काशीपुर। शिवनगर क्षेत्र में मानवता को शर्मसार कर देने वाले एक मामले ने उस वक्त करुणा का रूप ले लिया जब एक बेजुबान कुत्ते के जबड़े में लगे गहरे और सड़ते हुए घाव को देखकर स्थानीय लोगों की रूह कांप गई, परंतु व्यवस्था की उदासीनता के बीच अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज प्रियंका चौधरी मसीहा बनकर सामने आईं। खेल के मैदान में विरोधियों के छक्के छुड़ाने वाली इस जांबाज खिलाड़ी ने अपनी टीम की सदस्य नेहांजलि बजाज और शालिनी सिंह के साथ मिलकर घंटों की मशक्कत के बाद उस तड़पते हुए जानवर का रेस्क्यू किया और उसे सुरक्षित उपचार उपलब्ध कराकर जीवनदान दिया। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कुत्ता कई दिनों से असहनीय पीड़ा में इधर-उधर भटक रहा था, लेकिन समाज की बेरुखी ने उसे मौत के मुहाने पर खड़ा कर दिया था, जिसे अंततः इन महिला शक्ति के अदम्य साहस ने बचा लिया। यह घटना न केवल पशु क्रूरता के प्रति हमारी संवेदनाओं को झकझोरती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि यदि इरादे नेक हों तो बिना किसी सरकारी तामझाम के भी बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं।
मीडिया से मुखातिब होते हुए प्रियंका चौधरी ने अपने सेवाभावी सफर के बारे में विस्तार से चर्चा की और बताया कि उनकी करुन्यम एनजीओ और राइज एवर ईगो जैसी संस्थाएं पूरी तरह से इन बेजुबानों के कल्याण के लिए समर्पित हैं जो दिन-रात एक कर सेवा कार्य में जुटी रहती हैं। उन्होंने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका मुख्य ध्येय किसी संस्था का नाम चमकाना नहीं, बल्कि केवल उन बेजुबानों की पुकार सुनना है जिन्हें समाज अक्सर अनदेखा कर देता है, और इसी कड़ी में वे अन्य समूहों के साथ मिलकर काम करने में विश्वास रखती हैं। जब भी काशीपुर के किसी कोने से किसी घायल गौवंश या कुत्ते की सूचना मिलती है, तो वे अपनी टीम के साथ सक्रिय हो जाती हैं और संसाधनों की कमी के बावजूद ख्वाहिश एनजीओ जैसे सहयोगी संगठनों की मदद लेकर उन्हें राहत पहुंचाने का प्रयास करती हैं। यह आपसी तालमेल इस बात का प्रमाण है कि सेवा की राह में जब सामूहिक शक्ति मिलती है, तो बड़े से बड़े संकट का समाधान निकल आता है और मानवता की जीत होती है।
सरकार की भूमिका और स्थानीय प्रशासन के रवैये पर कड़े सवाल उठाते हुए प्रियंका चौधरी और नेहांजलि बजाज ने खुलासा किया कि काशीपुर में पशु कल्याण की स्थिति लंबे समय तक अत्यंत दयनीय बनी रही, जिसके खिलाफ उन्होंने मुख्यमंत्री पोर्टल पर निरंतर शिकायतें दर्ज कराई थीं। उनकी कड़ी मेहनत और बार-बार की गई गुहार का ही नतीजा है कि शहर में अब ‘एबीसी’ यानी पशु जन्म नियंत्रण केंद्र (Animal Birth Control Center) की स्थापना हो पाई है, जो आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी को रोकने और उनके व्यवहार में आक्रामकता को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि सरकार ने केंद्र तो खोल दिया है, लेकिन आम जनता में इसके प्रति जागरूकता का नितांत अभाव है, जबकि यहां नसबंदी की सुविधा पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध कराई जा रही है। एक व्यवस्थित प्रक्रिया के तहत विभाग की गाड़ी कुत्तों को ले जाती है और उपचार के बाद उन्हें वापस उसी स्थान पर छोड़ती है, जिससे समाज में कुत्तों के काटने का भय भी कम हो सकता है।
