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गड्ढों में दम तोड़ती व्यवस्था, रेंगती जिंदगी और प्रशासन की बेशर्म खामोशी

काशीपुर। कुमाऊं और गढ़वाल को जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार यानी काशीपुर-रामनगर संपर्क मार्ग आज बदहाली के आंसू रो रहा है। करीब 30 किलोमीटर लंबा यह मार्ग अब सड़क कम और जानलेवा गड्ढों का समंदर ज्यादा नजर आता है, जहाँ की जर्जर स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि प्रशासन ने इस क्षेत्र को अपने हाल पर लावारिस छोड़ दिया है। स्थानीय लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है और उनका कहना है कि यदि कोई व्यक्ति यहाँ दिन में केवल एक चक्कर लगा ले, तो उसे ऐसा अनुभव होता है जैसे वह दुर्गम लद्दाख की पहाड़ियों की यात्रा करके लौटा हो। यह तुलना केवल मजाक नहीं बल्कि उस कड़वे सच का आईना है, जिसमें केला मोड़ से लेकर रामनगर तक का सफर जो कभी चंद मिनटों का हुआ करता था, अब एक घंटे से भी अधिक समय खा रहा है। हालत यह है कि अगर कोई चालक यहाँ से 45 मिनट में सुरक्षित पहुंच जाए, तो वह किसी वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर से कम नहीं माना जाएगा, क्योंकि यहाँ कदम-कदम पर मौत के गहरे गड्ढे वाहन सवारों का स्वागत कर रहे हैं।

इस मार्ग की दुर्दशा का सबसे खौफनाक मंजर तब देखने को मिलता है जब भारी वाहन और बसें इन गड्ढों से गुजरती हैं, जहाँ एक छोटी सी चूक किसी बड़े सामूहिक हत्याकांड का सबब बन सकती है। विशेष रूप से फ्लाईओवर के पास स्थित सर्विस रोड पर एक ऐसा विशालकाय गड्ढा विकसित हो चुका है, जिसने राहगीरों की रातों की नींद उड़ा दी है। दिन के उजाले में तो चालक किसी तरह बचाते-बचाते निकल जाते हैं, लेकिन रात के अंधेरे में अनजान बाहरी मुसाफिरों के लिए यह गड्ढा एक अदृश्य काल बन जाता है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि यहाँ से गुजरते समय लोडेड ट्रक और डंपर इस कदर तिरछे हो जाते हैं कि ऐसा लगता है मानो वे अभी पलट जाएंगे और बगल से गुजरने वाले छोटे वाहनों को अपनी चपेट में ले लेंगे। कई बार तो वाहनों के पहिए इन गड्ढों में इस कदर फंस जाते हैं कि उन्हें निकालने के लिए घंटों मशक्कत करनी पड़ती है और इस दौरान लगने वाला लंबा जाम पुलिस प्रशासन की मुस्तैदी के दावों की पोल खोलकर रख देता है।

हल्द्वानी राष्ट्रीय राजमार्ग खंड के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए स्थानीय निवासियों ने तीखा हमला बोला है और उन पर मुख्यमंत्री व केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के आदेशों की अवहेलना करने का गंभीर आरोप लगाया है। पीड़ित जनता का कहना है कि वे अपनी शिकायतें सीएम पोर्टल से लेकर आला अधिकारियों तक पहुंचा चुके हैं, लेकिन हल्द्वानी में बैठे ‘कुर्सी तोड़’ हुक्मरान शायद किसी बड़ी अनोहोनी का इंतजार कर रहे हैं। लोगों का आरोप है कि यहाँ तैनात कर्ताधर्ता खुद को देश के परिवहन मंत्री से भी ऊपर समझते हैं, तभी तो बार-बार की शिकायतों के बाद भी इस मार्ग की सुध लेने वाला कोई नहीं है। हालत यह है कि प्रदेश के वीआईपी और मंत्री भी जब यहाँ से गुजरते हैं, तो उनके काफिले को भी इन जानलेवा गड्ढों से बचते-बचाते कछुआ चाल चलना पड़ता है, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठे इन जिम्मेदारों की अंतरात्मा अभी तक नहीं जागी है। यह लापरवाही केवल एक सड़क की खराबी नहीं, बल्कि उन हजारों जिंदगियों के साथ किया जा रहा खिलवाड़ है जो रोजाना इस मार्ग का इस्तेमाल करते हैं।

