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चुनाव से ठीक पहले मदन कौशिक को मंत्री पद, सम्मान या सत्ता का आखिरी दांव?

साढ़े चार साल का सूखा और अब अचानक लालबत्ती का सस्पेंस! हरिद्वार की जनता के कड़वे सवाल—क्या यह कद्दावर नेता मदन कौशिक का असली सम्मान है या डूबती नैया बचाने के लिए रचा गया आखिरी चुनावी स्वांग?

हरिद्वार(सुनील कोठारी)। तीर्थनगरी जहाँ गंगा की अविरल धारा सदियों से पाप धोती आ रही है, आज वहां की फिजाओं में भक्ति के मंत्रों के साथ-साथ सियासत की एक अजब सी छटपटाहट और गरमाहट साफ महसूस की जा रही है। गंगा के शांत घाटों से लेकर शहर की तंग गलियों और पॉश कॉलोनियों तक, हर तरफ बस एक ही संवेदनशील और सुलगता हुआ मुद्दा चर्चा के केंद्र में है—पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और हरिद्वार शहर के अजेय माने जाने वाले कद्दावर नेता मदन कौशिक का अचानक हुआ राज्याभिषेक। जैसे ही देहरादून के राजभवन में मदन कौशिक ने पद और गोपनीयता की शपथ ली, वैसे ही लगा जैसे शांत बैराज के पानी में किसी ने बड़ा पत्थर फेंक दिया हो। गलियारों में चर्चाओं का बाजार इस कदर गर्म है कि लोग पूछ रहे हैं, आखिर साढ़े चार साल तक संगठन की कमान संभालने वाले, पार्टी को कई चुनावों में जीत दिलाने वाले इस दिग्गज को ऐन विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ा देखकर लालबत्ती क्यों थमाई गई? यह महज एक सामान्य, रूटीन मंत्रिमंडल विस्तार नहीं है, जैसा कि सरकार दिखाने की कोशिश कर रही है, बल्कि यह एक ऐसा अप्रत्याशित और बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम है जिसने हरिद्वार की जागरूक और प्रबुद्ध जनता के जेहन में कड़वे, तीखे लेकिन बेहद जरूरी सवालों की एक लंबी फेहरिस्त खड़ी कर दी है। सड़कों पर, चाय की दुकानों पर, ई-रिक्शा में और घाटों पर अब विकास की गुलाबी बातों से ज्यादा इस फैसले के पीछे की असली, छिपी हुई ‘क्रोनोलॉजी’ और मंशा पर बहस छिड़ गई है कि क्या यह सचमुच हरिद्वार की महानता, उसकी अस्मिता और उसके वरिष्ठ नेता का वास्तविक सम्मान है, या फिर डूबती नैया को पार लगाने के लिए रणनीतिकारों द्वारा रचा गया कोई आखिरी, हताश और मायावी चुनावी स्वांग है जिसे जनता पर थोपा जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद हरिद्वार की जनता के बीच से जो पहला और सबसे ज्यादा चुभता हुआ सवाल हवा में तैर रहा है, वह सीधा सरकार की नियत पर निशाना साधता है। सवाल यह है कि यदि डबल इंजन की सरकार को सचमुच मदन कौशिक जी के उस विशाल संसदीय अनुभव, उनकी बेदाग सांगठनिक क्षमता और उनके कद्दावर राजनीतिक कद की इतनी ही शिद्दत से दरकार थी, तो फिर साढ़े चार साल पहले, जब सरकार का गठन हो रहा था, तब उन्हें मंत्रिमंडल में वह सम्मानजनक और महत्वपूर्ण जगह क्यों नहीं दी गई? आखिर ऐसी कौन सी अदृश्य राजनीतिक मजबूरी थी, कौन सा ऐसा आंतरिक शक्ति संतुलन था, जिसके चलते एक वरिष्ठतम नेता को, जो कई बार का विधायक है, इतने लंबे समय तक सत्ता के गलियारों से दूर रखा गया और उन्हें संगठन की धूल फांकने के लिए मजबूर होना पड़ा? जनता यह देख रही थी कि मदन कौशिक के जूनियर, उनके सामने राजनीति सीखने वाले नेता मंत्री बनकर सरकारी सुख भोग रहे थे, झंडे वाली गाड़ियों में घूम रहे थे और फैसले ले रहे थे, जबकि मदन कौशिक जी सिर्फ संगठन की बैठकों तक सीमित थे। आज जब सरकार का कार्यकाल चंद महीनों का मेहमान है, जब चुनावी बिगुल बजने ही वाला है, तब उन्हें आनन-फानन में मंत्री बनाना क्या सचमुच ‘देर आए, दुरुस्त आए’ की कहावत को चरितार्थ करता है, जैसा कि उनके समर्थक दावा कर रहे हैं? या फिर यह उस गहरे अपमान, उस सुनियोजित उपेक्षा की भरपाई करने की एक बहुत ही कच्ची और नाकाम कोशिश है जो साढ़े चार साल तक लगातार आलाकमान के इशारे पर होती रही? लोग अब यह खुलकर पूछ रहे हैं कि क्या अब कुछ महीनों के लिए मंत्री पद की ‘खैरात’ देकर मदन कौशिक के उन हजारों समर्थकों को शांत करने, उन्हें बहलाने और चुनाव में उनके गुस्से को वोट बैंक में तब्दील करने की कोशिश की जा रही है, जो अपने नेता को हाशिए पर धकेले जाने से लंबे समय से अंदर ही अंदर खफा और आक्रोशित चल रहे थे।

