रामनगर। विश्व विख्यात कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के शांत और सुरम्य जंगलों में इन दिनों बाघों की दहाड़ से ज्यादा जिप्सी संचालकों और प्रशासन के बीच छिड़े तीखे संग्राम की गूँज सुनाई दे रही है। पर्यटन के वैश्विक मानचित्र पर अपनी अमिट छाप रखने वाले इस अभयारण्य में सफारी वाहनों के प्रवेश को लेकर उपजा विवाद अब अपने चरम पर पहुँच चुका है, जिससे समूचे नैनीताल जिले की सियासत और प्रशासनिक गलियारों में भारी हलचल मची हुई है। कॉर्बेट प्रशासन ने इस जटिल गुत्थी को सुलझाने के लिए आगामी 1 अप्रैल की तिथि नियत की है, जब भाग्य का फैसला करने वाली लॉटरी सिस्टम के माध्यम से नए स्थायी परमिट धारकों के चयन की प्रक्रिया संपन्न की जाएगी। यह निर्णय उस समय लिया गया है जब उपलब्ध सीटों की तुलना में आवेदनों की एक अनियंत्रित बाढ़ आ गई है, जिससे चयन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना पार्क प्रबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस समय पर्यटन जगत से जुड़े हर व्यक्ति की निगाहें उसी ड्रॉ पर टिकी हुई हैं, जो यह तय करेगा कि जिम कॉर्बेट के रोमांचक सफर पर किन भाग्यशाली जिप्सियों को दौड़ने की अनुमति प्राप्त होगी और किन्हें मायूस होकर वापस लौटना पड़ेगा।
पार्क के सुचारू संचालन और व्यवस्थाओं को चाक-चौबंद करने में जुटे कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक राहुल मिश्रा ने इस पूरे घटनाक्रम पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए बताया कि पंजीकरण की लंबी प्रक्रिया के दौरान प्राप्त हुए प्रत्येक दस्तावेज की सूक्ष्मता से जांच की गई है। सत्यापन की इस अग्निपरीक्षा में जो आवेदन वैध और तकनीकी रूप से सही पाए गए हैं, उन्हें दो विशिष्ट श्रेणियों—ओपन कैटेगरी और ईडीसी श्रेणी (ईको डेवेलपमेंट कमेटी)—में वर्गीकृत किया गया है। आंकड़ों के दिलचस्प खेल को साझा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि ओपन कैटेगरी के अंतर्गत उपलब्ध मात्र 43 सीटों के सापेक्ष 64 आवेदकों ने अपनी दावेदारी पेश की है, जबकि ईडीसी श्रेणी में 50 रिक्तियों के लिए 66 आवेदन प्राप्त हुए हैं। सीटों और आवेदकों के बीच का यह भारी अंतर ही वह मुख्य कारण है जिसके चलते प्रशासन को लॉटरी का सहारा लेना पड़ रहा है। उपनिदेशक के अनुसार, जब मांग आपूर्ति से कहीं अधिक हो, तो निष्पक्षता बनाए रखने के लिए रैंडम ड्रॉ ही एकमात्र लोकतांत्रिक और न्यायोचित रास्ता बचता है, ताकि किसी भी पक्ष को पक्षपात की शिकायत का अवसर न मिल सके। प्रशासन का मानना है कि इस पारदर्शी प्रक्रिया से योग्य उम्मीदवारों का चयन होगा और भ्रष्टाचार की शिकायतों पर अंकुश लगेगा।
हालांकि, इस प्रशासनिक जादुई पिटारे को लेकर विवादों के बादल भी कम गहरे नहीं हैं, क्योंकि ईडीसी श्रेणी के कुछ आवेदकों ने अनुभव के आधार पर वरीयता दिए जाने की जोरदार वकालत की है। इन प्रदर्शनकारियों की मांग है कि जिस प्रकार ओपन कैटेगरी में 5 और 8 वर्षों के पुराने अनुभव को प्राथमिकता का आधार बनाया जाता है, ठीक वैसी ही व्यवस्था ईडीसी के लिए भी लागू की जानी चाहिए। इस विवादास्पद बिंदु पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए राहुल मिश्रा ने दोटूक शब्दों में कहा कि वर्ष 2024 की वर्तमान गाइडलाइन में ईडीसी श्रेणी के लिए अनुभव आधारित वरीयता का कोई भी लिखित प्रावधान