गूलरभोज। ऊधमसिंहनगर की सियासी सरगर्मियों ने इन दिनों उत्तराखंड की राजनीति में एक अलग ही हलचल पैदा कर दी है। बाहर से भले ही सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश की जा रही हो, लेकिन भीतरखाने कई ऐसे घटनाक्रम घटित हो रहे हैं, जो यह संकेत देते हैं कि सत्तारूढ़ दल के अंदर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री अनिल बलूनी और पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक का एक साथ विधायक अरविंद पांडे के आवास पर जाने का कार्यक्रम सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। तीनों वरिष्ठ नेताओं का एक साथ किसी विधायक के घर जाना सामान्य शिष्टाचार भेंट से कहीं अधिक माना जा रहा है। खासकर तब, जब यह मुलाकात ऐसे समय में प्रस्तावित है, जब विधायक अरविंद पांडे खुद कई राजनीतिक और प्रशासनिक दबावों के केंद्र में नजर आ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस पूरे घटनाक्रम पर इसलिए भी टिकी हुई है, क्योंकि विधायक अरविंद पांडे को हाल ही में सरकारी और राजस्व भूमि पर अतिक्रमण के मामले में तहसील प्रशासन की ओर से नोटिस जारी किया गया है। यह नोटिस कोई साधारण प्रक्रिया भर नहीं मानी जा रही, बल्कि इसके सियासी निहितार्थों पर भी गंभीर बहस छिड़ गई है। तहसील गदरपुर द्वारा जारी नोटिस में ग्राम गुलरभोज स्थित भूमि पर अवैध निर्माण किए जाने का उल्लेख किया गया है। प्रशासन की ओर से स्पष्ट किया गया है कि हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में जांच की गई, जिसमें अतिक्रमण की पुष्टि हुई है। नोटिस में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि निर्धारित समय में अतिक्रमण नहीं हटाया गया, तो आगे कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। इस कार्रवाई ने न सिर्फ अरविंद पांडे की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, बल्कि पार्टी के भीतर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का पहले से तय दौरा कार्यक्रम सामने आया, जिसमें उनका विधायक अरविंद पांडे के आवास पर पहुंचना शामिल है। इस कार्यक्रम में उनके साथ भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री अनिल बलूनी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक का नाम जुड़ना राजनीतिक संकेतों को और भी गहरा कर देता है। आम तौर पर इस तरह की मुलाकातों को शिष्टाचार या निजी भेंट बताया जाता है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इसे केवल औपचारिकता कहना राजनीतिक जानकारों को रास नहीं आ रहा। चर्चा यह भी है कि यह मुलाकात कहीं न कहीं पार्टी के भीतर चल रहे असंतोष, आपसी खींचतान और संवादहीनता को कम करने की कोशिश हो सकती है। वरिष्ठ नेताओं की एक साथ मौजूदगी यह दर्शाती है कि मामला साधारण नहीं है और शीर्ष स्तर पर इस पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चर्चा चल रही है कि विधायक अरविंद पांडे और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बीच रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रही। दोनों के बीच कथित तौर पर ‘ठंडे राजनीतिक कटाक्ष’ और आपसी मतभेदों की बातें लगातार सामने आती रही हैं। हालांकि इन चर्चाओं की कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इन अटकलों को और हवा दे दी है। प्रशासन की ओर से जारी नोटिस और उसके बाद वरिष्ठ नेताओं का अचानक सक्रिय होना, इन सबको एक-दूसरे से जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे मुख्यमंत्री और विधायक के बीच बढ़ती दूरी को पाटने की कोशिश के तौर पर भी देख रहे हैं, ताकि पार्टी के भीतर किसी बड़े असंतोष को पनपने से रोका जा सके।
भाजपा के अंदरूनी हलकों में भी इस पूरे मामले को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह नोटिस केवल एक नियमित प्रशासनिक कार्रवाई है, या इसके पीछे कोई राजनीतिक संदेश भी छिपा हुआ है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि कानून सबके लिए समान है और हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रशासन की कार्रवाई स्वाभाविक है। वहीं, कुछ लोग इसे राजनीतिक दबाव या संतुलन साधने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि नोटिस के समय और वरिष्ठ नेताओं की प्रस्तावित मुलाकात का संयोग यूं ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे पार्टी नेतृत्व की सोची-समझी रणनीति हो सकती है।
इस घटनाक्रम ने यह भी सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पार्टी नेतृत्व किसी संभावित राजनीतिक नुकसान को पहले ही भांप चुका है और उसी के तहत ‘डैमेज कंट्रोल’ की कोशिशें शुरू कर दी गई हैं। तीन-तीन बड़े नेताओं की मौजूदगी यह संकेत देती है कि मामला स्थानीय स्तर से ऊपर उठकर राज्य स्तर की राजनीति से जुड़ चुका है। यदि यह केवल एक निजी मुलाकात होती, तो संभव है कि इसे इतना महत्व न दिया जाता। लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल, जारी नोटिस और अंदरूनी असंतोष की चर्चाओं ने इस मुलाकात को असाधारण बना दिया है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस मुलाकात के नतीजे उत्तराखंड की राजनीति की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।
फिलहाल आधिकारिक तौर पर सभी पक्ष इस पूरे घटनाक्रम को सामान्य और औपचारिक मुलाकात बताने में लगे हुए हैं। न तो पार्टी की ओर से और न ही संबंधित नेताओं की तरफ से किसी तरह का बयान सामने आया है, जो इन अटकलों की पुष्टि करे। लेकिन राजनीति में अक्सर जो कहा नहीं जाता, वही सबसे ज्यादा मायने रखता है। समय, परिस्थितियां और प्रशासनिक नोटिस दृ ये सभी बातें मिलकर यह संकेत जरूर दे रही हैं कि उत्तराखंड भाजपा के भीतर सब कुछ पहले जैसा सहज और संतुलित नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मुलाकात महज बातचीत तक सीमित रहती है या फिर इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संदेश और रणनीति सामने आती है।