हरिद्वार की प्रबुद्ध और सब कुछ समझने वाली जनता अब उस साढ़े चार साल के लंबे, थकाऊ और दर्दनाक इंतजार का पूरा हिसाब मांग रही है, जो विकास के बड़े-बड़े वादों और जुमलों के बीच यूं ही गुजर गया। वे विकासखंडों और नगर निगम की फाइलों को खंगाल कर पूछ रहे हैं कि जो जनहित के बड़े फैसले, जो रुके हुए विकास कार्य, जो अटकी हुई जन-कल्याणकारी योजनाएं या जो पेंडिंग फाइलें अब ‘मंत्री’ मदन कौशिक की कलम की एक पैनी नोक से मुमकिन होंगी, आखिर उन्हें पिछले इतने वर्षों में क्यों नहीं अमलीजामा पहनाया जा सका? क्या मुख्यमंत्री कार्यालय या अन्य कद्दावर मंत्रियों की फाइलें तब सिर्फ इसलिए नहीं खुलती थीं क्योंकि उन पर मदन कौशिक के निर्वाचन क्षेत्र या हरिद्वार जिले के विकास की मोहर लगी थी? यह एक गंभीर और अनुत्तरित सवाल भी उठ रहा है कि क्या मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंत्री पद की संवैधानिक ताकत के बिना कोई चुना हुआ विधायक, चाहे वह कितना भी वरिष्ठ क्यों न हो, अपने क्षेत्र का वास्तविक विकास नहीं करा सकता? और यदि ऐसा है, तो यह मौजूदा डबल इंजन सरकार की कार्यशैली और उसकी पूरी व्यवस्था की भारी नाकामी को दर्शाता है, जहाँ विकास सिर्फ मंत्रियों के रहमोकरम पर निर्भर है। जनता यह भी जानना चाहती है कि क्या मदन कौशिक जी ने खुद को सत्ता की मलाई से दूर रखकर, संगठन के बहाने, हरिद्वार के विकास को अवरुद्ध होने दिया, या फिर आलाकमान और मुख्यमंत्री ने ही जानबूझकर उनके हाथ बांध रखे थे ताकि उनका कद और न बढ़ सके? दोनों ही स्थितियां, चाहे वह आंतरिक राजनीति हो या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, हरिद्वार की जनता के साथ एक बड़ा और ऐतिहासिक धोखा है, जिसका हिसाब अब वो चुकता करने को तैयार बैठी है।

