काशीपुर(सुनील कोठारी)। उत्तराखंड के तराई आंचल में स्थित ऐतिहासिक काशीपुर नगर इन दिनों आध्यात्मिक ऊर्जा के एक ऐसे केंद्र में तब्दील हो चुका है, जहाँ की फिजाओं में केवल और केवल शक्ति की अधिष्ठात्री माँ खोखरा देवी के जयकारों की गूंज सुनाई दे रही है। नवरात्रि के इन पावन दिनों में यहाँ का दृश्य किसी अलौकिक उत्सव जैसा प्रतीत होता है, जहाँ श्रद्धा और विश्वास का एक ऐसा ज्वार उमड़ा है जो आधुनिकता की चकाचौंध को भी पीछे छोड़ देता है। इस प्राचीन मंदिर की ख्याति केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार तक अपनी गमक फैला रही है, क्योंकि यहाँ का हर कोना किसी न किसी दैवीय चमत्कार की गवाही देता नजर आता है। विशेष रूप से नवरात्रि के समय यहाँ का वातावरण इतना अधिक आवेशपूर्ण और भक्तिमय हो जाता है कि भक्त यहाँ खिंचे चले आते हैं, और माँ के दर्शन मात्र से ही उनके जीवन की तमाम व्याधियां शांत हो जाती हैं। काशीपुर की इस महान विरासत को संजोए हुए माँ खोखरा देवी का यह दरबार आज के दौर में भी उन तमाम सनातनी मूल्यों को जीवित रखे हुए है, जिन्हें हम अक्सर किताबों में पढ़ते हैं, लेकिन यहाँ उन्हें साक्षात महसूस किया जा सकता है।
इस मंदिर की सबसे आकर्षक और दिल को छू लेने वाली परंपराओं में से एक है नवविवाहित जोड़ों का यहाँ आगमन, जो अपनी नई वैवाहिक पारी की शुरुआत करने से पहले माँ के चरणों में मत्था टेकना अपना परम सौभाग्य और कर्तव्य समझते हैं। इन दिनों मंदिर परिसर में सजे-धजे नए जोड़ों की कतारें इस बात का प्रमाण हैं कि आज की युवा पीढ़ी भी अपनी जड़ों और धार्मिक संस्कारों से उतनी ही मजबूती से जुड़ी है जितनी कि उनके पूर्वज थे। शादी के पवित्र बंधन में बंधने के तुरंत बाद पहली बार माँ के दरबार में हाजिरी लगाना यहाँ की एक ऐसी अनिवार्य मान्यता बन चुकी है, जिसके बिना वैवाहिक जीवन का श्रीगणेश अधूरा माना जाता है। यहाँ आने वाले जोड़े केवल दर्शन ही नहीं करते, बल्कि मंदिर की सात परिक्रमाएं भी पूरी श्रद्धा के साथ करते हैं, जिसे सात जन्मों के अटूट साथ का आध्यात्मिक बीमा माना जाता है। माँ खोखरा देवी के आशीर्वाद की यह रश्मि उनके आने वाले कल को सुख, समृद्धि और आपसी प्रेम से भर देती है, यही दृढ़ विश्वास उन्हें बिजनौर और चांदपुर जैसे सुदूर क्षेत्रों से भी यहाँ खींच लाता है।
आस्था की इस लंबी कतार में उत्तर प्रदेश के बिजनौर और चांदपुर जैसे इलाकों से आए आकाश चौधरी जैसे तमाम भक्तों की मौजूदगी यह दर्शाती है कि माँ के प्रति प्रेम की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। बिजनौर और चांदपुर जैसे पड़ोसी जिलों से आने वाले इन यात्रियों का कहना है कि वे यहाँ किसी सांसारिक लालच या विशेष मनोकामना की पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि शुद्ध अंतःकरण और निःस्वार्थ श्रद्धा के साथ आते हैं। बिजनौर के सीमावर्ती क्षेत्रों से आए ये भक्त बताते हैं कि हालांकि माँ खोखरा देवी उनकी प्रत्यक्ष कुलदेवी नहीं हैं, फिर भी उनके मन में माता के प्रति जो अटूट विश्वास है, वह उन्हें हर साल यहाँ आने के लिए विवश कर देता है। वे माँ से बस इतना ही मांगते हैं कि उनके परिवार में सुख-शांति बनी रहे और उनके नवविवाहित जीवन पर किसी की बुरी नजर न लगे। यह भाव ही इस मंदिर की असली शक्ति है, जहाँ भक्त अपने अस्तित्व को पूरी तरह से विस्मृत कर केवल माँ की ममता के आंचल में शरण पाने की कामना करता है, जो वास्तव में अद्भुत है।
