काशीपुर। द्रोण सागर क्षेत्र के अंतर्गत गोविषाण टीले में पिछले काफी समय से गुलदार की लगातार मौजूदगी ने आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रखा था। स्थानीय लोगों के लिए यह इलाका भय का पर्याय बन चुका था, क्योंकि गुलदार आए दिन दिखाई दे रहा था और आवारा कुत्तों को अपना शिकार बना रहा था। रात के समय उसकी चहलकदमी इतनी बढ़ गई थी कि लोग घरों से बाहर निकलने में भी हिचकने लगे थे। बच्चों को अकेले बाहर भेजना बंद कर दिया गया था और बुजुर्गों में भी डर का माहौल बना हुआ था। गुलदार की आहट मात्र से ही लोग सहम जाते थे। लगातार बढ़ती घटनाओं के चलते क्षेत्रवासियों में यह आशंका गहराने लगी थी कि कहीं कोई बड़ी अनहोनी न हो जाए। भय, अनिश्चितता और चिंता के बीच लोग लंबे समय से वन विभाग से ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे थे।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग ने गोविषाण टीले में गुलदार को पकड़ने के लिए विशेष रेस्क्यू अभियान शुरू किया। विभाग की ओर से रणनीति के तहत कई स्थानों पर पिंजरे लगाए गए, ताकि गुलदार को सुरक्षित तरीके से पकड़ा जा सके। यह अभियान आसान नहीं था, क्योंकि गुलदार बेहद सतर्क था और पिंजरों के आसपास मंडराने के बावजूद उनमें फंस नहीं रहा था। वन विभाग की टीम लगातार क्षेत्र में निगरानी कर रही थी और गुलदार की गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जा रही थी। हर दिन नई योजना बनाई जाती, ताकि किसी भी तरह जान-माल की हानि हुए बिना गुलदार को काबू में किया जा सके। इस दौरान विभाग ने स्थानीय लोगों से भी सतर्क रहने की अपील की और रात के समय अनावश्यक बाहर न निकलने की सलाह दी।
लगातार प्रयासों और कड़ी मेहनत के बाद वन विभाग को आखिरकार उस समय सफलता मिली, जब गुलदार एक पिंजरे में फंस गया। जैसे ही यह सूचना क्षेत्र में फैली, लोगों ने राहत की सांस ली। लंबे समय से दहशत के माहौल में जी रहे लोगों के चेहरे पर सुकून साफ नजर आने लगा। गुलदार के पकड़े जाने की खबर से पूरे इलाके में चर्चा का माहौल बन गया। लोग अपने घरों से बाहर निकलकर स्थिति जानने लगे, हालांकि वन विभाग ने सुरक्षा कारणों से लोगों को दूरी बनाए रखने को कहा। यह सफलता वन विभाग के लिए भी बड़ी उपलब्धि मानी जा रही थी, क्योंकि बिना किसी नुकसान के गुलदार को पकड़ना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था।
गुलदार के पिंजरे में फंसने के बाद वन विभाग ने एहतियातन आसपास के अन्य स्थानों पर भी पिंजरे लगाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि क्षेत्र में कोई और गुलदार सक्रिय न हो। काशीपुर वन अधिकारी के निर्देशन में यह पूरा अभियान संचालित किया गया। विभाग किसी भी तरह की लापरवाही नहीं बरतना चाहता था, क्योंकि मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं पहले भी चिंता का विषय रही हैं। अधिकारियों का मानना था कि एक गुलदार के पकड़े जाने के बाद भी निगरानी जरूरी है, ताकि इलाके को पूरी तरह सुरक्षित घोषित किया जा सके।
