उत्तराखंड। परिवहन तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उस समय खड़े हो गए जब भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की हालिया रिपोर्ट में विभाग की व्यवस्था से जुड़े कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। लेखापरीक्षा में राज्य के विभिन्न संभागीय परिवहन कार्यालयों और सहायक संभागीय परिवहन कार्यालयों के कामकाज की विस्तृत जांच के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि वाहन पंजीकरण, ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया, परमिट प्रबंधन, कर वसूली व्यवस्था, सड़क सुरक्षा निगरानी और प्रवर्तन तंत्र जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अनेक स्तरों पर कमियां बनी हुई हैं। रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया कि नियामक ढांचे में पारदर्शिता की कमी, जवाबदेही की कमजोर व्यवस्था और निगरानी तंत्र की ढिलाई के कारण न केवल प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हुई है बल्कि सरकार को भारी राजस्व नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली में सामने आई इन खामियों ने राज्य में सड़क सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को भी गंभीर बना दिया है। लेखापरीक्षा के निष्कर्ष बताते हैं कि यदि इन व्यवस्थागत त्रुटियों को समय रहते ठीक नहीं किया गया तो इसका प्रभाव न केवल राजस्व संग्रहण पर पड़ेगा बल्कि आम जनता की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। इसी वजह से रिपोर्ट ने प्रशासनिक स्तर पर व्यापक सुधार की आवश्यकता को रेखांकित किया है और सरकार को चेताया है कि परिवहन प्रणाली में पारदर्शिता और तकनीकी निगरानी को मजबूत करना समय की बड़ी जरूरत बन चुका है।
लेखापरीक्षा में सामने आए सबसे गंभीर तथ्यों में से एक यह रहा कि राज्य में बड़ी संख्या में ऐसे वाहन सक्रिय पाए गए जिनके पास वैध फिटनेस प्रमाण पत्र नहीं था। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कुल 67,603 वाहन ऐसे पाए गए जो बिना फिटनेस प्रमाण पत्र के ही संचालन में दर्ज थे। इनमें 561 एंबुलेंस, 34 शिक्षण संस्थानों की बसें तथा 67,008 अन्य परिवहन वाहन शामिल बताए गए। किसी भी वाहन के लिए फिटनेस प्रमाण पत्र उसकी तकनीकी स्थिति और सड़क पर सुरक्षित संचालन की पुष्टि करता है। ऐसी स्थिति में इतनी बड़ी संख्या में बिना फिटनेस वाले वाहनों का चलना सड़क सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत चिंताजनक माना जा रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस प्रकार की स्थिति न केवल यात्रियों के लिए खतरा पैदा करती है बल्कि दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वाहन की समय-समय पर तकनीकी जांच न हो तो ब्रेक प्रणाली, इंजन, सस्पेंशन, लाइटिंग सिस्टम तथा अन्य सुरक्षा उपकरणों में खराबी होने की संभावना अधिक रहती है। इसके बावजूद इतने बड़े स्तर पर फिटनेस नियमों की अनदेखी यह दर्शाती है कि निगरानी और प्रवर्तन व्यवस्था पर्याप्त प्रभावी नहीं रही। लेखापरीक्षा ने यह भी संकेत दिया कि यदि इस पर सख्ती से कार्रवाई की जाए तो सड़क सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
वाहन पंजीकरण और उसके नवीनीकरण से संबंधित प्रक्रिया में भी गंभीर लापरवाही सामने आई है। जांच के दौरान पाया गया कि राज्य में 43,821 गैर-परिवहन वाहनों के पंजीकरण का नवीनीकरण लंबे समय से लंबित था। इसके अतिरिक्त 2,362 ऐसे वाहन भी पाए गए जिनका अस्थायी पंजीकरण छह महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी स्थायी पंजीकरण में परिवर्तित नहीं किया गया। सामान्य परिस्थितियों में अस्थायी पंजीकरण सीमित अवधि के लिए ही मान्य होता है और निर्धारित समय के भीतर इसे स्थायी पंजीकरण में बदलना आवश्यक होता है। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार इस प्रक्रिया की निगरानी में ढिलाई के कारण कई वाहन लंबे समय तक अस्थायी स्थिति में ही चलते रहे। इस प्रकार की स्थिति प्रशासनिक नियंत्रण प्रणाली की कमजोरियों को उजागर करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पंजीकरण व्यवस्था में सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित किया जाए तो न केवल वाहन डेटा का प्रबंधन बेहतर होगा बल्कि कर वसूली और प्रवर्तन व्यवस्था भी मजबूत हो सकती है। लेखापरीक्षा में यह भी कहा गया कि पंजीकरण से संबंधित डिजिटल प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है ताकि समयसीमा समाप्त होने पर स्वतः चेतावनी या कार्रवाई की व्यवस्था हो सके।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि वाहनों के वर्गीकरण में की गई गलतियों के कारण सरकार को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। लेखापरीक्षा में पाया गया कि 361 निर्माण उपकरण वाहनों को गलत तरीके से “अन्य” श्रेणी में दर्ज कर दिया गया था, जबकि नियमों के अनुसार उन्हें हल्के, मध्यम या भारी मोटर वाहन की श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए था। वाहन की श्रेणी के आधार पर पंजीकरण शुल्क और अन्य कर निर्धारित होते हैं, इसलिए गलत वर्गीकरण का सीधा प्रभाव राजस्व पर पड़ता है। जांच में यह सामने आया कि इस त्रुटि के कारण कई मामलों में पंजीकरण शुल्क कम वसूला गया और सरकार को आर्थिक नुकसान हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि वाहन डेटा के वर्गीकरण में सटीकता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इसी के आधार पर कर निर्धारण, परमिट प्रबंधन और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाएं संचालित होती हैं। यदि इस प्रकार की त्रुटियां लंबे समय तक बनी रहें तो राजस्व हानि के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। लेखापरीक्षा ने सुझाव दिया है कि वाहन पंजीकरण प्रणाली में डेटा सत्यापन की प्रक्रिया को मजबूत किया जाए ताकि भविष्य में इस तरह की गलतियां दोबारा न हों।
परिवहन वाहनों के परमिट से संबंधित व्यवस्था में भी कई गंभीर खामियां उजागर हुई हैं। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 6,343 परिवहन वाहनों के परमिट की अवधि समाप्त हो चुकी थी, लेकिन उनके नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। इसके बावजूद ये वाहन सक्रिय स्थिति में दर्ज रहे और संचालन करते रहे। लेखापरीक्षा में यह भी स्पष्ट किया गया कि इस आंकड़े में वे वाहन शामिल नहीं हैं जिन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया गया, स्क्रैप घोषित किया गया या चोरी अथवा रद्द पंजीकरण की श्रेणी में रखा गया था। परमिट व्यवस्था परिवहन प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है क्योंकि इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी वाहन निर्धारित नियमों और शर्तों के अनुसार ही सड़क पर संचालित हो। जब बड़ी संख्या में वाहनों के परमिट समाप्त होने के बावजूद वे संचालन में बने रहते हैं तो इससे यह स्पष्ट होता है कि निगरानी और प्रवर्तन तंत्र पर्याप्त प्रभावी नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि परमिट प्रबंधन प्रणाली को डिजिटल अलर्ट और स्वचालित निगरानी से जोड़ा जाए तो ऐसी स्थितियों को काफी हद तक रोका जा सकता है।