नगर के इस नए खुले एबीसी सेंटर की सीमाओं पर प्रकाश डालते हुए मुक्केबाज ने कड़वी सच्चाई बयां की कि यह केंद्र केवल नसबंदी के लिए है और यहां किसी भी घायल या बीमार पशु को रखने या उनके उपचार की कोई व्यवस्था सरकारी स्तर पर नहीं की गई है। उन्होंने सरकार से पुरजोर मांग की है कि काशीपुर जैसे बढ़ते शहर में एक सुसज्जित रेस्क्यू शेल्टर का होना अनिवार्य है, ताकि सड़क पर तड़पते किसी भी बेजुबान को तत्काल आश्रय और चिकित्सा मिल सके, क्योंकि वर्तमान में आम नागरिक घायल जानवर को देखकर भी लाचार महसूस करते हैं क्योंकि उनके पास ले जाने के लिए कोई निश्चित स्थान नहीं है। प्रियंका चौधरी और नेहांजलि बजाज के अनुसार, यदि सरकार अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरी ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ करती, तो शायद आज गली-गली में इतने एनजीओ की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, जो स्पष्ट रूप से शासन की कार्यप्रणाली में मौजूद बड़ी खामियों और पशुओं के प्रति उनकी उपेक्षापूर्ण दृष्टि की ओर इशारा करता है।
आर्थिक चुनौतियों और धरातल पर आने वाली परेशानियों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि उनकी टीम में शामिल अधिकांश सदस्य या तो विद्यार्थी हैं या शिक्षक, जैसे कि उनके साथ मौजूद महिला शिक्षिका, जो अपनी मेहनत की कमाई और सीमित वेतन का एक बड़ा हिस्सा इन बेजुबानों के इलाज पर खर्च करते हैं। वर्तमान में इन संस्थाओं को न तो सरकार से कोई वित्तीय सहायता प्राप्त हो रही है और न ही समाज के संपन्न वर्गों से कोई बड़ा दान मिल रहा है, फिर भी निजी स्तर पर चंदा इकट्ठा कर वे दवाइयां खरीदते हैं और मौके पर जाकर प्राथमिक उपचार करते हैं। जब स्थिति गंभीर होती है, तो उन्हें घायल पशुओं को अपने घरों में रखने या फिर निजी अस्पतालों में भारी भरकम खर्च उठाकर ले जाना पड़ता है, क्योंकि सरकारी पशु चिकित्सालयों में सुविधाओं का घोर अभाव है। यहाँ तक कि गंभीर मामलों में उन्हें जानवरों को लेकर पंतनगर तक का सफर तय करना पड़ता है, जो न केवल आर्थिक रूप से बोझिल है बल्कि एक घायल जानवर के साथ लंबी यात्रा करना बेहद चुनौतीपूर्ण भी होता है।
खतरनाक और आक्रामक कुत्तों के रेस्क्यू के दौरान होने वाले जोखिमों पर बात करते हुए प्रियंका चौधरी और नेहांजलि बजाज ने एक दार्शनिक और मानवीय दृष्टिकोण साझा किया कि जिस प्रकार इंसान को दर्द होने पर गुस्सा आता है, ठीक वैसे ही ये बेजुबान भी अपनी पीड़ा को क्रोध के माध्यम से व्यक्त करते हैं। समाज अक्सर घायल कुत्तों को ‘पागल’ समझकर उनसे दूरी बना लेता है या उन्हें पत्थर मारता है, जिससे वे और अधिक हिंसक हो जाते हैं, जबकि उनकी टीम केवल सेवा और करुणा के भाव के साथ उनके करीब जाती है, जिससे डर स्वतः ही समाप्त हो जाता है। उन्होंने इस कठिन पथ पर अपने परिवार के अटूट सहयोग को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताया और कहा कि उनके घरवाले न केवल आर्थिक रूप से उनकी मदद करते हैं, बल्कि घायल जानवरों को घर में रखने की अनुमति देकर एक मिसाल पेश करते हैं। परिवार के इसी निस्वार्थ समर्थन की बदौलत वे आधी रात को भी किसी घायल की पुकार सुनकर घर से बाहर निकल पाती हैं और मानवता के इस पावन यज्ञ में अपनी आहुति दे रही हैं।





