हरिद्वार। तीर्थ नगरी की पवित्र धरा पर विकास के नाम पर भ्रष्टाचार का एक ऐसा भयावह और दुर्गंधयुक्त सैलाब उमड़ा है, जिसने न केवल सरकारी खजाने को खोखला कर दिया है, बल्कि आम जनता के भरोसे की नींव भी हिलाकर रख दी है। सिंचाई विभाग के गलियारों में करोड़ों रुपये की बंदरबांट और कागजी नहरों के निर्माण की गूंज अब देवभूमि की सर्वोच्च न्यायपालिका तक जा पहुंची है, जिसके बाद माननीय हाईकोर्ट ने अपना रौद्र रूप दिखाते हुए शासन-प्रशासन की चूलें हिला दी हैं। हरिद्वार में सिंचाई विभाग की विभिन्न केंद्र पोषित योजनाओं में हुए लगभग 51 करोड़ 22 लाख रुपये के इस महाघोटाले पर कड़ा संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने अब तक की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट तलब कर ली है। इस आदेश के बाद से प्रशासनिक हल्कों में भारी हड़कंप मचा हुआ है और उन रसूखदार अधिकारियों की नींद उड़ गई है, जो अब तक जांच रिपोर्टों को फाइलों के नीचे दबाकर खुद को सुरक्षित मान रहे थे। न्यायपालिका की इस सख्ती ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जनता की गाढ़ी कमाई को ‘भ्रष्टाचार की भेंट’ चढ़ाने वाले सफेदपोश गुनहगारों के लिए अब बच निकलना नामुमकिन होगा और उन्हें पाई-पाई का हिसाब देना ही होगा।
भ्रष्टाचार की इस काली कहानी की परतें तब खुलनी शुरू हुईं जब यह मामला हरिद्वार के प्रेमनगर आश्रम में आयोजित सिंचाई मंत्री सतपाल महाराज के जनता दरबार में पूरी प्रखरता के साथ गूंजा। वहां मौजूद पीड़ित जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने साक्ष्यों के साथ यह आवाज उठाई कि किस तरह धरातल पर विकास शून्य है और कागजों में करोड़ों के बिल भुगतान कर दिए गए हैं। जनता की इस पुकार के बाद मामला उत्तराखंड विधानसभा की चौखट तक भी पहुंचा, लेकिन सत्ता और शासन के गलियारों से मिलने वाले जवाब महज औपचारिक और असंतोषजनक ही रहे। हालांकि, जनभावनाओं के दबाव में शासन ने आनन-फानन में एक उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन तो कर दिया, जिसने अपनी जांच में अधिकारियों की संलिप्तता और वित्तीय अनियमितताओं पर मुहर भी लगा दी, परंतु विडंबना यह रही कि उस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। दोषियों के नाम उजागर होने के बावजूद उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्यवाही न होना प्रशासन की मंशा पर गहरे सवाल खड़े करता है, जिससे यह प्रतीत होता है कि इस ‘लूट तंत्र’ को ऊपर से नीचे तक एक मूक संरक्षण प्राप्त था।
न्याय की आस में जब थक-हारकर अप्रैल 2022 में रतनमणि डोभाल द्वारा हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई, तब जाकर इस घोटाले के जिन्न ने एक बार फिर करवट बदली। याची के वरिष्ठ अधिवक्ता योगेश पचोलिया ने खंडपीठ के समक्ष उन तमाम विसंगतियों को रखा, जो यह सिद्ध करने के लिए काफी थीं कि हरिद्वार में विकास का पहिया भ्रष्टाचार के कीचड़ में फंसा हुआ है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायाधीश सुभाष उपाध्याय की संयुक्त खंडपीठ ने मामले की गंभीरता और सार्वजनिक धन की बर्बादी को देखते हुए राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ तौर पर पूछा है कि जब जांच में गड़बड़ी की पुष्टि हो चुकी थी, तो अब तक दोषी अधिकारियों को सलाखों के पीछे क्यों नहीं भेजा गया या उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही क्यों नहीं की गई? माननीय न्यायालय का यह रुख उन भ्रष्ट अफसरों के लिए अंतिम चेतावनी की तरह है, जिन्होंने अपनी तिजोरियां भरने के लिए हरिद्वार की बाढ़ सुरक्षा और सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स को अधर में लटका कर जनता की जान को जोखिम में डाल दिया है।

