काशीपुर। उत्तराखंड के ऐतिहासिक और धार्मिक मानचित्र पर अपनी अमिट छाप रखने वाली काशीपुर नगरी आज पूरी तरह से शक्ति की उपासना और भक्ति के रंग में सराबोर नजर आई, जब माँ बाल सुंदरी देवी का पावन डोला अपने नगर मंदिर से प्रस्थान कर मेले की मुख्य स्थली चैती मंदिर पहुँचा। इस अलौकिक यात्रा का गवाह बनने के लिए न केवल स्थानीय निवासी, बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से आए हजारों श्रद्धालुओं का हुजूम सड़कों पर उमड़ पड़ा, जिससे पूरी काशीपुर नगरी एक विशाल जन-समुद्र में तब्दील हो गई। श्रद्धा और विश्वास की इस बयार में जैसे ही माता का डोला नगर मंदिर की चौखट से बाहर आया, वैसे ही वातावरण ‘जय माता दी’ और ‘माँ बाल सुंदरी की जय’ के गगनभेदी उद्घोष से गूंज उठा। इस ऐतिहासिक क्षण की प्रतीक्षा भक्त साल भर बड़ी ही बेसब्री से करते हैं, क्योंकि यह केवल एक डोला यात्रा नहीं, बल्कि साक्षात शक्ति का एक स्थान से दूसरे स्थान पर सूक्ष्म गमन माना जाता है। मध्यरात्रि के उस पहर में, जब प्रकृति निस्तब्ध थी, तब नगर मंदिर के भीतर मुख्य पंडा परिवार के सदस्यों और विद्वान आचार्यों द्वारा माता की स्वर्ण प्रतिमा का विशेष अभिषेक और गुप्त अनुष्ठान संपन्न किया गया, जिसके पश्चात ब्रह्ममुहूर्त की वेला में डोले ने अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया।
श्रद्धा के इस महाकुंभ की शुरुआत उस वक्त हुई जब नगर मंदिर के कपाट खुलते ही माता की दिव्य ज्योति और स्वर्ण आभा से युक्त डोले के दर्शन पाकर भक्तों की आँखें सजल हो उठीं और हर कोई माँ के चरणों में शीश नवाने को आतुर दिखाई दिया। इस भव्य डोला यात्रा में गाजे-बाजे, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर थाप ने एक ऐसा आध्यात्मिक परिवेश निर्मित कर दिया, जिसे देख हर कोई मंत्रमुग्ध था। माँ बाल सुंदरी देवी का डोला जिस-जिस मार्ग से गुजरा, वहाँ स्थानीय लोगों ने अपनी छतों, छज्जों और दरवाजों से पुष्प वर्षा कर माता का आत्मीय स्वागत किया और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की मंगल कामना की। हजारों की संख्या में मौजूद श्रद्धालुओं का जोश और उत्साह इतना अधिक था कि पुलिस प्रशासन द्वारा की गई चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था भी छोटी पड़ती नजर आई, क्योंकि हर भक्त माता की पालकी को कंधा देने या उसे छूकर अपनी आस्था व्यक्त करने के लिए व्याकुल था। यह दृश्य इतना मनोरम और ऊर्जा से भरा था कि मानो पूरी कायनात माँ की आगवानी में झुक गई हो, और काशीपुर का आकाश अबीर-गुलाल और फूलों की पंखुड़ियों से पूरी तरह आच्छादित हो गया था।

धूम-धड़ाके और आतिशबाजी के बीच जब यह पावन डोला नगर की सीमाओं को लांघते हुए चैती मेला परिसर स्थित मुख्य मंदिर पहुँचा, तो वहाँ पहले से ही हजारों की संख्या में प्रतीक्षारत भक्तों ने माता का भव्य अभिनंदन किया। माँ बाल सुंदरी देवी के डोले के पहुँचते ही मंदिर परिसर में मौजूद पंडा परिवार के मुखिया और अन्य मुख्य पुजारियों ने पूरी वैदिक रीति-नीति और शास्त्रों में वर्णित विधान के अनुसार माता की आगवानी की और विशेष आरती उतारी। इसके पश्चात, अत्यंत सावधानी और धार्मिक मर्यादाओं का पालन करते हुए माँ की उस चमचमाती