बीती देर रात काशीपुर वन अधिकारी ललित सिंह के नेतृत्व में एक विशेष टीम ने पिंजरे में फंसे गुलदार का सफल रेस्क्यू किया। यह अभियान पूरी सतर्कता और पेशेवर तरीके से अंजाम दिया गया। टीम ने पहले गुलदार की स्थिति का आकलन किया और फिर उसे सुरक्षित तरीके से पिंजरे से बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू की। इस दौरान सभी आवश्यक सुरक्षा मानकों का पालन किया गया, ताकि किसी भी कर्मचारी को खतरा न हो और गुलदार को भी कोई चोट न पहुंचे। रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान क्षेत्र में पूरी तरह से सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखी गई थी।
इस सफल रेस्क्यू टीम में वन निरीक्षक ललित सिंह के साथ वन दरोगा जसपाल सिंह, वन बीट अधिकारी जय प्रकाश सिंह यादव, वन आरक्षी और अन्य वन कर्मी शामिल थे। सभी ने आपसी समन्वय और अनुभव के साथ इस चुनौतीपूर्ण कार्य को अंजाम दिया। टीम के सदस्यों ने बताया कि गुलदार वयस्क नर था और पूरी तरह स्वस्थ अवस्था में था। उसे किसी भी प्रकार की गंभीर चोट नहीं आई थी, जो वन विभाग के लिए राहत की बात थी। इस रेस्क्यू को विभाग की सतर्कता और कुशल कार्यप्रणाली का उदाहरण माना जा रहा है।
गुलदार को सुरक्षित रूप से रेस्क्यू करने के बाद वन विभाग ने उसे फाटो रेंज के घने जंगलों में छोड़ दिया। यह क्षेत्र गुलदार के प्राकृतिक आवास के अनुकूल माना जाता है, जहां उसके लिए पर्याप्त भोजन और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध है। वन अधिकारियों का कहना है कि गुलदार को आबादी से दूर जंगल में छोड़ना ही सबसे बेहतर विकल्प था, ताकि भविष्य में मानव और वन्यजीव के बीच टकराव की स्थिति न बने। गुलदार को जंगल में छोड़े जाने की पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से पूरी की गई।
गुलदार के रेस्क्यू और उसे जंगल में छोड़े जाने के बाद गोविषाण टीले और आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों ने राहत की सांस ली है। लंबे समय बाद क्षेत्रवासियों को ऐसा महसूस हुआ कि अब वे बिना डर के सामान्य जीवन जी सकेंगे। बच्चों को लेकर अभिभावकों की चिंता कम हुई है और बुजुर्गों ने भी सुकून महसूस किया है। लोगों ने वन विभाग की इस कार्रवाई की सराहना करते हुए कहा कि समय रहते उठाया गया यह कदम बेहद जरूरी था। स्थानीय निवासियों का मानना है कि यदि विभाग ने तत्परता नहीं दिखाई होती, तो कोई बड़ा हादसा हो सकता था।
वन विभाग ने इस मौके पर लोगों से अपील की है कि वे भविष्य में भी सतर्क रहें और वन्यजीवों से संबंधित किसी भी गतिविधि की सूचना तुरंत विभाग को दें। अधिकारियों ने कहा कि जंगलों से सटे इलाकों में रहने वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए और रात के समय अकेले बाहर निकलने से बचना चाहिए। विभाग का यह भी कहना है कि मानव और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता है और इसी उद्देश्य से ऐसे रेस्क्यू अभियान चलाए जाते हैं।
समग्र रूप से देखा जाए तो गोविषाण टीले में गुलदार के आतंक का अंत वन विभाग की सक्रियता और टीमवर्क का परिणाम है। यह घटना न केवल विभाग की कार्यकुशलता को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि सही योजना और समन्वय से जटिल से जटिल समस्याओं का समाधान संभव है। क्षेत्रवासियों को अब उम्मीद है कि भविष्य में भी वन विभाग इसी तरह सतर्कता बरतेगा और किसी भी संभावित खतरे से पहले ही निपटने के लिए तैयार रहेगा। गुलदार के सुरक्षित रेस्क्यू और उसे जंगल में छोड़े जाने से एक बार फिर यह संदेश गया है कि मानव और वन्यजीव के बीच संतुलन बनाए रखना ही सबसे बड़ा समाधान है।





