काशीपुर। उत्तराखंड के तराई द्वार के रूप में विख्यात काशीपुर की पावन धरा पर चैत्र नवरात्रि के शुभ अवसर पर आयोजित होने वाला सुप्रसिद्ध चैती मेला एक बार फिर अपने पूरे यौवन और शबाब पर है, जहाँ आस्था, व्यापार, और ऐतिहासिक रोमांच का एक ऐसा ‘हॉट’ संगम देखने को मिल रहा है जो सदियों पुरानी गौरवशाली परंपराओं को पूरी शिद्दत से जीवंत कर देता है। इस वर्ष मेले का मुख्य आकर्षण वह ऐतिहासिक और पौराणिक घोड़ा बाजार बना हुआ है, जिसे स्थानीय जनभाषा में ‘नखासा बाजार’ के नाम से पुकारा जाता है और जहाँ देश के कोने-कोने से आए अत्यंत बेशकीमती और दुर्लभ घोड़ों की भव्य प्रदर्शनी ने खरीदारों के साथ-साथ आम जनता के बीच भी जबरदस्त और अभूतपूर्व उत्सुकता पैदा कर दी है। इस बार के बाजार में सबसे अधिक चर्चा उस जांबाज और गगनचुंबी घोड़े की हो रही है जिसकी कीमत किसी लग्जरी कार से भी कहीं अधिक यानी लगभग 10 लाख रुपए आंकी गई है, जिसे काशीपुर के कुंडा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बैतवाला निवासी सरनजीत सिंह पूरी शानो-शौकत और गर्व के साथ इस नखासा बाजार में बिक्री के लिए लेकर आए हैं। यह मेला केवल घोड़ों की सामान्य खरीद-फरोख्त का कोई साधारण केंद्र नहीं है, बल्कि यह डाकुओं की रहस्यमयी और डरावनी दास्तानों, मुगलकालीन व्यापारिक इतिहास और माँ बाल सुंदरी देवी के प्रति करोड़ों भक्तों की अटूट श्रद्धा का एक ऐसा अद्भुत और रंगीन कोलाज पेश करता है जो पूरे उत्तर भारत में अपनी एक विशिष्ट और अमिट पहचान रखता है।
काशीपुर की इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरा पर चैती मेले का आयोजन कोई साधारण या औपचारिक धार्मिक आयोजन मात्र नहीं है, बल्कि यह सदियों पुराने अनकहे इतिहास, अदम्य रोमांच और लोक परंपराओं का एक ऐसा जीवंत और ज्वलंत उदाहरण है जो बदलते वक्त की कठोर मार के बावजूद आज भी अपनी प्रासंगिकता को बहुत मजबूती से बचाए हुए है। यहाँ की जनश्रुतियों और पुराने अनुभवी जानकारों की बातों पर गौर करें तो पता चलता है कि एक दौर ऐसा भी था जब इस मेले की धमक और दहशत इतनी तेज थी कि यहाँ के नखासा बाजार में उस समय के खूंखार और कुख्यात डाकू भी अपने गिरोह के लिए सबसे तेज तर्रार, वफादार और हवा से बातें करने वाले घोड़े खरीदने के लिए गुप्त रूप से अपनी धमक दिया करते थे। काशीपुर की फिजाओं और पुरानी गलियों में आज भी उन ऐतिहासिक कहानियों की गूँज स्पष्ट सुनाई देती है जहाँ व्यापारिक सौदों और बाहुबल की ताकत के बीच एक बहुत ही अनोखा और अजीब तालमेल हुआ करता था। यही मुख्य कारण है कि आज भी जब यहाँ घोड़ों की टापें मैदान में गूँजती हैं, तो पुराने लोगों के जेहन में वह खौफनाक और रोमांचक दौर अचानक ताजा हो जाता है, जो इस मेले की विरासत को और भी अधिक रहस्यमयी बना देता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से गहराई से देखा जाए तो काशीपुर शहर के मध्य स्थित माँ बाल सुंदरी देवी मंदिर का प्राचीन प्रांगण सैकड़ों सालों से लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की अगाध और अटूट आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है, जहाँ प्रत्येक वर्ष चैत्र मास की नवरात्रि के दौरान 15 दिनों तक चलने वाला यह भव्य और विशाल मेला आयोजित किया जाता है। मेले का औपचारिक, सबसे प्रभावशाली और ‘हॉट’ आगाज़ ‘नखासा बाजार’ नामक विशेष घोड़ा बाजार से होता है, जो अपनी अद्भुत व्यापारिक विविधता और गहरी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण पूरे भारतवर्ष में एक बिल्कुल अलग ही मुकाम और इज्जत