वाहन डेटा प्रबंधन प्रणाली की जांच में भी कई चौंकाने वाली अनियमितताएं सामने आईं। रिपोर्ट के अनुसार 20 स्कूल बसें संबंधित शिक्षण संस्थानों के बजाय निजी व्यक्तियों के नाम पर पंजीकृत थीं। इसके अलावा 1,110 वाहन ऐसे पाए गए जो एक से अधिक आरटीओ या एआरटीओ कार्यालयों में पंजीकृत थे। यह स्थिति रिकॉर्ड प्रबंधन प्रणाली में गंभीर त्रुटियों की ओर संकेत करती है। किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था में डेटा की शुद्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इसी के आधार पर नीति निर्माण, प्रवर्तन कार्रवाई और राजस्व प्रबंधन किया जाता है। यदि वाहन संबंधी डेटा में इस प्रकार की विसंगतियां मौजूद हों तो न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया प्रभावित होती है बल्कि कानून के प्रभावी अनुपालन में भी कठिनाई आती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार की समस्याओं को दूर करने के लिए आईटी प्रणाली को अधिक सुदृढ़ बनाने और डेटा सत्यापन की बहु-स्तरीय प्रक्रिया लागू करने की आवश्यकता है।
वित्तीय प्रबंधन और कर वसूली के क्षेत्र में भी परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं। लेखापरीक्षा के दौरान यह सामने आया कि वर्ष 2019 से 2024 के बीच विभाग अधिकांश वर्षों में निर्धारित राजस्व लक्ष्य हासिल करने में असफल रहा। केवल वर्ष 2022–23 ऐसा रहा जब विभाग अपने तय लक्ष्य तक पहुंच पाया, जबकि बाकी वर्षों में लक्ष्य से कम वसूली दर्ज की गई। यह स्थिति इस बात का संकेत मानी जा रही है कि कर वसूली और प्रवर्तन व्यवस्था अपेक्षित स्तर पर प्रभावी नहीं रही। विशेषज्ञों का मानना है कि परिवहन विभाग राज्य सरकार के राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत होता है और यदि इस विभाग की कर वसूली प्रणाली कमजोर पड़ जाए तो इसका सीधा प्रभाव सरकारी आय पर पड़ता है। लेखापरीक्षा रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि वाहन कर, परमिट शुल्क, पंजीकरण शुल्क तथा अन्य मदों से होने वाली आय को बढ़ाने के लिए विभाग को अधिक सक्रिय और व्यवस्थित प्रवर्तन तंत्र की आवश्यकता है। यदि कर बकाया की नियमित निगरानी और समयबद्ध वसूली की व्यवस्था लागू की जाए तो राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। रिपोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि डिजिटल प्रणालियों का बेहतर उपयोग और डेटा विश्लेषण के माध्यम से कर वसूली को अधिक पारदर्शी तथा प्रभावी बनाया जा सकता है।
राजस्व प्रबंधन से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि राज्य में बड़ी संख्या में वाहनों पर भारी मात्रा में वाहन कर बकाया पड़ा हुआ है। लेखापरीक्षा के अनुसार कुल 65,931 वाहनों पर लगभग 361.86 करोड़ रुपये का वाहन कर लंबित था। इनमें से 18,892 वाहनों से संबंधित 176.81 करोड़ रुपये की राशि एक वर्ष से अधिक समय से बकाया थी। इतनी बड़ी रकम का लंबे समय तक वसूली के बिना पड़े रहना वित्तीय नियंत्रण प्रणाली की कमजोरी को दर्शाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बकाया कर की समय पर वसूली नहीं की जाती तो इससे न केवल सरकारी आय प्रभावित होती है बल्कि नियमों का पालन करने वाले वाहन मालिकों के साथ भी असमानता की स्थिति उत्पन्न होती है। लेखापरीक्षा ने यह भी सुझाव दिया कि बकाया कर वाले वाहनों की पहचान कर उनके खिलाफ समयबद्ध कार्रवाई की जाए। इसके लिए डिजिटल निगरानी प्रणाली, एसएमएस अलर्ट और स्वचालित नोटिस जैसी व्यवस्थाएं लागू की जा सकती हैं ताकि वाहन मालिकों को समय रहते कर जमा कराने के लिए प्रेरित किया जा सके और राजस्व हानि को रोका जा सके।
पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के उद्देश्य से लागू किए गए ग्रीन सेस के उपयोग में भी गंभीर लापरवाही सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2024 तक ग्रीन सेस के रूप में कुल 209.20 करोड़ रुपये एकत्र किए गए थे, लेकिन इस राशि में से सरकार द्वारा केवल 10 करोड़ रुपये ही विभिन्न कार्यों के लिए जारी किए गए। इसका अर्थ यह हुआ कि ग्रीन सेस के रूप में एकत्रित अधिकांश धनराशि का उपयोग ही नहीं किया गया। सामान्यतः इस राशि का उपयोग शहरी परिवहन व्यवस्था को सुधारने, प्रदूषण नियंत्रण के उपाय लागू करने और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों में किया जाना चाहिए। लेकिन रिपोर्ट से यह संकेत मिला कि योजना और क्रियान्वयन के बीच समन्वय की कमी के कारण यह धन लंबे समय तक उपयोग में नहीं लाया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस राशि का सही तरीके से उपयोग किया जाए तो शहरों में प्रदूषण कम करने, सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जा सकती है। लेखापरीक्षा ने इस संबंध में सरकार को सलाह दी है कि ग्रीन सेस के उपयोग के लिए स्पष्ट वार्षिक कार्ययोजना तैयार की जाए ताकि एकत्रित धन का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
ग्रीन सेस से जुड़ी एक अन्य तकनीकी समस्या भी रिपोर्ट में सामने आई। लेखापरीक्षा में बताया गया कि वाहन सॉफ्टवेयर प्रणाली में ग्रीन सेस की संशोधित दरों को अपडेट करने में 26 दिनों की देरी हुई। इस देरी के कारण 2,960 वाहनों से ग्रीन सेस की कम वसूली हुई, जिससे सरकार को आर्थिक नुकसान हुआ। सामान्यतः जब भी किसी कर या शुल्क की दरों में परिवर्तन होता है तो उसे संबंधित डिजिटल प्रणाली में तुरंत अपडेट करना आवश्यक होता है ताकि सभी वाहनों से निर्धारित दर के अनुसार शुल्क वसूला जा सके। लेकिन इस मामले में आईटी प्रणाली के प्रबंधन में ढिलाई के कारण ऐसा नहीं हो सका। विशेषज्ञों का कहना है कि आज के समय में अधिकांश प्रशासनिक प्रक्रियाएं डिजिटल प्रणालियों पर आधारित हैं, इसलिए यदि आईटी सिस्टम का समय पर अद्यतन न किया जाए तो इससे राजस्व हानि और प्रशासनिक भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। लेखापरीक्षा ने सुझाव दिया कि परिवहन विभाग की डिजिटल प्रणालियों के प्रबंधन के लिए एक मजबूत तकनीकी निगरानी तंत्र विकसित किया जाए ताकि भविष्य में इस प्रकार की त्रुटियों को रोका जा सके।
दुर्घटना राहत कोष से संबंधित प्रावधानों के अनुपालन में भी गंभीर कमी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 से 2024 के बीच वाहन कर के रूप में राज्य सरकार को लगभग 3,819 करोड़ रुपये की आय प्राप्त हुई। नियमों के अनुसार इस आय का दो प्रतिशत यानी लगभग 76.38 करोड़ रुपये दुर्घटना राहत कोष में जमा किया जाना चाहिए था। लेकिन जांच में पाया गया कि इस अवधि में केवल 30.02 करोड़ रुपये ही इस कोष में जमा किए गए। इस प्रकार लगभग 46.36 करोड़ रुपये कम जमा किए गए। दुर्घटना राहत कोष का उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों को तत्काल सहायता उपलब्ध कराना होता है। ऐसे में निर्धारित राशि का पूरा योगदान न किया जाना इस कोष की प्रभावशीलता को प्रभावित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए इस कोष का मजबूत होना अत्यंत आवश्यक है ताकि जरूरतमंद लोगों को समय पर आर्थिक सहायता मिल सके। लेखापरीक्षा ने सुझाव दिया कि भविष्य में नियमों के अनुसार निर्धारित प्रतिशत की राशि नियमित रूप से इस कोष में जमा की जाए।
सड़क सुरक्षा कोष के उपयोग से जुड़ी स्थिति भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं पाई गई। रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2024 तक सड़क सुरक्षा कोष में कुल 95.75 करोड़ रुपये जमा हुए थे, लेकिन विभिन्न विभागों को केवल 39.75 करोड़ रुपये ही जारी किए गए। इसका अर्थ यह हुआ कि बड़ी राशि लंबे समय तक उपयोग में नहीं लाई गई। सड़क सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं का उद्देश्य दुर्घटनाओं को कम करना, यातायात व्यवस्था को सुरक्षित बनाना और जनजागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ावा देना होता है। लेकिन जब इस प्रकार के कोष का उपयोग सीमित स्तर पर होता है तो योजनाओं के क्रियान्वयन की गति भी धीमी पड़ जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सड़क सुरक्षा कोष की राशि का व्यवस्थित उपयोग किया जाए तो सड़क संकेतों में सुधार, ट्रैफिक प्रबंधन, जागरूकता अभियान और सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता जैसे कई महत्वपूर्ण कार्यों को गति दी जा सकती है। लेखापरीक्षा ने सुझाव दिया है कि इस कोष के उपयोग के लिए स्पष्ट योजना बनाकर समयबद्ध तरीके से परियोजनाओं को लागू किया जाए ताकि सड़क सुरक्षा के लक्ष्य को प्रभावी रूप से हासिल किया जा सके।
