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गेहूं खरीद पर प्रशासन की सुस्ती और अलका पाल का सरकार के खिलाफ तीखा प्रहार

किसानों की मेहनत पर प्रशासन की बेरुखी देख भड़कीं अलका पाल, बंद पड़े क्रय केंद्रों को तुरंत सक्रिय करने की मांग के साथ दी तीखी चेतावनी, अन्नदाताओं के हक़ के लिए कांग्रेस ने खोला मोर्चा।

काशीपुर। देवभूमि की कृषि प्रधान धरती काशीपुर में इस बार अन्नदाताओं के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी होती जा रही हैं, क्योंकि रबी की मुख्य फसल गेहूं की कटाई का शंखनाद होने के बावजूद सरकारी खरीद की मशीनरी पूरी तरह सुस्त नजर आ रही है। किसानों की इसी ज्वलंत समस्या को लेकर महानगर कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल ने सरकार और प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए तीखे तेवर अपनाए हैं। उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हर वर्ष नियत तिथि के अनुसार 1 अप्रैल से गेहूं क्रय केंद्रों का संचालन विधिवत रूप से आरंभ हो जाता है, किंतु वर्तमान में कैलेंडर की तारीखें आगे बढ़ने के बाद भी धरातल पर तैयारियों का नामोनिशान तक नहीं दिख रहा है। अलका पाल ने प्रशासन की इस कार्यप्रणाली को ‘समझ से परे’ बताते हुए स्पष्ट किया कि सरकार की यह बेरुखी सीधे तौर पर किसान विरोधी मानसिकता को दर्शाती है। उनके अनुसार, जब किसान खून-पसीना एक कर फसल तैयार कर चुका है, तब सरकार का केंद्रों को लेकर हाथ पर हाथ धरे बैठना उसकी मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जिससे किसानों में भारी आक्रोश व्याप्त है।

तराई के इलाकों में गेहूं की सुनहरी बालियां अब कटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं और कई प्रगतिशील क्षेत्रों में तो अन्नदाताओं ने फसल का कटान भी युद्ध स्तर पर आरंभ कर दिया है, लेकिन विडंबना देखिए कि इस उपज को सुरक्षित बेचने के लिए सरकारी तंत्र ने अभी तक कोई मुकम्मल इंतजाम नहीं किए हैं। महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने जमीनी हकीकत बयां करते हुए बताया कि पिछले वर्ष के आंकड़ों पर गौर करें तो मंडी परिसर में 14 और ग्रामीण अंचलों में 4 महत्वपूर्ण क्रय केंद्र सक्रिय किए गए थे, जिन्होंने किसानों को बिचौलियों के चंगुल से बचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। परंतु इस बार स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है; न तो काशीपुर की मुख्य मंडी में कोई हलचल दिख रही है और न ही दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों में कांटों की व्यवस्था की गई है। अलका पाल ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि किसान अपनी उपज लेकर कहां जाए, यह सवाल आज हर काश्तकार के मन में कौंध रहा है। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी दी कि यदि जल्द ही केंद्रों का विधिवत उद्घाटन नहीं किया गया, तो किसान अपनी मेहनत की कमाई को औने-पौने दामों पर बेचने के लिए मजबूर हो जाएगा, जो कि एक कृषि प्रधान राज्य के लिए शर्मनाक स्थिति होगी।

सरकारी उदासीनता के इस दौर में किसानों के हितों की रक्षा का संकल्प दोहराते हुए अलका पाल ने शासन और प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि बिना किसी विलंब के मंडी और समस्त ग्रामीण क्षेत्रों में गेहूं खरीद केंद्रों की स्थापना सुनिश्चित की जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रशासन को कागजी घोड़े दौड़ाने के बजाय तुरंत धरातल पर उतरकर व्यवस्थाओं का निरीक्षण करना चाहिए ताकि किसानों को अपनी फसल का एक-एक दाना बेचने में किसी भी प्रकार की असुविधा या तकनीकी बाधा का सामना न करना पड़े। महानगर कांग्रेस अध्यक्ष ने इस बात पर भी विशेष बल दिया कि विलंब होने की स्थिति में बिचौलिए और जमाखोर सक्रिय हो सकते हैं, जो भोले-भले किसानों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें आर्थिक नुकसान पहुंचा सकते हैं। अलका पाल ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही ‘गेहूं क्रय केन्द्रों को शीघ्र खोले प्रशासन’ के नारे को अमली जामा नहीं पहनाया गया, तो कांग्रेस पार्टी किसानों के कंधे से कंधा मिलाकर सड़कों पर उतरने और उग्र आंदोलन करने से भी पीछे नहीं हटेगी। उनकी इस बेबाक बयानबाजी ने अब प्रशासन के गलियारों में खलबली मचा दी है और आम जनता भी अब सरकार के अगले कदम का बेसब्री से इंतजार कर रही है।

वर्तमान परिदृश्य में जब लागत बढ़ने से किसान पहले ही आर्थिक दबाव में है, ऐसे में अलका पाल द्वारा उठाया गया यह मुद्दा क्षेत्र की राजनीति और सामाजिक विमर्श के केंद्र में आ गया है। उन्होंने प्रशासन को आईना दिखाते हुए कहा कि सरकार केवल घोषणाओं तक सीमित न रहे, बल्कि वास्तविकता में किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ दिलाने के लिए केंद्रों पर बोरे, तौल मशीनें और भुगतान की पारदर्शी प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से सुचारू करे। अलका पाल ने अपने संबोधन के अंत में पुनः दोहराया कि किसान देश की रीढ़ है और यदि उसकी उपज को सही समय पर नहीं खरीदा गया, तो यह न केवल किसान के साथ अन्याय होगा बल्कि पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को गर्त में धकेलने जैसा कृत्य माना जाएगा। अब गेंद प्रशासन के पाले में है कि वह कितनी तत्परता से इन केंद्रों का संचालन शुरू कर पाता है। काशीपुर की जनता और किसान संगठन अब अलका पाल के इस आह्वान के बाद एकजुट होकर अपनी मांगों को लेकर मुखर हो रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि आगामी दिनों में यदि केंद्रों के द्वार नहीं खुले, तो प्रशासन को भारी जन-दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

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