मौजूद नहीं है। प्रशासन केवल उन्हीं नियमों का पालन करने के लिए बाध्य है जो सरकारी नियमावली में दर्ज हैं, इसलिए किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत बदलाव करना संभव नहीं होगा। नियमों की इस सख्ती ने उन अनुभवी ऑपरेटरों के बीच रोष भर दिया है जो वर्षों से पार्क की सेवा में लगे हैं, लेकिन नई नीति उन्हें नए नवेले आवेदकों के बराबर ही खड़ा कर रही है, जिससे उनके हितों पर तलवार लटकती दिखाई दे रही है। यह स्थिति पुराने जिप्सी स्वामियों को एक अनिश्चित भविष्य की ओर धकेल रही है।

इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में नैनीताल हाईकोर्ट की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसने इस मामले को एक नया विधिक मोड़ दे दिया है। ज्ञातव्य है कि साल 2024 के प्रारंभ में प्रदेश के वन मंत्री द्वारा जारी एक विवादित फरमान ने उन सभी जिप्सियों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी जिनके पास साल 2022 के बाद के स्थायी परमिट थे। सरकार के इस कठोर कदम से लगभग 15 जिप्सी स्वामियों का भविष्य अधर में लटक गया था, जिसके बाद उन्होंने न्याय की गुहार लगाते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए वन मंत्री के उस पत्र को सिरे से खारिज कर दिया और नए परमिट धारकों को एक बड़ी राहत प्रदान की। माननीय न्यायालय के इसी ऐतिहासिक आदेश के अनुपालन में अब कॉर्बेट प्रशासन ने अपनी रणनीति बदलते हुए कुल 130 जिप्सियों में से 93 वाहनों को लॉटरी के माध्यम से जंगल में प्रवेश देने का साहसिक फैसला लिया है। यह कदम विधिक रूप से तो सही लगता है, लेकिन धरातल पर इसने नए और पुराने संचालकों के बीच एक ऐसी खाई पैदा कर दी है जिसे भरना अब आसान नजर नहीं आता।
परंतु, सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि इस नई व्यवस्था ने जिप्सी मालिकों के बीच दो फाड़ कर दिए हैं और नए संचालकों में प्रशासन के प्रति भारी नाराजगी और अविश्वास का भाव देखने को मिल रहा है। इन कारोबारियों का सीधा और तीखा आरोप है कि प्रशासन 5 और 8 साल की विशेष कैटेगरी का निर्माण करके परोक्ष रूप से पुराने और रसूखदार जिप्सी स्वामियों को अनुचित लाभ पहुँचाने की कोशिश कर रहा है। उनका तर्क है कि यह भेदभावपूर्ण नीति नए युवाओं और स्थानीय उद्यमियों के मार्ग में रोड़ा अटका रही है, जिससे ‘समान अवसर’ के संवैधानिक अधिकार का हनन हो रहा है। इस विरोध का नेतृत्व कर रहे वरिष्ठ जिप्सी कारोबारी नमित अग्रवाल ने अपनी आवाज बुलंद करते हुए चेतावनी दी है कि जब उच्च न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर निष्पक्ष लॉटरी प्रणाली लागू करने का निर्देश दिया है, तो फिर अनुभवों की आड़ में किसी को प्राथमिकता देना अदालत की अवमानना के समान है। उन्होंने साफ कर दिया है कि यदि 1 अप्रैल की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई और भेदभावपूर्ण मानदंडों को नहीं बदला गया, तो वे बिना किसी देरी के दोबारा हाईकोर्ट में याचिका दायर करेंगे। नमित अग्रवाल का यह कड़ा रुख प्रशासन के लिए गले की फांस बनता जा रहा है।