परिवहन व्यवस्था में ड्राइविंग लाइसेंस से संबंधित प्रणाली की जांच के दौरान भी कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। लेखापरीक्षा के दौरान सारथी पोर्टल के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया तो यह पाया गया कि कई मामलों में एक ही व्यक्ति के नाम पर एक से अधिक ड्राइविंग लाइसेंस जारी कर दिए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार 144 व्यक्तियों को कुल 288 ड्राइविंग लाइसेंस जारी किए गए, जिसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति के पास औसतन दो लाइसेंस मौजूद थे। कुछ मामलों में दोनों लाइसेंस उत्तराखंड से ही जारी किए गए थे, जबकि कुछ अन्य मामलों में एक लाइसेंस राज्य से और दूसरा किसी अन्य राज्य से जारी हुआ था। इस प्रकार की स्थिति न केवल प्रशासनिक त्रुटि को दर्शाती है बल्कि इससे कानून व्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी चालक के पास दो अलग-अलग लाइसेंस हों तो दुर्घटना या यातायात उल्लंघन की स्थिति में उसकी पहचान और रिकॉर्ड का सही ढंग से सत्यापन करना कठिन हो जाता है। लेखापरीक्षा ने इस समस्या को गंभीर मानते हुए सुझाव दिया कि ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में डेटा सत्यापन को अधिक सख्त बनाया जाए और राष्ट्रीय स्तर पर लाइसेंस डेटाबेस के साथ समन्वय बढ़ाया जाए, ताकि भविष्य में इस प्रकार की विसंगतियों को रोका जा सके।
ड्राइविंग लाइसेंस के प्रारूप से जुड़ी कमियां भी रिपोर्ट में उजागर हुई हैं। जांच में यह पाया गया कि परिवहन विभाग द्वारा जारी किए जा रहे लाइसेंस का स्वरूप केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं था। लाइसेंस में कई महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए स्थान ही उपलब्ध नहीं था, जिनमें अंगदान की सहमति, दिव्यांग व्यक्तियों के लिए विशेष वाहन की जानकारी, पर्वतीय क्षेत्रों में वाहन चलाने की वैधता तथा आपातकालीन संपर्क नंबर जैसी महत्वपूर्ण सूचनाएं शामिल हैं। इन जानकारियों का अभाव आपातकालीन परिस्थितियों में गंभीर समस्या उत्पन्न कर सकता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी दुर्घटना के दौरान चालक के लाइसेंस में आपातकालीन संपर्क नंबर या स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी उपलब्ध न हो तो बचाव कार्यों में कठिनाई आ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक समय में ड्राइविंग लाइसेंस केवल पहचान का दस्तावेज नहीं रह गया है, बल्कि यह सुरक्षा और आपातकालीन सहायता से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भी प्रदान करता है। इसलिए इसके प्रारूप को राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना अत्यंत आवश्यक है। लेखापरीक्षा ने सुझाव दिया कि लाइसेंस प्रारूप को अद्यतन कर सभी आवश्यक सूचनाओं के लिए स्थान सुनिश्चित किया जाए।