धर्मनगरी के चतुर सियासी पंडितों और नाड़ी पारखियों के बीच यह यक्ष प्रश्न सबसे ज्यादा गहरा और पेचीदा है कि इस अप्रत्याशित, चौंकाने वाले फैसले के पीछे आलाकमान का हरिद्वार के प्रति अचानक जागा अथाह, निश्छल लगाव है, या फिर यह चुनाव की आहट सुनकर बिगड़े हुए, तार-तार हो चुके ‘सियासी समीकरणों’ को किसी तरह पैचवर्क करके साधने की एक हताश, अंतिम और आत्मघाती कोशिश? लोग यह अच्छी तरह समझ रहे हैं और देख भी रहे हैं कि हरिद्वार जिले की सभी ग्यारह विधानसभा सीटें प्रदेश की सत्ता की चाबी हैं और वहां मौजूदा भाजपा विधायकों, सांसदों और यहाँ तक कि सरकार की कार्यशैली के प्रति जनता में गहरा, व्यापक और खतरनाक जनाक्रोश पनप रहा था। क्या मदन कौशिक जैसे पुराने, अनुभवी और सर्वमान्य चेहरे को लालबत्ती की चमक दिखाकर, उन्हें सरकारी लाव-लश्कर सौंपकर उस भीषण ‘एंटी-इंकंबेंसी’ की लहर को रोकने और जिले में बिखरे हुए, आपस में लड़ते असंतुष्ट गुटों को एकजुट करने का एक और प्रयोग किया जा रहा है? यदि यह सचमुच विकास के प्रति निश्छल प्रेम होता, यदि सरकार सचमुच हरिद्वार को उसका हक देना चाहती थी, तो यह प्यार साढ़े चार साल पहले ही क्यों नहीं उमड़ा, जब हरिद्वार की जनता टूटी सड़कों, बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं और बेरोजगारी जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही थी? चुनाव से ठीक पहले उमड़ा यह प्रेम साफ इशारा करता है कि नियत में भारी खोट है, दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है, और यह सब सिर्फ और सिर्फ सत्ता की कुर्सी को बचाने, उसे किसी भी तरह बरकरार रखने का एक सुनियोजित, शातिर और मायावी खेल है जिसे जनता अब बखूबी समझ चुकी है।

लोकतंत्र में मतदाता की याददाश्त उतनी कमजोर नहीं होती जितनी राजनीतिक दल समझते हैं, और वह सिर्फ बड़े चेहरे, ऊंचे पद या सरकारी तामझाम से प्रभावित नहीं होता, बल्कि वह इनके पीछे की असली नियत, छिपे हुए एजेंडे और फैसले के सही समय को भी बहुत बारीकी और गहराई से परखता है। जब चुनाव बिल्कुल सिर पर हों, जब सभी पार्टियों की रैलियां और जनसंपर्क अभियान धुआंधार तरीके से शुरू हो चुके हों, और जब किसी भी पल चुनाव आचार संहिता की तलवार लटक सकती हो, तब ऐसे पद, ऐसी लालबत्तियां बांटना वरिष्ठ नेता का सम्मान कम और पार्टी की कुर्सी बचाने की एक बहुत ही कच्ची, हड़बड़ी में ली गई और हताश रणनीति ज्यादा नजर आती है, जिसे हरिद्वार की जनता अब पूरी तरह से भांप चुकी है। मदन कौशिक को मंत्री बनाकर सरकार ने शायद सोचा था कि वे एक तीर से कई शिकार करेंगे—अपने वरिष्ठ नेता को संतुष्ट करना, उनके विशाल वोट बैंक को पार्टी से बांधे रखना, उनके समर्थकों के गुस्से को शांत करना और विपक्ष के हमलों को कमजोर करना—लेकिन क्या आज का जागरूक, सूचनाओं से लैस मतदाता इन पुरानी, घिसी-पिटी चालों में आसानी से फंसेगा? लोकतंत्र में जनता ही असली जनार्दन है, वह भाग्यविधाता है, और वह यह अच्छी तरह जानती है कि जब सत्ता खतरे में होती है, जब अपनी ही जमीन खिसकती नजर आती है, तो ऐसे हथकंडे, ऐसे मंत्रिमंडल विस्तार आम बात हैं, लेकिन यह कभी भी वास्तविक सम्मान या सुशासन का प्रतीक नहीं हो सकते, यह सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक अवसरवादिता की पराकाष्ठा है।

