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किसान सुखवंत सिंह को अंतिम विदाई, शोक के बीच सिस्टम पर उठे तीखे सवाल

अंतिम संस्कार में उमड़े जनप्रतिनिधि और किसान नेता, आत्महत्या नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता बताकर दोषियों पर कठोर कार्रवाई व निष्पक्ष जांच की जोरदार मांग उठी।

काशीपुर। किसान सुखवंत सिंह की मौत के बाद पूरे क्षेत्र में शोक और सन्नाटे का माहौल बना हुआ है। हर तरफ गमगीन चेहरे, नम आंखें और भारी मन दिखाई दिया, जब सोमवार को अंतिम संस्कार की प्रक्रिया संपन्न कराई गई। प्रशासन और परिजनों के बीच सुबह हुई बातचीत के बाद सहमति बनने पर यह संभव हो सका कि दुख की इस घड़ी में परिवार अपने प्रियजन को अंतिम विदाई दे पाए। किसान की मौत ने केवल एक परिवार को नहीं, बल्कि पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। ग्रामीणों से लेकर राजनीतिक दलों और किसान संगठनों तक, हर कोई इस घटना को व्यवस्था की विफलता के रूप में देख रहा है। सोमवार सुबह से ही शोकाकुल माहौल में लोग सुखवंत सिंह के घर पहुंचते रहे, किसी की आंखों में आंसू थे तो कोई परिवार को ढांढस बंधाने की कोशिश कर रहा था। वातावरण में पसरी उदासी यह साफ बता रही थी कि यह घटना केवल एक आत्महत्या नहीं, बल्कि समाज के लिए एक गहरा घाव बन चुकी है।

सुबह होते ही सुखवंत सिंह के आवास पर शोक संवेदना व्यक्त करने वालों का तांता लग गया। स्थानीय लोग, रिश्तेदार, किसान नेता और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि लगातार पहुंचते रहे। काशीपुर विधायक त्रिलोक सिंह चीमा, जसपुर से कांग्रेस विधायक आदेश चौहान, भारतीय जनता पार्टी के पूर्व जिला अध्यक्ष गुंजन सुखीजा, वरिष्ठ भाजपा नेता आशीष गुप्ता, आईसीसी के सदस्य अनुपम शर्मा और पूर्व कांग्रेस महानगर अध्यक्ष मुशर्रफ हुसैन शाहिद सहित कई प्रमुख चेहरे इस दौरान मौजूद रहे। सभी ने परिवार के प्रति संवेदना प्रकट की और इस घटना को बेहद दुखद बताया। घर के बाहर खड़े लोगों के बीच चर्चा केवल एक ही विषय पर केंद्रित थी कि आखिर एक किसान को इस हद तक क्यों मजबूर होना पड़ा। लोगों का कहना था कि यदि समय रहते उसकी शिकायतों को गंभीरता से लिया जाता, तो शायद यह दिन देखने को नहीं मिलता।

अंतिम संस्कार के दौरान माहौल और भी भावुक हो गया, जब परिजनों ने कांपते हाथों से सुखवंत सिंह को अंतिम विदाई दी। पूरे समय लोगों की आंखें नम रहीं और हर कोई मन ही मन यही सवाल करता नजर आया कि क्या यह मौत रोकी जा सकती थी। प्रशासन की सहमति के बाद जब अंतिम संस्कार किया गया, तब भी आक्रोश पूरी तरह शांत नहीं हुआ था। लोग यह मान रहे थे कि दाह संस्कार भले ही हो गया हो, लेकिन न्याय की प्रक्रिया अभी शुरू हुई है। कई ग्रामीणों और किसान नेताओं ने कहा कि वे इस मामले को भूलने वाले नहीं हैं और जब तक दोषियों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक आवाज उठाते रहेंगे। श्मशान घाट से लौटते समय भी लोगों के चेहरों पर दर्द और गुस्सा दोनों साफ दिखाई दे रहे थे।

जसपुर विधायक आदेश चौहान ने इस मौके पर मीडिया से बातचीत करते हुए बेहद कड़े शब्दों में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि यह कोई सामान्य आत्महत्या नहीं, बल्कि सिस्टम द्वारा की गई हत्या है। आदेश चौहान का कहना था कि सरकार बार-बार यह दावा करती है कि वह जनता के साथ खड़ी है और खुद को जनहितैषी बताती है, लेकिन यदि वास्तव में प्रशासन और सरकार सुखवंत सिंह के साथ समय रहते खड़े होते, तो शायद आज वह जिंदा होता। उन्होंने सवाल उठाया कि जब एक किसान अपनी पीड़ा लेकर दर-दर भटकता है और उसे न्याय नहीं मिलता, तो वह आखिर कहां जाए। आदेश चौहान ने इस पूरे मामले को प्रशासनिक असंवेदनशीलता का परिणाम बताया और कहा कि यह घटना भविष्य के लिए एक चेतावनी होनी चाहिए।