पर्वतीय क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन संचालन से संबंधित लाइसेंस प्रक्रिया में भी गंभीर खामियां सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार पर्वतीय क्षेत्रों में वाहन चलाने के लिए विशेष पृष्ठांकन की आवश्यकता होती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि चालक को कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में वाहन संचालन का पर्याप्त अनुभव और कौशल है। लेकिन लेखापरीक्षा में यह पाया गया कि कई मामलों में बाहरी राज्यों के चालक केवल ऑनलाइन आवेदन कर शुल्क जमा कर रहे थे और बिना किसी वास्तविक दक्षता परीक्षण के उन्हें पर्वतीय पृष्ठांकन जारी कर दिया जा रहा था। इस प्रकार की प्रक्रिया न केवल नियमों की भावना के विपरीत है बल्कि इससे सड़क सुरक्षा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कें अक्सर संकरी, घुमावदार और खतरनाक होती हैं, इसलिए वहां वाहन चलाने के लिए विशेष कौशल की आवश्यकता होती है। यदि बिना परीक्षण के ही पृष्ठांकन जारी किया जाए तो दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ सकती है। लेखापरीक्षा ने इस स्थिति को चिंताजनक बताते हुए सुझाव दिया कि पर्वतीय लाइसेंस जारी करने से पहले अनिवार्य रूप से दक्षता परीक्षण आयोजित किए जाएं और प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जाए।
प्रवर्तन व्यवस्था की प्रभावशीलता का आकलन करने के दौरान ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन प्रणाली के उपयोग में भी कई कमियां सामने आईं। राज्य में मई 2023 में लगाए गए इन कैमरों का उद्देश्य यातायात नियमों के उल्लंघन की स्वचालित पहचान करना और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करना था। रिपोर्ट के अनुसार सितंबर 2024 तक इन कैमरों की सहायता से 32,19,518 वाहनों की जांच की गई और 4,19,052 उल्लंघन दर्ज किए गए। लेकिन इन मामलों में से केवल 16,052 मामलों को ही आगे की प्रवर्तन कार्रवाई के लिए भेजा गया, जो कुल उल्लंघनों का मात्र 3.8 प्रतिशत था। यह आंकड़ा दर्शाता है कि उपलब्ध तकनीकी संसाधनों का उपयोग पूरी क्षमता के साथ नहीं किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस प्रणाली का प्रभावी उपयोग किया जाए तो यातायात नियमों के उल्लंघन को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन सीमित कार्रवाई से यह प्रणाली अपेक्षित परिणाम देने में असफल रही। लेखापरीक्षा ने सुझाव दिया कि एएनपीआर कैमरों से प्राप्त डेटा का नियमित विश्लेषण कर समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
यातायात उल्लंघनों से जुड़े चालानों के विश्लेषण में भी कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार जारी किए गए कुल चालानों में से लगभग 87.7 प्रतिशत चालान हेलमेट न पहनने और ट्रिपल राइडिंग जैसे अपेक्षाकृत सामान्य उल्लंघनों के लिए थे। जबकि अन्य गंभीर यातायात अपराधों जैसे तेज गति, नशे में वाहन चलाना या खतरनाक ड्राइविंग के मामलों में अपेक्षित स्तर पर कार्रवाई दर्ज नहीं की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रवर्तन एजेंसियां केवल छोटे उल्लंघनों पर ही ध्यान केंद्रित करें और गंभीर अपराधों पर पर्याप्त कार्रवाई न करें तो सड़क सुरक्षा के व्यापक लक्ष्य को हासिल करना कठिन हो जाता है। लेखापरीक्षा ने सुझाव दिया कि प्रवर्तन व्यवस्था को अधिक संतुलित और प्रभावी बनाया जाए, ताकि सभी प्रकार के उल्लंघनों पर समान रूप से कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।
प्रवर्तन प्रणाली की एक और गंभीर कमी तब सामने आई जब यह पाया गया कि बड़ी संख्या में चालान अदालतों को भेजे ही नहीं गए। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 से 2024 के बीच लगभग 58.02 करोड़ रुपये की राशि से जुड़े 1,65,861 चालान लंबे समय तक लंबित रहे और उन्हें न्यायालय में प्रस्तुत ही नहीं किया गया। यह स्थिति प्रवर्तन प्रक्रिया की गंभीर कमजोरी को दर्शाती है। यदि चालानों को समय पर अदालत में प्रस्तुत नहीं किया जाता तो संबंधित मामलों का निपटारा भी लंबित रहता है और यातायात नियमों के उल्लंघन पर प्रभावी दंड सुनिश्चित नहीं हो पाता। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रवर्तन प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि सभी मामलों को निर्धारित समय सीमा के भीतर न्यायालय में भेजा जाए। लेखापरीक्षा ने सुझाव दिया कि चालान प्रबंधन प्रणाली को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए और मामलों की नियमित निगरानी की जाए।
