हरिद्वार। उत्तराखंड की पावन धरा पर गंगा की कल-कल लहरों के बीच आयोजित होने वाले विश्व के सबसे विशाल और विहंगम आध्यात्मिक समागम ‘कुम्भ मेला–2027’ की तैयारियों ने अब विधिवत रूप से अपनी गति को तीव्र कर दिया है, जिससे पूरे देश में उत्साह की एक नई लहर दौड़ गई है। इस बार मेला प्रशासन ने परंपरा से हटकर एक अत्यंत अभिनव और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण अपनाते हुए इस महाकुम्भ को केवल सरकारी आयोजन तक सीमित न रखकर इसे सीधे जन-जन की भावनाओं और रचनात्मकता से जोड़ने का एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। मेला प्रशासन द्वारा जारी की गई इस नई और क्रांतिकारी पहल के अंतर्गत अब कुम्भ मेला–2027 के लिए आधिकारिक ‘प्रतीक चिन्ह’ यानी ‘लोगो’ को तैयार करने का उत्तरदायित्व आम नागरिकों, कलाकारों और देश की युवा प्रतिभाओं के कंधों पर सौंपा गया है। प्रशासन ने इस दिव्य आयोजन के लिए रचनात्मक डिज़ाइन आमंत्रित किए हैं, ताकि जब करोड़ों श्रद्धालु हरिद्वार की धरती पर चरण रखें, तो वे एक ऐसे प्रतीक को देखें जो उनकी आस्था और भारत की प्राचीन आध्यात्मिक विरासत को गौरव के साथ दुनिया के सामने प्रस्तुत करता हो।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए हरिद्वार की मेला अधिकारी श्रीमती सोनिका ने बड़े ही उत्साहजनक शब्दों में जानकारी साझा की और बताया कि कुम्भ मेला महज एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भारत की उन हजारों वर्ष पुरानी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और अटूट सनातन परंपराओं का साक्षात जीवंत प्रतीक है, जिसने संपूर्ण विश्व को शांति और बंधुत्व का मार्ग दिखाया है। श्रीमती सोनिका ने जोर देकर कहा कि इस महाकुम्भ का लोगो केवल एक साधारण चित्र मात्र नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें वह गरिमा, पावनता और श्रद्धा निहित होनी चाहिए जो गंगा मैया और इस पावन तट से जुड़ी है। मेला अधिकारी का मानना है कि जब कोई भी व्यक्ति इस प्रतीक चिन्ह को देखे, तो उसे भारत की ऋषि परंपरा, त्याग, तपस्या और उस अटूट विश्वास का बोध होना चाहिए जो सदियों से इस मेले का आधार रहा है। इसलिए प्रशासन ने तय किया है कि इस बार जनता खुद अपनी कला के माध्यम से यह तय करेगी कि कुम्भ–2027 की वैश्विक पहचान कैसी होगी।
विस्तृत दिशा-निर्देशों पर चर्चा करते हुए मेला अधिकारी श्रीमती सोनिका ने स्पष्ट किया कि जो भी प्रतिभागी इस प्रतियोगिता में भाग लेना चाहते हैं, उन्हें इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि प्रस्तावित लोगो गंगा की अनवरत बहती धारा की पवित्रता, सनातन धर्म की अडिग आस्था और कुम्भ की उस विराट परंपरा को समाहित करने में सक्षम हो, जिसे पूरी दुनिया नमन करती है। यह प्रतीक चिन्ह आगामी कुम्भ मेला–2027 की एक विशिष्ट पहचान बनेगा और भविष्य के कई वर्षों तक इस महापर्व की पावन स्मृतियों को जनमानस के हृदय में जीवंत बनाए रखने का काम करेगा। श्रीमती सोनिका ने डिजाइनरों से यह भी आग्रह किया है कि उनके सृजन में आधुनिक नवाचार के साथ-साथ आध्यात्मिकता, सांस्कृतिक मूल्यों और शुद्ध भारतीय परंपरा की स्पष्ट और अमिट झलक होनी चाहिए। उद्देश्य केवल एक लोगो बनाना नहीं है, बल्कि एक ऐसा वैश्विक चिन्ह निर्मित करना है जो पूरी दुनिया में कुम्भ मेले की दिव्यता, भव्यता और इसकी असीम आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करने में पूरी तरह समर्थ हो।