रखता है। इस विशेष बाजार की सबसे बड़ी खूबी और आकर्षण यह है कि यहाँ केवल स्थानीय पशु ही नहीं आते, बल्कि सिंधी, अरबी, मारवाड़ी, काठियावाड़ी, पंजाबी, अफगानी और राजस्थानी जैसी उच्च कोटि की दुर्लभ नस्लों के घोड़े अपनी पूरी भव्यता और अकड़ के साथ प्रदर्शन के लिए लाए जाते हैं। राजस्थान, पंजाब, गुजरात और पड़ोसी उत्तर प्रदेश जैसे विभिन्न राज्यों से आए मंझे हुए और अनुभवी व्यापारी यहाँ लाखों रुपए के घोड़ों का बड़ा व्यापारिक सौदा करते हैं, जहाँ खरीदार केवल घोड़ों की बाहरी सुंदरता नहीं देखते, बल्कि उन्हें खुले मैदान में सरपट दौड़ाकर, उनके हैरतअंगेज करतबों को बारीकी से परखकर और उनकी शारीरिक मजबूती की जांच करने के बाद ही अपनी अंतिम व्यापारिक मुहर लगाते हैं।
इस ऐतिहासिक मेले के इतिहास का सबसे रोमांचक, डरावना और रहस्यमयी पहलू डाकुओं के साथ इसका वह गहरा और विवादित कनेक्शन रहा है, जिसे लेकर आज भी स्थानीय लोगों के बीच तमाम तरह की किंवदंतियाँ और रोंगटे खड़े करने वाली कहानियाँ बहुत प्रचलित हैं जो किसी हॉलीवुड या बॉलीवुड की सस्पेंस फिल्म की पटकथा से कम नहीं लगतीं। स्थानीय मान्यताओं और पुराने आधिकारिक रिकॉर्ड्स की बातों को सच मानें तो 20वीं सदी के कई ऐसे खूंखार और कुख्यात डाकू हुए हैं जिनका इस चैती मेले से बहुत ही गहरा और निजी नाता रहा है, जिनमें सुल्ताना डाकू, फूलन देवी और मलखान सिंह जैसे देश के सबसे बड़े बागी नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं। कहा जाता है कि ये सभी बागी और बाहुबली अपने गिरोह की सुरक्षा और पुलिस से बचने के लिए सबसे मजबूत और फुर्तीले घोड़े इसी नखासा बाजार से स्वयं चुनते थे ताकि वे पुलिस की पकड़ से दूर घने जंगलों और दुर्गम रास्तों में बिजली की तेजी से ओझल हो सकें। विशेष रूप से सुल्ताना डाकू के बारे में तो यह जगजाहिर है कि यह पूरा तराई क्षेत्र उसका सबसे सक्रिय और सुरक्षित ठिकाना माना जाता था और वह कई वर्षों तक भेष बदलकर इस मेले में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहा था, जिसे बाद में एक अंग्रेज अधिकारी मिस्टर यंग ने इसी क्षेत्र से बहुत ही मशक्कत के बाद गिरफ्तार करने में सफलता प्राप्त की थी।

नखासा बाजार का अपना एक बहुत ही स्वर्णिम और गौरवशाली व्यापारिक इतिहास रहा है जो लगभग 135 से 140 साल पुराना माना जाता है, और एक समय यह बाजार पूरे अखंड भारत में घोड़ों की खरीद-फरोख्त का सबसे बड़ा, विश्वसनीय और आधिकारिक केंद्र हुआ करता था। उस दौर में इस बाजार की साख और ईमानदारी इतनी अधिक थी कि ब्रिटिश हुकूमत के दौरान मेरठ, बाबूगढ़ और रानीखेत जैसी बड़ी सैन्य छावनियों के लिए सेना के सबसे मजबूत और युद्ध के लायक घोड़े इसी काशीपुर के नखासा मेले से विशेष रूप से चुनकर ले जाए जाते थे, जिससे यहाँ की आर्थिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय पहचान को एक नया और वैश्विक विस्तार मिला था। पहले जहाँ इस नखासा बाजार में दुनिया भर की अनगिनत, सुंदर और दुर्लभ नस्लों के घोड़ों का ऐसा विशाल जमावड़ा लगा रहता था कि तिल रखने तक की जगह नहीं होती थी, वहीं अब बदलते आधुनिक परिवेश और तेजी से बढ़ते मशीनीकरण के इस दौर में यहाँ केवल कुछ ही सीमित और पारंपरिक नस्लें देखने को मिल रही हैं। इस कारण से बाजार की वह पुरानी चमक, धमक और वह ऐतिहासिक उत्साह अब कुछ हद तक फीका पड़ता नजर आ रहा है, जिसे लेकर यहाँ के पुराने व्यापारी और स्थानीय इतिहासकार अक्सर बहुत गहरी चिंता व्यक्त करते हैं।