अपने बयान को आगे बढ़ाते हुए आदेश चौहान ने मांग की कि इस प्रकरण में जिन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध है, उन्हें केवल निलंबित ही नहीं किया जाए, बल्कि उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई भी हो। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्रवाई एक नजीर बने, ताकि भविष्य में किसी किसान या आम आदमी के साथ इस तरह की घटना दोहराई न जाए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मजिस्ट्रियल जांच सही दिशा में आगे बढ़ती है, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यदि जांच भटकती हुई नजर आई, तो वे सीबीआई जांच की मांग करेंगे। आदेश चौहान के इन बयानों से साफ जाहिर था कि विपक्ष इस मामले को लेकर सरकार और प्रशासन पर लगातार दबाव बनाए रखने के मूड में है।

वहीं काशीपुर विधायक त्रिलोक सिंह चीमा ने भी इस घटना को अत्यंत दुखद और पीड़ादायक बताया। उन्होंने कहा कि सुखवंत सिंह की मौत ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है और किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का मन इस घटना से आहत हो सकता है। त्रिलोक सिंह चीमा ने जानकारी दी कि उन्होंने इस पूरे मामले को लेकर स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से फोन पर बातचीत की है। उनके अनुसार मुख्यमंत्री ने मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। विधायक ने भरोसा जताया कि सरकार इस मामले में किसी भी दोषी को बख्शने के पक्ष में नहीं है और जो भी व्यक्ति जांच में दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

त्रिलोक सिंह चीमा ने आगे बताया कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर वरिष्ठ अधिकारी दीपक रावत के नेतृत्व में मजिस्ट्रियल जांच बैठा दी गई है। इस जांच का उद्देश्य पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष पड़ताल करना और यह पता लगाना है कि आखिर किन परिस्थितियों में सुखवंत सिंह को यह कठोर कदम उठाना पड़ा। विधायक ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि जांच में सच्चाई सामने आएगी और पीड़ित परिवार को न्याय मिलेगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार किसानों के हितों के प्रति संवेदनशील है और इस घटना से सबक लेते हुए भविष्य में ऐसी स्थितियां न पैदा हों, इसके लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

पूरा मामला रविवार 11 जनवरी का है, जब हल्द्वानी के एक होटल में काशीपुर निवासी किसान सुखवंत सिंह ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी। इस घटना से पहले उन्होंने एक वीडियो जारी किया था, जिसने बाद में पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी। वीडियो में सुखवंत सिंह ने करीब चार करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए कुछ लोगों के नाम लिए और अपनी पीड़ा को खुलकर सामने रखा। वीडियो सामने आने के बाद यह मामला केवल आत्महत्या तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़े आर्थिक घोटाले और प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करने लगा। सोशल मीडिया पर वीडियो के वायरल होते ही लोग इस घटना को लेकर आक्रोशित हो गए और निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई।

इस प्रकरण पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने तुरंत संज्ञान लेते हुए कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत को जांच की जिम्मेदारी सौंपी। इसके साथ ही उधम सिंह नगर पुलिस प्रशासन ने भी अपनी भूमिका की समीक्षा शुरू की। जांच में लापरवाही सामने आने के बाद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने कड़ी कार्रवाई करते हुए थाना आईटीआई के एसओ और एक उपनिरीक्षक को निलंबित कर दिया। इतना ही नहीं, चौकी पैगा की पूरी पुलिस टीम को लाइन हाजिर कर दिया गया। इस कार्रवाई को प्रशासनिक स्तर पर एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि इस मामले में किसी भी तरह की ढिलाई या उदासीनता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

कुल मिलाकर काशीपुर किसान सुखवंत सिंह की मौत ने शासन, प्रशासन और समाज तीनों के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर जहां अंतिम संस्कार के साथ एक अध्याय समाप्त हुआ, वहीं दूसरी ओर न्याय की लड़ाई अभी बाकी है। परिवार, किसान संगठन और राजनीतिक दल सभी की नजरें अब जांच की दिशा और उसके परिणाम पर टिकी हुई हैं। यह घटना केवल एक किसान की मौत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की परीक्षा है, जो किसानों की समस्याओं के समाधान का दावा करती है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या जांच वास्तव में दोषियों तक पहुंचती है या यह मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाता है।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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