काशीपुर के स्थानीय निवासी जो कचहरी और द्रोणा सागर जैसे ऐतिहासिक स्थलों के आसपास रहते हैं, वे भी इस मंदिर को अपनी धरोहर का सबसे मूल्यवान हिस्सा मानते हैं और उनका जुड़ाव पीढ़ियों पुराना है। वे बताते हैं कि यह मंदिर प्राचीन काल से ही पांडवों के समय से जुड़ा हुआ है और यहाँ के खंडहरनुमा टीले एवं विशाल प्राचीन तालाब उन गौरवशाली गाथाओं के मूक गवाह रहे हैं जब यहाँ धर्म की स्थापना हुई थी। हालांकि समय की मार और आधुनिकता के दबाव के कारण इन ऐतिहासिक तालों का जल स्तर अब काफी कम हो गया है और वे सूखने के कगार पर पहुँच रहे हैं, लेकिन यात्रियों की श्रद्धा का जल आज भी उतना ही गहरा है। पहाड़ी मूल के वे लोग जो अब मैदानों में आकर बस गए हैं, वे भी हर नवरात्रि पर यहाँ पहुँचते हैं और अपनी परंपराओं को सजीव रखते हैं। उनके लिए यह स्थान केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि उनके अतीत और वर्तमान के बीच का एक ऐसा सेतु है जो उन्हें उनकी जड़ों से जोड़े रखता है और जीवन की हर मुश्किल परिस्थिति में लड़ने की असीम मानसिक शक्ति प्रदान करता है।
मंदिर के मुख्य सेवादार और महंत हिमांशु गिरी गोस्वामी जी इस पावन धाम की महिमा का बखान करते हुए बड़े भावुक हो जाते हैं और बताते हैं कि उनके पूर्वज सदियों से इस दिव्य शक्तिपीठ की सेवा में लीन रहे हैं। उनके अनुसार, सनातन धर्म के पंचांग के अनुसार जब चैत्र माह का प्रारंभ होता है, तब पूरे उत्तर भारत में सबसे पहले प्रसाद ग्रहण करने और पूजा स्वीकार करने का श्रेय इसी माँ खोखरा देवी मंदिर को जाता है। सात दिनों के इस विशेष पर्व के दौरान माँ स्वयं यहाँ साक्षात रूप में प्रवास करती हैं और अपने भक्तों की पुकार को प्रत्यक्ष रूप से सुनती हैं, जिसके कारण यहाँ का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। महंत जी बताते हैं कि इस मंदिर में ‘गांठ बांधने’ की एक अत्यंत प्राचीन और सिद्ध परंपरा है, जहाँ भक्त अपनी अधूरी इच्छाओं की पूर्ति के लिए संकल्प रूपी गांठ बांधते हैं। जब माँ की कृपा से उनकी मुराद पूरी हो जाती है, चाहे वह विवाह से जुड़ी हो या संतान प्राप्ति से, तब वे सपरिवार यहाँ लौटकर उस गांठ को खोलते हैं और विधि-विधान से विशेष पूजा-अर्चना कर अपना आभार प्रकट करते हैं।
इस आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ-साथ यहाँ का व्यापारिक पक्ष भी अत्यंत प्राचीन और रोचक है, जहाँ प्रसाद की दुकानें लगाने वाले परिवार पिछले कई दशकों से अपनी आजीविका इसी श्रद्धा के सहारे चला रहे हैं। एक दुकानदार जो पिछले 20 वर्षों से अधिक समय से यहाँ अपना स्टाल लगा रहे हैं, बताते हैं कि उनके परिवार की तीन पीढ़ियां इसी मंदिर परिसर में भक्तों की सेवा करती आ रही हैं। उनके लिए यह केवल एक व्यापार नहीं है, बल्कि माँ की सेवा का एक माध्यम है जिससे उनके घर का चूल्हा जलता है। नवरात्रि के सातवें दिन से लेकर ग्यारस और बारस तक यहाँ इतनी अधिक भीड़ होती है कि पैर रखने तक की जगह नहीं बचती और प्रशासन को व्यवस्था बनाए रखने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। यात्रियों की सुविधा के लिए दुकानदार भी रात-दिन एक कर देते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि माँ के द्वार पर आया कोई भी भक्त प्यासा या खाली हाथ नहीं जाना चाहिए, जो यहाँ की अतिथि सत्कार की परंपरा का हिस्सा है।