जब्त किए गए वाहनों के प्रबंधन से जुड़ी स्थिति भी संतोषजनक नहीं पाई गई। जांच में यह सामने आया कि प्रवर्तन कार्रवाई के दौरान जब्त किए गए कई वाहन तीन वर्ष से अधिक समय तक खुले स्थानों पर पड़े रहे और उनकी समय पर नीलामी नहीं की गई। लंबे समय तक खुले में पड़े रहने से इन वाहनों की स्थिति खराब हो जाती है और उनकी बाजार कीमत भी कम हो जाती है। इससे सरकार को आर्थिक नुकसान होने की संभावना बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब्त वाहनों की नीलामी के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की जानी चाहिए ताकि उनकी उपयोगिता और मूल्य बरकरार रखा जा सके। लेखापरीक्षा ने इस संबंध में सुझाव दिया कि जब्त वाहनों के प्रबंधन के लिए एक सुव्यवस्थित प्रणाली विकसित की जाए और नीलामी प्रक्रिया को पारदर्शी तथा समयबद्ध बनाया जाए।
नशे में वाहन चलाने की जांच के लिए खरीदे गए उपकरणों के उपयोग में भी गंभीर लापरवाही सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार जुलाई 2018 में 40 एल्कोमीटर खरीदे गए थे, लेकिन इनका वितरण और उपयोग समय पर नहीं किया गया। इनमें से 22 उपकरण दिसंबर 2018 में विभिन्न इकाइयों को दिए गए, जबकि शेष 18 उपकरण पांच वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद जारी किए गए। इस प्रकार की देरी से स्पष्ट होता है कि उपलब्ध संसाधनों का उपयोग प्रभावी ढंग से नहीं किया गया। यदि इन उपकरणों का समय पर उपयोग किया जाता तो नशे में वाहन चलाने के मामलों की पहचान और नियंत्रण अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता था। विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क दुर्घटनाओं के प्रमुख कारणों में नशे में वाहन चलाना भी शामिल है, इसलिए इस दिशा में सख्त निगरानी आवश्यक है।
प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी व्यवस्था की समीक्षा के दौरान यह भी पाया गया कि वर्ष 2019 से 2024 के बीच चयनित इकाइयों में प्रदूषण जांच केंद्रों का कोई निरीक्षण नहीं किया गया। इसके अतिरिक्त वाहन डेटा के विश्लेषण में 15 ऐसे मामले सामने आए जिनमें वाहन की पंजीकरण तिथि, खरीद की तिथि से पहले दर्ज की गई थी। इस प्रकार की विसंगतियां आईटी प्रणाली में डेटा सत्यापन की कमजोरी को दर्शाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण जांच केंद्रों की नियमित निगरानी न होने से पर्यावरण संरक्षण से जुड़े प्रयास भी प्रभावित हो सकते हैं। लेखापरीक्षा ने सुझाव दिया कि इन केंद्रों का नियमित निरीक्षण किया जाए और डेटा प्रबंधन प्रणाली को अधिक सुदृढ़ बनाया जाए।
रिपोर्ट के अंत में व्यवस्था में व्यापक सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए गए हैं। लेखापरीक्षा ने सिफारिश की कि वाहन की फिटनेस समाप्त होने पर वाहन मालिकों को स्वचालित एसएमएस अलर्ट भेजे जाएं, परमिट की अवधि समाप्त होने पर भी सूचना प्रणाली विकसित की जाए और ग्रीन सेस के उपयोग के लिए वार्षिक कार्ययोजना तैयार की जाए। इसके साथ ही आईटी प्रणाली और डेटा सत्यापन प्रक्रिया को मजबूत करने, प्रवर्तन तंत्र को अधिक सक्रिय बनाने तथा सड़क सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन सुझावों को गंभीरता से लागू किया जाए तो परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता को काफी हद तक बढ़ाया जा सकता है तथा सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है।





