उत्तराखंड। प्रदेश की सियासत में इन दिनों भीषण उबाल आया हुआ है और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के भीतर की अंतर्कलह अब सड़कों पर तमाशा बन चुकी है। राज्य के राजनीतिक गलियारों में इस वक्त सबसे बड़ी चर्चा पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की उस नाराजगी को लेकर है जिसने पार्टी के भीतर एक नए युद्ध का बिगुल फूंक दिया है। असल में, इस समूचे घटनाक्रम की पटकथा तब लिखी गई जब दिल्ली में पार्टी आलाकमान ने तीन पूर्व विधायकों समेत कई दिग्गजों को कांग्रेस की सदस्यता दिलाई, लेकिन ऐन वक्त पर हरीश रावत के सबसे विश्वस्त सिपहसालार माने जाने वाले पूर्व ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी की जॉइनिंग पर रोक लगा दी गई। आलाकमान के इस अप्रत्याशित फैसले ने उत्तराखंड कांग्रेस के कद्दावर नेता हरीश रावत को भीतर तक झकझोर दिया और उन्होंने अपने अपमान का हवाला देते हुए 15 दिनों के ‘राजनैतिक अवकाश’ पर जाने का ऐलान कर दिया। हरीश रावत के इस कदम ने न केवल कांग्रेस के भीतर खलबली मचा दी है, बल्कि पार्टी के पुराने घावों को भी फिर से हरा कर दिया है, जिससे अब बड़े नेताओं के बीच जुबानी जंग का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
हरीश रावत की इस नाराजगी और उनके समर्थन में उठती आवाजों ने जब जोर पकड़ा, तो पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने इस पूरे प्रकरण पर बेहद हमलावर और आक्रामक रुख अपनाते हुए आग में घी डालने का काम किया है। हरक सिंह रावत ने किसी का नाम लिए बिना लेकिन सीधा निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी के भीतर किसी को भी इस गलतफहमी या आत्ममुग्धता का शिकार नहीं होना चाहिए कि उसके बिना संगठन पंगु हो जाएगा या चुनावी वैतरणी पार नहीं हो पाएगी। उन्होंने पार्टी में पनप रहे व्यक्तिवाद पर कड़ा प्रहार करते हुए साफ लफ्जों में कहा कि यदि कल को उन्हें भी यह भ्रम हो जाए कि हरक सिंह के बिना कांग्रेस की सरकार नहीं बन सकती, तो यह उनकी सबसे बड़ी भूल होगी। हरक ने चुटकी लेते हुए यहाँ तक कह दिया कि हरीश रावत को राजनीति में वह सब कुछ हासिल हुआ है जिसकी कोई कामना कर सकता है, वे ब्लॉक प्रमुख से लेकर मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तक रहे हैं और अब तो उनके लिए केवल प्रधानमंत्री की कुर्सी ही शेष रह गई है, ऐसे में उनकी यह नाराजगी और राजनीतिक अवकाश का स्वांग आम जनता और कार्यकर्ताओं की समझ से बिल्कुल परे है।
हरक सिंह रावत के इस तीखे तंज और बयानों ने कांग्रेस के भीतर एक और ज्वालामुखी को हवा दे दी है, जिसके चलते धारचूला से कांग्रेस विधायक हरीश धामी ने अब हरक के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उन्हें आईना दिखाने की कोशिश की है। हरीश धामी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक अत्यंत कड़ा और जज्बाती पोस्ट साझा करते हुए हरक सिंह रावत को साल 2016 के उस काले अध्याय की याद दिलाई है, जब उन्होंने अपने साथ कई विधायकों को लेकर बगावत की थी और भाजपा के साथ मिलकर उत्तराखंड की तत्कालीन कांग्रेस सरकार को गिराने का काम किया था। हरीश धामी ने हरक के इस कृत्य को ‘दलबदल का महापाप’ करार देते हुए पार्टी आलाकमान से गुहार लगाई है कि वे उन गद्दारियों को न भूलें जिनके कारण कांग्रेस को वर्षों तक संघर्ष की आग में तपना पड़ा और भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा। धामी यहीं नहीं रुके, उन्होंने अपने समर्थकों और हरीश रावत के वफादारों से अपील की है कि यदि उनके नेता के आत्मसम्मान को इसी तरह चोट पहुंचाई गई, तो उन सभी को एकजुट होकर सामूहिक रूप से अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए क्योंकि अपमान की घूंट पीकर संगठन में रहना मुमकिन नहीं है।