बदलते समय के साथ यहाँ की व्यापारिक चुनौतियों में भी बड़ा बदलाव आया है और महंगाई का असर अब यहाँ के ठेका प्रणाली पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है, जो चिंता का विषय भी है। व्यापारियों का कहना है कि आज से 20 साल पहले जो जमीन का ठेका मात्र 45,000 रुपये जैसी मामूली राशि में हो जाता था, आज उस जमीन की नीलामी 20 लाख रुपये से भी अधिक की चौंकाने वाली कीमत तक पहुँच चुकी है। यह वृद्धि केवल जमीन के मूल्य में नहीं, बल्कि इस स्थान की बढ़ती धार्मिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठा का परिणाम है, जिसे ठेकेदार अब एक बड़े अवसर के रूप में देखते हैं। ठेके की कीमतों में हुए इस बेतहाशा इजाफे ने प्रसाद और अन्य पूजन सामग्री की दरों को भी काफी प्रभावित किया है, जहाँ कभी 2.50 रुपये में मिलने वाला प्रसाद का पैकेट अब 100 रुपये तक बिक रहा है। इसके बावजूद भक्त बिना किसी शिकायत के अपनी सामर्थ्य के अनुसार खरीदारी करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि भक्ति में खर्च किया गया धन कभी व्यर्थ नहीं जाता और माँ उसे कई गुना बढ़ाकर वापस लौटा देती हैं।
यहाँ के मेलों और उत्सवों की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यहाँ का प्रबंधन अब धीरे-धीरे निजी हाथों से निकलकर प्रशासनिक निगरानी में भी आ रहा है, ताकि व्यवस्थाएं और भी पारदर्शी और सुलभ हो सकें। जमीन का ठेका भले ही निजी भूस्वामियों द्वारा किया जाता हो, लेकिन सुरक्षा और मूलभूत सुविधाओं की जिम्मेदारी प्रशासन बखूबी निभा रहा है, जिससे यात्रियों का भरोसा और बढ़ा है। दुकानदारों का मानना है कि भले ही लागत बढ़ गई है, लेकिन माता रानी किसी को भूखा नहीं सुलातीं और हर छोटे-बड़े व्यापारी की झोली अंततः भर ही जाती है। बिजनौर से लेकर काशीपुर की कचहरी तक के लोग यहाँ के उत्सव का साल भर इंतजार करते हैं और जब नवरात्रि आती है, तो सारा माहौल एक दिव्य ऊर्जा से सराबोर हो जाता है। यह मंदिर आज भी एक ऐसा पवित्र संगम है जहाँ ऊंच-नीच, जात-पात और अमीरी-गरीबी की दीवारें ढह जाती हैं और हर कोई केवल एक भक्त के रूप में माँ की शरण में आकर आत्मिक शांति और जीवन का वास्तविक उद्देश्य प्राप्त करता है।
अत: काशीपुर की पावन धरा पर स्थित माँ खोखरा देवी का यह भव्य दरबार आज भी अपनी प्राचीनता और रहस्यों को संजोए हुए हर उस व्यक्ति के लिए खुला है जो जीवन की परेशानियों से मुक्ति और माँ का स्नेह पाना चाहता है। चाहे वह नवविवाहित जोड़े का विश्वास हो, भक्तों की गांठ बांधने की परंपरा हो, या फिर उन दुकानदारों का संघर्ष, यह सब मिलकर एक ऐसे जीवंत इतिहास का निर्माण करते हैं जो आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करता रहेगा। यदि आप भी अपने जीवन में किसी चमत्कार की प्रतीक्षा कर रहे हैं या माँ के बाल रूप के दर्शन कर पुण्य कमाना चाहते हैं, तो इस नवरात्रि खोखरा देवी मंदिर की दहलीज पर कदम रखना आपके लिए एक अविस्मरणीय और मंगलकारी अनुभव साबित होगा। यहाँ की हर ईंट और हर तालाब की लहरें आपसे कुछ कहना चाहती हैं, बस जरूरत है तो पूरी श्रद्धा के साथ उन्हें सुनने की, क्योंकि माँ का आशीर्वाद हमेशा अपने भक्तों के साथ एक ढाल बनकर खड़ा रहता है।