स्वर्ण प्रतिमा को डोले से निकालकर चैती मंदिर के गर्भगृह में बने मुख्य आसन पर दर्शन हेतु विधिपूर्वक स्थापित किया गया। स्वर्ण प्रतिमा की स्थापना के साथ ही पूरे मंदिर परिसर में शंख ध्वनि और घंटों की गूँज सुनाई देने लगी, जिसने वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक नई आध्यात्मिक चेतना का संचार कर दिया। माँ का यह दिव्य स्वरूप इतना आकर्षक और करुणामयी है कि भक्त घंटों तक टकटकी लगाए माता की छवि को निहारते रहे, और मंदिर का प्रांगण पूरी तरह से भक्ति रस में सराबोर हो गया।
धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन परंपराओं के अनुसार, चैती मेले के इस विशेष कालखंड में माँ बाल सुंदरी देवी का चैती मंदिर में विराजमान होना साक्षात जगतजननी की उपस्थिति का प्रमाण माना जाता है। इस वर्ष भी माता की स्वर्ण प्रतिमा आगामी इकत्तीस मार्च तक चैती मंदिर में ही दर्शन के लिए उपलब्ध रहेगी, जहाँ देश और दुनिया के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालु माँ के साक्षात स्वरूप का दीदार कर सकेंगे। पंडा परिवार के सदस्यों ने जानकारी देते हुए बताया कि 31 मार्च तक चलने वाले इस विशेष दर्शन पर्व के दौरान माता की सुबह-शाम विशेष पूजा-अर्चना और श्रृंगार किया जाएगा, जो भक्तों के लिए एक दुर्लभ अनुभव होगा। काशीपुर के इस चैती मेले का धार्मिक महत्व उत्तर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों के समान माना जाता है, यही कारण है कि यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या हर साल लाखों में पहुँच जाती है। 31 मार्च की तिथि तक माँ यहाँ भक्तों की मुरादें पूरी करने के लिए उपलब्ध रहेंगी, जिसके बाद पुनः माता का डोला अपने मूल स्थान की ओर प्रस्थान करेगा, लेकिन तब तक काशीपुर का यह कोना-कोना माता की कृपा और आशीष से धन्य होता रहेगा।

भक्ति के इस वृहद आयोजन में न केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन हुआ, बल्कि इसने काशीपुर की सांस्कृतिक एकता और सौहार्द की मिसाल भी पेश की, जहाँ समाज के हर वर्ग ने माता की सेवा में अपना योगदान दिया। माँ बाल सुंदरी देवी के मंदिर में विराजते ही मेले की रौनक अब अपने चरम पर पहुँच गई है और व्यापारिक गतिविधियों के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी झड़ी लग गई है। प्रशासन और मंदिर समिति ने भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बैरिकेडिंग और सीसीटीवी कैमरों के साथ-साथ स्वयंसेवकों की एक विशाल फौज तैनात की है, ताकि आने वाले श्रद्धालुओं को दर्शन में किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। मेले में आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु की सुरक्षा और सुविधाओं का ध्यान रखते हुए पेयजल, स्वास्थ्य शिविर और यातायात प्रबंधन को दुरुस्त किया गया है। चैती मंदिर में माँ की स्वर्ण प्रतिमा की स्थापना के साथ ही जो आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह शुरू हुआ है, वह आने वाले कई दिनों तक भक्तों के मन-मस्तिष्क को शांति और सुकून प्रदान करता रहेगा, और यह 31 मार्च तक चलने वाला दिव्य उत्सव काशीपुर के इतिहास में एक और यादगार अध्याय के रूप में दर्ज हो जाएगा।