इस पूरे सियासी ड्रामे में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल भी हरीश रावत के पक्ष में मजबूती से खड़े दिखाई दे रहे हैं, जिस पर हरक सिंह रावत ने दोबारा पलटवार करते हुए तल्ख तेवर दिखाए हैं। हरक का स्पष्ट मानना है कि व्यक्ति से बड़ा दल होता है और किसी एक चेहरे के होने या न होने से पार्टी का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता, इसलिए अहंकार का परित्याग करना ही संगठन के हित में है। दूसरी ओर, पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा जैसे अनुभवी नेता भी अब खुलकर हरीश रावत के समर्थन में मुखर हो गए हैं, जिससे स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी दो धड़ों में पूरी तरह विभाजित हो चुकी है और गुटबाजी का यह जहर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक फैल चुका है। प्रदीप टम्टा का मानना है कि पार्टी के वरिष्ठतम नेता के साथ इस तरह का व्यवहार कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ने वाला है और संजय नेगी की जॉइनिंग को रोकना सीधे तौर पर हरीश रावत के कद को छोटा करने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है, जिसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।
कांग्रेस के भीतर मचे इस भयंकर घमासान और हर तरफ से होती बयानबाजी के बीच प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल अब डैमेज कंट्रोल की भूमिका में उतर आए हैं और उन्होंने बहुत ही सधे हुए अंदाज में स्थिति को संभालने की कोशिश की है। गणेश गोदियाल का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों को लेकर मीडिया में जो खबरें चल रही हैं, वह वास्तव में कोई बड़ा मुद्दा नहीं है और हरीश रावत ने जो भी बातें रखी हैं, वे पार्टी के आंतरिक फोरम पर विचार करने योग्य हैं और उन पर गंभीरता से चर्चा की जाएगी। उन्होंने कार्यकर्ताओं और जनता को आश्वस्त करते हुए कहा कि कांग्रेस एक बड़ा परिवार है और परिवार के भीतर छोटे-मोटे मतभेद होना स्वाभाविक है, जिसे आपसी संवाद और समझदारी के साथ शीघ्र ही सुलझा लिया जाएगा। गोदियाल के मुताबिक, हरीश रावत पार्टी के संरक्षक हैं और उनकी किसी भी नाराजगी का समाधान वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकर निकाला जाएगा, इसलिए इसे किसी बड़े विवाद या गुटबाजी के रूप में पेश करना गलत है, क्योंकि कांग्रेस पूरी तरह एकजुट होकर आने वाली चुनौतियों का सामना करने को तैयार है।
उत्तराखंड की इस देवभूमि पर राजनीति अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है जहां वफादारी, गद्दारी और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का टकराव सरेआम हो रहा है और जनता इस पूरे तमाशे को बड़ी उत्सुकता के साथ देख रही है। हरक सिंह रावत द्वारा हरीश रावत की उपलब्धियों को लेकर कसा गया तंज कि ‘अब तो केवल प्रधानमंत्री बनना ही बाकी रह गया है’, राजनीतिक हलकों में काफी समय तक चर्चा का विषय बना रहेगा क्योंकि यह सीधे तौर पर एक वरिष्ठ नेता की महत्वाकांक्षाओं पर प्रहार है। वहीं, हरीश धामी द्वारा सामूहिक इस्तीफे की धमकी देना यह दर्शाता है कि कांग्रेस के भीतर असंतोष की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं और यदि आलाकमान ने तुरंत हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह कलह पार्टी की जड़ें खोदने का काम कर सकती है। फिलहाल, 15 दिनों के इस राजनैतिक अवकाश के दौरान उत्तराखंड कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति किस करवट बैठेगी, यह देखना दिलचस्प होगा, लेकिन इतना तय है कि हरक और हरीश के बीच छिड़ा यह ‘रावत बनाम रावत’ का युद्ध आने वाले दिनों में और भी ज्यादा भीषण और विवादित मोड़ लेने की पूरी संभावना रखता है।





