैं जो इस बार के चैती मेले ने काशीपुर की जनता और प्रशासन के सामने खड़े कर दिए हैं। फिलहाल तो, कुर्सियां लगी हैं, सामान सजा है, पर खरीदार नदारद हैं। व्यापारियों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो वे भविष्य में यहाँ आने से पहले सौ बार सोचेंगे।
व्यापारियों का कहना है कि जब तक “कारोबार आपका चले” की स्थिति नहीं आती, तब तक उनके परिवारों की “परेशानी दूर होगी” यह सोचना भी बेमानी है। उनके परिवार और आश्रित भी इस उम्मीद में टकटकी लगाए रहते थे कि मेला खत्म होने पर कुछ बड़ी बचत होगी, लेकिन इस बार लागत वसूलना ही बड़ी बात है। रामपुर खादी कंबल भंडार जैसे दशकों पुराने संस्थानों का इस कदर हताश होना इस बात का प्रमाण है कि मेला अब अपने ढलान की ओर अग्रसर है, और यदि इसे समय रहते उचित प्रशासनिक सुधार नहीं मिला, तो यह जन-संस्कृति का उत्सव सदा के लिए मौन हो जाएगा। दुकानदारों ने गुहार लगाई है कि ठेकेदारी प्रथा के इस भारी बोझ को कम किया जाए ताकि छोटे दुकानदारों को कम दरों पर जगह मिल सके और वे ग्राहकों को भी राहत दे सकें।
अंततः, काशीपुर के इस चैती मेले का सन्नाटा पूरे क्षेत्र की व्यापारिक संस्कृति के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते ठेका प्रणाली को तर्कसंगत नहीं बनाया गया और जनता के मन से “महंगाई” के इस कृत्रिम डर को नहीं निकाला गया, तो यह मेला केवल इतिहास की किताबों का हिस्सा बनकर रह जाएगा। दुकानदार आज भी अपनी कुर्सियों पर बैठकर इस उम्मीद में हैं कि शायद कल का सूरज कुछ नए ग्राहक लेकर आएगा, लेकिन वर्तमान की कड़वी सच्चाई यही है कि “कुर्सियां तो लगा दी हैं लेकिन ग्राहक नहीं घूम रहा है।” यह मेला अपनी भव्यता खो चुका है और अब यहाँ केवल सन्नाटे की गूँज सुनाई दे रही है, जो प्रशासन और सरकार से इस ऐतिहासिक विरासत को बचाने की गुहार लगा रही है।