इस महाघोटाले के भीतर छिपी योजनाओं का सच इतना कड़वा है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन को भी पलीता लगाता दिख रहा है। ‘मोदी ड्रिप योजना’ जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना, जिसका उद्देश्य किसानों के खेतों तक पानी पहुँचाना था, स्वयं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। एसटीपी जगजीतपुर से रानीमाजरा तक करीब 23 करोड़ 65 लाख रुपये की लागत से 10 किलोमीटर लंबी मुख्य नहर और 20 किलोमीटर की ब्रांच लाइन (गूल) का निर्माण होना था, लेकिन हकीकत में केवल 12 किलोमीटर का अधूरा काम दिखाकर योजना को 2020 में ही मृत घोषित कर दिया गया। इसी प्रकार सोलानी नदी के तटबंध निर्माण की 22 करोड़ 60 लाख रुपये की बाढ़ सुरक्षा योजना भी बीच में ही दम तोड़ गई, जिसका सीधा नतीजा यह है कि हर साल मानसून के दौरान हरिद्वार की गरीब जनता बाढ़ की त्रासदी झेलने को मजबूर होती है। सुरक्षा कवच के नाम पर बनाया गया यह अधूरा ढांचा सरकारी धन की बर्बादी का एक जीता-जागता स्मारक बनकर रह गया है, जहाँ कागजों में तो सुरक्षा के दावे किए गए लेकिन जमीन पर केवल तबाही का खौफ बाकी है।
सबसे अधिक चौंकाने वाला मामला सुभाषगढ़ नहर का है, जहाँ ‘कागजों में पानी बहने’ की कहावत सच साबित होती दिख रही है। करीब 6 करोड़ 95 लाख रुपये की इस परियोजना के लिए सात करोड़ से अधिक की धनराशि खर्च दिखाई गई, लेकिन जब जमीनी हकीकत का मुआयना किया गया तो वहां नहर का कोई वजूद ही नहीं मिला। यह महज़ वित्तीय हेराफेरी नहीं, बल्कि जनता की आंखों में झोंकी गई धूल है, जहाँ बिना ईंट और कंक्रीट लगाए ही करोड़ों रुपये अफसरों और ठेकेदारों की मिलीभगत से डकार लिए गए। हरिद्वार जैसे आध्यात्मिक केंद्र में, जहाँ गंगा के संरक्षण और तटों के विकास के दावे किए जाते हैं, वहां इस तरह का नंगा नाच व्यवस्था की विश्वसनीयता पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। यह मामला अब केवल भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह गंगा क्षेत्र की सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन से भी जुड़ा एक अति संवेदनशील मुद्दा बन चुका है, जिसका जवाब अब शासन को सीधे हाईकोर्ट के कटघरे में खड़े होकर देना होगा।
अब जबकि हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मामला एक निर्णायक मोड़ पर आ चुका है, सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या वास्तव में हरिद्वार की अधूरी पड़ी योजनाएं कभी पूरी हो पाएंगी? क्या जनता के खून-पसीने की कमाई को डकारने वाले वे रसूखदार अधिकारी कभी सलाखों के पीछे देख पाएंगे, या फिर यह मामला भी पुरानी परंपरा की तरह नई फाइलों और तारीखों के नीचे दबकर दम तोड़ देगा? प्रशासन पर अब जवाबदेही का भारी दबाव है और हाईकोर्ट के सख्त आदेश ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि अब दोषियों को बचाने वाले आकाओं की भी खैर नहीं होगी। हरिद्वार में विकास और भ्रष्टाचार के इस भीषण द्वंद्व में अब जीत किसकी होगी, यह तो आने वाला वक्त और कोर्ट की अगली सुनवाई तय करेगी, लेकिन इतना तो निश्चित है कि ‘कागजों में बनी नहरों’ ने भ्रष्टाचार के जिस कीचड़ को उजागर किया है, उसकी दुर्गंध अब देवभूमि के कोने-कोने में महसूस की जा रही है। जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि धरातल पर काम और अपराधियों के खिलाफ कठोरतम सर्जिकल स्ट्राइक की मांग कर रही है।