हरिद्वार की जागरूक, प्रबुद्ध और पढ़ी-लिखी जनता अब केवल “पद” मिलने की खबर से खुश होने वाली या ढोल-नगाड़े बजाने वाली नहीं है, और न ही वह इस दिखावे के, ऐन वक्त पर दिए गए ‘चुनावी सम्मान’ से गुमराह होने वाली है, क्योंकि उसे अब पिछले इतने सालों के, उस लंबे और दर्दनाक इंतजार के “काम” का पूरा, स्पष्ट और बिंदुवार हिसाब चाहिए। लोग अब गलियों में मदन कौशिक और उनके समर्थकों को रोककर यह तीखा सवाल पूछेंगे कि साढ़े चार साल तक हरिद्वार की इतनी भीषण अनदेखी क्यों हुई? कुंभ जैसे विश्वस्तरीय, ऐतिहासिक आयोजन के बाद भी शहर का बुनियादी ढांचा, सीवरेज सिस्टम और सड़कें इतनी बदहाल क्यों रहीं? जब हरिद्वार का युवा रोजगार के लिए दर-दर भटक रहा था, जब सिडकुल की कंपनियां बंद हो रही थीं, जब किसान बेहाल था, तब मंत्री मदन कौशिक और उनकी पूरी डबल इंजन सरकार क्या कर रही थी? क्या वे सिर्फ संगठन की बैठकें करने में व्यस्त थे या फिर उन्हें हरिद्वार की समस्याओं से कोई सरोकार ही नहीं था? मंत्री पद अब कोई जादुई छड़ी या अलादीन का चिराग नहीं है जो चंद महीनों में, रातों-रात सारी पुरानी नाकामियों, उपेक्षाओं और वादों को धो दे, बल्कि यह एक नई, कठिन और अग्निपरीक्षा जैसी कसौटी है जिस पर मदन कौशिक जी और उनकी पूरी पार्टी को जनता बहुत बेरहमी से परखेगी। हरिद्वार का हर एक मतदाता अब कमर कस चुका है, उसका फैसला सिर्फ और सिर्फ उनके पिछले साढ़े चार साल के “काम”, उनकी सक्रियता और उनकी नियत पर ही आधारित होगा, न कि इस ऐन वक्त पर थमाई गई लालबत्ती पर। यह तो अब आने वाला वक्त ही बताएगा कि यह मंत्री पद मदन कौशिक को खोया हुआ सम्मान वापस दिलाता है, उनकी राजनीतिक नैया को पार लगाता है, या फिर उन्हें जनता के और भी तीखे, और भी बेबाक और और भी तीखे सवालों के घेरे में खड़ा कर देता है जहाँ से निकलना नामुमकिन होगा।

इतिहास गवाह है कि हरिद्वार की जनता ने हमेशा से ही स्वाभिमान और विकास को तवज्जो दी है, न कि सत्ता के दिखावे को। मदन कौशिक का राजनीतिक सफर लंबा रहा है, उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन इस बार की चुनौती उनके लिए सबसे बड़ी है क्योंकि अब उन्हें न केवल विपक्ष से लड़ना है, बल्कि अपनी ही सरकार की साढ़े चार साल की कार्यशैली और जनता के बीच पनपे गहरे असंतोष का भी सामना करना है। इस मंत्री पद ने उन्हें सत्ता की मलाई तो दे दी है, लेकिन इसके साथ ही उन पर उम्मीदों और सवालों का एक ऐसा भारी बोझ भी डाल दिया है जिसे ढोना आसान नहीं होगा। क्या वे चंद महीनों में कुछ ऐसा ‘चमत्कार’ कर पाएंगे जिससे जनता पुरानी सारी बातें भूल जाए? क्या वे पार्टी के भीतर के अंतर्विरोधों को सुलझाकर हरिद्वार जिले में भाजपा को फिर से एकजुट कर पाएंगे? ये वो सवाल हैं जिनके जवाब भविष्य के गर्भ में छिपे हैं, लेकिन एक बात तो तय है—हरिद्वार की जागरूक जनता अब केवल वादों या पदों से नहीं, बल्कि ठोस काम और नेक नियत से ही प्रभावित होगी। यह मंत्रिमंडल विस्तार भाजपा के लिए एक मास्टरस्ट्रोक साबित होगा या फिर उसकी ताबूत में आखिरी कील, इसका फैसला हरिद्वार की जनता अपने वोट की चोट से जल्द ही करने वाली है, और वह फैसला निश्चित रूप से ऐतिहासिक और दूरगामी होगा।

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