मेला प्रशासन ने इस लोगो निर्माण की प्रतियोगिता को पारदर्शी और सुगम बनाने के लिए एक निश्चित और समयबद्ध प्रक्रिया का निर्धारण भी कर दिया है, ताकि हर कलाकार को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का समान अवसर मिल सके। इच्छुक प्रतिभागियों के पास अपनी कलात्मक रचना को प्रस्तुत करने के लिए मात्र 15 दिनों का एक सीमित समय दिया गया है, जिसके भीतर उन्हें अपने द्वारा तैयार किया गया बेहतरीन लोगो सॉफ्ट कॉपी और हार्ड कॉपी—दोनों ही स्वरूपों में मेला कार्यालय तक पहुंचाना अनिवार्य होगा। प्रशासन ने इसके लिए संपर्क के माध्यमों को भी बहुत ही स्पष्ट रखा है। यदि कोई प्रतिभागी व्यक्तिगत रूप से या डाक के माध्यम से अपनी प्रविष्टि भेजना चाहता है, तो वह ‘मेला नियंत्रण भवन, निकट हर की पैड़ी, हरिद्वार’ के पते पर इसे जमा करा सकता है। इसके अलावा, आधुनिक तकनीक का लाभ उठाते हुए प्रतिभागी अपने डिजिटल डिज़ाइन को आधिकारिक ई–मेल kumbh.ccr@gmail.com पर भी प्रेषित कर सकते हैं। प्रतिभागी किसी भी कार्यदिवस में अपने नवीन डिज़ाइनों को संबंधित कार्यालय में स्वयं उपलब्ध करा सकते हैं, जिससे प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की देरी की गुंजाइश न रहे।
कला और सृजन को प्रोत्साहन देने के लिए मेला अधिकारी श्रीमती सोनिका ने एक और बड़ी घोषणा करते हुए बताया कि इस प्रतियोगिता में प्राप्त होने वाली समस्त प्रविष्टियों में से जिस भी कलाकार का डिज़ाइन सर्वश्रेष्ठ पाया जाएगा, उसे कुम्भ मेला–2027 का आधिकारिक प्रतीक चिन्ह घोषित करने का गौरव प्राप्त होगा। इतना ही नहीं, उस प्रतिभाशाली डिज़ाइनर को मेला प्रशासन द्वारा एक भव्य समारोह में सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जाएगा, जो किसी भी कलाकार के लिए जीवन भर की एक अविस्मरणीय उपलब्धि होगी। यह पहल न केवल उभरते हुए कलाकारों और अनुभवी डिजाइनरों को एक अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान करने का प्रयास है, बल्कि यह कुम्भ जैसे महान पर्व को सरकारी फाइलों से निकालकर जन-जन की सहभागिता और उनके श्रम से जोड़ने की दिशा में एक बहुत ही दूरगामी और प्रभावी कदम माना जा रहा है। सरकार चाहती है कि हर नागरिक यह महसूस करे कि वह इस महाकुम्भ के निर्माण और उसकी ब्रांडिंग का एक अभिन्न हिस्सा है।
इसी संदर्भ में, मेला प्रशासन ने विशेष रूप से उत्तराखंड के ऊर्जावान युवाओं, स्थानीय कलाकारों, छात्रों और पेशेवर डिजाइनरों से एक भावुक और प्रेरणादायक अपील की है कि वे अपनी दैनिक दिनचर्या से समय निकालकर इस पावन कार्य में अधिक से अधिक संख्या में शामिल हों। श्रीमती सोनिका ने कहा कि युवाओं की नई सोच और कलाकारों की सूक्ष्म दृष्टि मिलकर कुम्भ मेला–2027 की पहचान को एक नया और आधुनिक आयाम दे सकती है। यह प्रतियोगिता उत्तराखंड की प्रतिभा को विश्व पटल पर चमकाने का एक स्वर्णिम अवसर है, जहां एक स्थानीय छात्र या कलाकार द्वारा बनाया गया चिन्ह दुनिया भर के अरबों लोगों की आस्था का केंद्र बन जाएगा। प्रशासन का मानना है कि जब युवाओं की रचनात्मकता सनातन मूल्यों के साथ मिलती है, तो वह एक नई क्रांति का सूत्रपात करती है। इसलिए, कॉलेज के छात्रों से लेकर स्वतंत्र रूप से कार्य करने वाले कलाकारों तक, सभी को इस महायज्ञ में अपनी कला की आहुति देने के लिए आमंत्रित किया गया है।

कुम्भ मेला–2027 का यह आयोजन केवल एक धार्मिक तिथि का पालन नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता, उच्च आध्यात्मिकता और सनातन संस्कृति के उस महासंगम का परिचायक है जो वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को चरितार्थ करता है। ऐसे में इस महापर्व के लिए चुना जाने वाला लोगो महज एक ग्राफिक डिज़ाइन नहीं होगा, बल्कि वह करोड़ों श्रद्धालुओं की अंतरात्मा की आवाज, साधु-संतों की तपस्थली और मां गंगा के प्रति हमारी अटूट कृतज्ञता का एक मूर्त रूप बनकर उभरेगा। कुम्भ–2027 के लिए लोगो आमंत्रित करने की यह अनूठी और पारदर्शी पहल इस बात का स्पष्ट संकेत दे रही है कि आने वाला यह कुम्भ केवल एक प्रशासनिक या सरकारी आयोजन तक सीमित नहीं रहने वाला है। इसके विपरीत, यह आम जनता की सक्रिय भागीदारी, उनकी कलात्मक सोच और सामुदायिक सहयोग से सजी एक ऐसी भव्य सांस्कृतिक विरासत का उत्सव होगा, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल पेश करेगा। हरिद्वार अब अपनी इस नई पहचान के स्वागत के लिए पूरी तरह तैयार है, और अब गेंद उन कलाकारों के पाले में है जो अपनी कूची और तकनीक से इतिहास रचने की क्षमता रखते हैं।