रामनगर के स्थानीय पर्यटन व्यापार पर इस विवाद का असर गहराता जा रहा है। जिप्सी संचालक केवल वाहन चलाने वाले नहीं हैं, बल्कि वे उस पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं जो हजारों परिवारों की रसोई चलाता है। जब भी इस तरह की लॉटरी या पंजीकरण की प्रक्रिया में विवाद होता है, तो इसका सीधा असर पर्यटकों की बुकिंग और क्षेत्र की छवि पर पड़ता है। व्यापारियों का एक धड़ा मानता है कि अनुभव को वरीयता मिलनी चाहिए क्योंकि वे जंगल के रास्तों और वन्यजीवों के व्यवहार से बेहतर वाकिफ होते हैं, जो सुरक्षा की दृष्टि से अनिवार्य है। वहीं, युवाओं का तर्क है कि यदि नए लोगों को मौका नहीं मिलेगा, तो क्षेत्र में बेरोजगारी बढ़ेगी और पर्यटन का लाभ केवल कुछ ही हाथों में सिमट कर रह जाएगा। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व जैसे संवेदनशील इलाके में जहाँ बाघों और इंसानों के बीच का संघर्ष अक्सर खबरों में रहता है, वहाँ सफारी चालकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में प्रशासन के लिए यह संतुलन बनाना कि सुरक्षा मानकों से समझौता न हो और सभी को रोजगार का हक मिले, किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

कुल मिलाकर, कॉर्बेट के घने जंगलों के बीच शुरू हुआ यह प्रशासनिक और कानूनी दंगल अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है, जहाँ एक ओर नियमों की मर्यादा है तो दूसरी ओर रोजी-रोटी का संघर्ष। 1 अप्रैल की वह सुबह केवल एक लॉटरी प्रक्रिया नहीं होगी, बल्कि वह उन दर्जनों परिवारों के भाग्य का फैसला करेगी जिनका जीवन सफारी के इन पहियों पर टिका है। रामनगर का स्थानीय बाजार हो या रिसॉर्ट्स की लॉबी, हर तरफ बस इसी बात की चर्चा है कि क्या प्रशासन इस विवाद को कुशलता से शांत कर पाएगा या फिर लॉटरी का यह परिणाम असंतुष्टों को फिर से अदालती गलियारों की ओर धकेल देगा। यदि मामला फिर से कानूनी पचड़ों में फंसता है, तो इससे न केवल स्थानीय पर्यटन प्रभावित होगा बल्कि कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की वैश्विक छवि पर भी इसका गहरा असर पड़ सकता है। अब देखना दिलचस्प होगा कि राहुल मिश्रा के नेतृत्व में पार्क प्रशासन इस संकट से कैसे उबरता है और क्या नमित अग्रवाल जैसे आंदोलनकारियों के संशयों का निवारण हो पाता है। यह मामला अब केवल जिप्सियों का नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पर्यटन भविष्य और न्याय व्यवस्था के बीच के विश्वास का बन चुका है।
पार्क के भीतर पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर अक्सर ऐसी नीतियाँ बनाई जाती हैं जो धरातल पर विवाद का कारण बनती हैं। इस बार ईडीसी यानी ईको डेवेलपमेंट कमेटी का मुद्दा सबसे अधिक गरम है क्योंकि ये कमेटियां सीधे तौर पर स्थानीय ग्रामीणों और वन आश्रित समुदायों से जुड़ी होती हैं। यदि उन्हें रोजगार में प्राथमिकता नहीं मिलती, तो वनों के संरक्षण में उनकी भागीदारी कम हो सकती है, जो बाघों के संरक्षण के लिए एक बड़ा खतरा साबित होगा। दूसरी ओर, ओपन कैटेगरी के व्यवसायी जो भारी निवेश कर वाहन खरीदते हैं, उन्हें भी अपनी पूंजी की सुरक्षा की चिंता है। प्रशासन को चाहिए कि वह एक ऐसी दीर्घकालिक नीति बनाए जो हर दो साल में होने वाले इस विवाद को जड़ से समाप्त कर सके। जब तक नीति में स्पष्टता और पारदर्शिता नहीं आएगी, तब तक रामनगर की सड़कों पर प्रदर्शन और अदालतों में याचिकाओं का दौर चलता रहेगा। 1 अप्रैल की प्रतीक्षा अब केवल जिप्सी मालिकों को ही नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति को है जो प्रकृति और न्याय के बीच संतुलन का पक्षधर है।