“सड़क नहीं, यह है मौत का कुआँ: कब जागेगा हमारा शासन?(प्रतीकात्मक चित्र)

हाल ही में हुई बारिश ने इस सड़क के निर्माण में हुए भ्रष्टाचार की परतों को भी पूरी तरह उघाड़कर रख दिया है, जहाँ महज दो-तीन दिन की बरसात ने हाईवे को छलनी कर दिया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि हर मानसून में यहाँ की सड़कें बह जाती हैं, जो घटिया निर्माण सामग्री के इस्तेमाल की ओर सीधा इशारा करती हैं। कुछ समय पहले विभाग की टीम सैंपल लेने के बहाने आई तो थी, लेकिन उसके बाद क्या कार्रवाई हुई, यह आज भी एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है। बारिश के पानी से लबालब भरे इन गड्ढों के कारण यह पूरा इलाका ‘एक्सीडेंट जोन’ में तब्दील हो चुका है, जहाँ एक तरफ के गड्ढे से बचने की कोशिश में चालक दूसरी तरफ की खाई या वाहन से टकरा जाता है। सुबह के समय एक लोडेड ट्रॉली के आधे घंटे तक फंस जाने के कारण ट्रैफिक को डाइवर्ट करना पड़ा, जिससे साबित होता है कि यह मार्ग अब भारी वाहनों के भार को सहने की क्षमता पूरी तरह खो चुका है और प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति में व्यस्त है।

हैरानी की बात यह है कि जहाँ एक तरफ सड़कें मौत का जाल बनी हुई हैं, वहीं पुलिस प्रशासन नियमों के नाम पर जनता की जेब ढीली करने में जरा भी कोताही नहीं बरत रहा है। वाहन चालकों का कहना है कि अगर सीट बेल्ट न लगी हो तो 5000 का चालान काटने के लिए पुलिस तुरंत मुस्तैद हो जाती है, लेकिन यदि इन गड्ढों के कारण किसी का एक्सीडेंट हो जाए या जान चली जाए, तो उसका हर्जाना भरने वाला कोई नहीं है। जनता सवाल पूछ रही है कि चालान काटने की तत्परता दिखाने वाली सरकार गड्ढों को भरने में इतनी सुस्त क्यों है? भाजपा का झंडा लगी गाड़ियाँ भी जब इन रास्तों से गुजरती हैं, तो उन्हें भी अपनी शान-ओ-शौकत किनारे रखकर बैक गियर डालना पड़ता है और सावधानी से निकलना पड़ता है, फिर भी सत्ताधारी दल के जनप्रतिनिधि इस ज्वलंत मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं। यह विडंबना ही है कि टैक्स भरने वाली जनता को बुनियादी सुविधाएं देने के बजाय उन्हें केवल डराने और वसूलने का काम किया जा रहा है, जिससे आम जनमानस में गहरा रोष व्याप्त है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दुखद पहलू यह है कि जनप्रतिनिधियों ने जनता के फोन उठाना और उनकी समस्याओं को सुनना पूरी तरह बंद कर दिया है, जिससे ऐसा लगता है कि वे भी राजमार्ग के अधिकारियों के साथ मिलकर भ्रष्टाचार की चादर ओढ़कर सो गए हैं। पिछले दो-तीन हफ्तों से स्थिति लगातार विकराल होती जा रही है और स्थानीय लोग आपस में चर्चा कर रहे हैं कि शायद सरकार किसी लहू-लुहान लाश को देखने के बाद ही हरकत में आएगी। रात के सन्नाटे में जब गाड़ियाँ इन गड्ढों में उछलती हैं, तो उनकी लाइटें और ब्रेक फेल होने का डर बना रहता है, जो किसी भी समय एक वीभत्स सड़क हादसे को अंजाम दे सकता है। काशीपुर-रामनगर रोड की यह बदहाली आज उत्तराखंड के विकास के दावों पर एक बड़ा काला धब्बा है, जिसे मिटाने के लिए न तो स्थानीय प्रशासन गंभीर दिख रहा है और न ही शासन स्तर पर कोई ठोस पहल होती नजर आ रही है। यदि समय रहते इन ‘मौत के गड्ढों’ को नहीं भरा गया, तो आने वाले दिनों में जनता का यह सब्र हिंसक विरोध में बदल सकता है।

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