वर्तमान परिदृश्य और इस वर्ष की स्थिति की बात करें तो 19 मार्च से विधिवत रूप से शुरू हुए इस साल के चैती मेले में घोड़ा बाजार की रंगत और व्यापारिक सरगर्मी पिछले वर्षों के मुकाबले कुछ शांत और अपेक्षाकृत सुस्त दिखाई दे रही है, जिसका मुख्य और ठोस कारण आधुनिक परिवहन के साधनों का अनियंत्रित तरीके से बढ़ना और नई पीढ़ी का पशुपालन के प्रति तेजी से घटता रुझान माना जा रहा है। इस बार के मेला परिसर में पहुँचने वाले अनुभवी घोड़ा व्यापारियों की कुल संख्या में काफी उल्लेखनीय और चिंताजनक कमी दर्ज की गई है और इसके साथ ही खरीदारों की वह पुरानी भीड़ भी पिछले दशकों की तुलना में काफी कम और छितरी हुई नजर आ रही है। फिर भी, पूर्वजों और बुजुर्गों द्वारा शुरू की गई यह ऐतिहासिक परंपरा आज भी अपनी पूरी मर्यादा और शिद्दत के साथ जारी है, जो काशीपुर की सांस्कृतिक विरासत को टूटने नहीं दे रही है। व्यापारिक सुस्ती के बावजूद बाजार में आज भी लाखों-करोड़ों रुपए के शानदार और चमचमाते घोड़े अपनी अद्भुत चमक बिखेर रहे हैं, जिनमें सबसे ज्यादा आकर्षण और चर्चा का केंद्र सरनजीत सिंह का वह 10 लाख की कीमत वाला घोड़ा बना हुआ है जिसने अपनी असाधारण कद-काठी और शुद्ध नस्ल से हर किसी को बहुत प्रभावित किया है।

कुंडा क्षेत्र के बैतवाला निवासी इस समर्पित पशुपालक सरनजीत सिंह ने अपनी मेहनत, पसीने और खून से इस बेशकीमती घोड़े को तैयार किया है, जो आज इस ऐतिहासिक मेले की गिरती हुई लाज को बहुत मजबूती से बचाए हुए है और यह पूरी दुनिया को साबित कर रहा है कि असली जुनून और शौक के आगे महंगाई या सुस्ती की कोई बड़ी बिसात नहीं होती। यह घोड़ा न केवल अपनी कीमत के लिए जाना जा रहा है, बल्कि इसकी फुर्ती और इसकी आँखों की चमक उस गौरवशाली इतिहास की याद दिलाती है जब यहाँ हजारों की संख्या में ऐसे ही नगीने आया करते थे। मेले में आए अन्य व्यापारी भी अपने पशुओं के साथ एक भावनात्मक रिश्ता साझा करते हैं, जहाँ घोड़े को केवल एक जानवर नहीं बल्कि परिवार का एक अभिन्न हिस्सा और अपनी शान का प्रतीक माना जाता है। नखासा बाजार में होने वाली यह सौदेबाजी आज भी उसी पुराने अंदाज में होती है, जहाँ जुबान की कीमत और पशु की परख ही सबसे ऊपर रखी जाती है, जो आज के डिजिटल युग में भी मानवीय भरोसे की एक अनूठी मिसाल पेश करती है।
अंततः यह बहुत ही स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि काशीपुर का यह ऐतिहासिक चैती मेला महज एक साधारण धार्मिक आयोजन या सामान्य व्यापारिक मेला नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की महान संस्कृति, गौरवशाली इतिहास और अटूट जन-आस्था का एक ऐसा अद्भुत, अटूट और पवित्र संगम है जो कई पीढ़ियों को एक साझा सूत्र में आपस में जोड़ता है। जहाँ एक ओर श्रद्धालु माँ बाल सुंदरी देवी के दिव्य और आलौकिक दर्शन कर अपने मानव जीवन को कृतार्थ करने के लिए भारी संख्या में यहाँ पहुँचते हैं, वहीं दूसरी ओर घोड़ों की तेज हिनहिनाहट और नखासा बाजार की पारंपरिक व्यापारिक गहमागहमी इस मेले को एक अत्यंत जीवंत, रोमांचक और अद्वितीय स्वरूप प्रदान करती है। इतिहास की धूल में दबी हुई डाकुओं की रहस्यमयी कहानियाँ हों या आधुनिक दौर की कठिन व्यापारिक और आर्थिक चुनौतियां, चैती मेला आज भी अपने सीने में कई अनकहे राज दफन किए हुए हर साल पूरी शान, शौकत और आन-बान-शान के साथ लगता है। सरकार और स्थानीय प्रशासन को अब यह चाहिए कि वे इस ऐतिहासिक ‘नखासा’ की खोती हुई पुरानी चमक को वापस लाने के लिए कुछ बहुत ही विशेष और ठोस प्रयास करें ताकि आने वाली नई पीढ़ियां भी इस महान और गौरवशाली विरासत का एक अटूट हिस्सा बन सकें।





