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एडवोकेट धर्मेंद्र तुली ने बताया POCSO Act क्यों बनाया गया और इसका महत्व बताया

काशीपुर। कानून के माध्यम से बालकों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने की दिशा में बनाए गए पोक्सो एक्ट को समाज की एक बड़ी जरूरत बताते हुए काशीपुर बार के पूर्व अध्यक्ष एडवोकेट धर्मेंद्र तुली ने कहा कि यह अधिनियम केवल दंडात्मक कानून नहीं, बल्कि बच्चों के सम्मान, सुरक्षा और गरिमामय भविष्य का मजबूत आधार है। उन्होंने कहा कि बालकों के साथ बढ़ते लैंगिक अपराधों ने पूरे समाज को चिंतित किया है और इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए पोक्सो एक्ट जैसे कड़े कानून की आवश्यकता महसूस हुई। इस कानून में ऐसे सख्त प्रावधान किए गए हैं, जिससे बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों पर प्रभावी रोक लगाई जा सके। एडवोकेट धर्मेंद्र तुली के अनुसार, किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों को कितना सुरक्षित रख पाता है, और पोक्सो अधिनियम इसी सोच को कानूनी रूप प्रदान करता है।

संविधान में निहित प्रावधानों की चर्चा करते हुए काशीपुर बार पूर्व अध्यक्ष एडवोकेट धर्मेंद्र तुली ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 राज्य को यह अधिकार देता है कि वह बालकों के लिए विशेष उपबंध करे। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों को समान अवसर मिलें और वे किसी भी प्रकार के भेदभाव या शोषण का शिकार न हों। उन्होंने आगे कहा कि अनुच्छेद 39 राज्य को यह दिशा निर्देश देता है कि नीति निर्धारण इस तरह किया जाए, जिससे बच्चों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो। बालकों और अवयस्क व्यक्तियों को हर प्रकार के शोषण से बचाना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। एडवोकेट धर्मेंद्र तुली के अनुसार, पोक्सो एक्ट इन संवैधानिक मूल्यों को जमीन पर उतारने का एक सशक्त माध्यम है, जो बच्चों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास का अवसर प्रदान करता है।

अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का उल्लेख करते हुए एडवोकेट धर्मेंद्र तुली ने बताया कि भारत सरकार ने 11 दिसंबर 1992 को बालक के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय का अनुसमर्थन किया था। इस अभिसमय के तहत राज्य पक्षकारों पर यह जिम्मेदारी डाली गई है कि वे बच्चों को किसी भी अवैध लैंगिक गतिविधि में लिप्त होने से बचाएं। इसमें स्पष्ट रूप से यह अपेक्षा की गई है कि बालकों को वेश्यावृत्ति, अन्य गैरकानूनी यौन व्यवहार और अश्लील साहित्य से दूर रखने के लिए प्रभावी राष्ट्रीय, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय कदम उठाए जाएं। एडवोकेट धर्मेंद्र तुली ने कहा कि पोक्सो एक्ट इन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का भी प्रतिबिंब है, जो यह सुनिश्चित करता है कि भारत वैश्विक मंच पर बच्चों के अधिकारों की रक्षा के प्रति गंभीर है और उन्हें केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा गया है।

राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए एडवोकेट धर्मेंद्र तुली ने चिंता जताई कि बच्चों के विरुद्ध लैंगिक अपराधों के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। उन्होंने कहा कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा कराए गए ‘बालक के दुरुपयोग पर अध्ययन भारत 2007’ ने भी इस भयावह सच्चाई की पुष्टि की है। इन रिपोर्टों से यह स्पष्ट होता है कि बच्चों के खिलाफ यौन शोषण एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुका है। एडवोकेट धर्मेंद्र तुली के अनुसार, पहले से मौजूद कानून ऐसे अपराधों से निपटने में अपर्याप्त साबित हो रहे थे, क्योंकि उनमें न तो सभी अपराधों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया था और न ही सख्त दंड का प्रावधान था। इसी कमी को दूर करने के लिए पोक्सो अधिनियम को लाया गया, ताकि अपराधियों में कानून का भय पैदा किया जा सके।

पुरानी कानूनी व्यवस्थाओं की सीमाओं पर प्रकाश डालते हुए काशीपुर बार के पूर्व अध्यक्ष एडवोकेट धर्मेंद्र तुली ने कहा कि पहले बच्चों के प्रति होने वाले यौन अपराधों को सामान्य कानूनों के तहत देखा जाता था, जिससे पीड़ितों को न्याय मिलने में कठिनाई होती थी। कई मामलों में अपराधों की प्रकृति के अनुसार अलग से कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था, जिससे दोषियों को अपेक्षाकृत हल्की सजा मिल जाती थी। उन्होंने कहा कि पोक्सो एक्ट ने इन कमियों को दूर करते हुए बालकों के हितों को सर्वाेपरि रखा है। यह कानून न केवल पीड़ित बच्चे की सुरक्षा करता है, बल्कि उसे एक साक्षी के रूप में भी विशेष संरक्षण प्रदान करता है। एडवोकेट धर्मेंद्र तुली के अनुसार, बच्चों के खिलाफ अपराधों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना और उनके लिए कठोर सजा तय करना समय की सबसे बड़ी मांग थी, जिसे पोक्सो अधिनियम ने पूरा किया है।

न्यायिक प्रक्रिया को बाल-मित्रवत बनाने पर जोर देते हुए एडवोकेट धर्मेंद्र तुली ने कहा कि पोक्सो एक्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जांच, साक्ष्य संग्रह, रिपोर्टिंग और मुकदमे की पूरी प्रक्रिया को बच्चों के अनुकूल बनाया गया है। उन्होंने बताया कि कानून का उद्देश्य केवल अपराधी को सजा दिलाना नहीं, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया में बच्चे को मानसिक और भावनात्मक रूप से सुरक्षित रखना भी है। पीड़ित बच्चे को बार-बार बयान देने की पीड़ा से बचाने, उसकी पहचान गोपनीय रखने और उसे डर-मुक्त माहौल देने जैसे प्रावधान इस अधिनियम को विशेष बनाते हैं। एडवोकेट धर्मेंद्र तुली के अनुसार, यह कानून न्यायिक प्रणाली में एक मानवीय दृष्टिकोण जोड़ता है, जिससे बच्चों का भरोसा कानून व्यवस्था पर बना रहे।

विशेष न्यायालयों की स्थापना को लेकर एडवोकेट धर्मेंद्र तुली ने कहा कि पोक्सो अधिनियम के तहत त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशेष अदालतों का प्रावधान किया गया है। इसका मकसद यह है कि बच्चों से जुड़े मामलों में अनावश्यक देरी न हो और पीड़ित को जल्द से जल्द न्याय मिल सके। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक चलने वाले मुकदमे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं, इसलिए त्वरित सुनवाई बेहद जरूरी है। एडवोकेट धर्मेंद्र तुली के अनुसार, विशेष न्यायालयों के माध्यम से न केवल मामलों का शीघ्र निस्तारण होगा, बल्कि अपराधियों को भी यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि बच्चों के खिलाफ अपराध करने वालों के लिए कानून बेहद सख्त है।

अंत में काशीपुर बार के पूर्व अध्यक्ष एडवोकेट धर्मेंद्र तुली ने कहा कि पोक्सो एक्ट एक स्व-अंतर्विष्ट और व्यापक कानून है, जो बच्चों को लैंगिक शोषण से बचाने, सुरक्षा प्रदान करने और उनके अधिकारों के प्रवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि यह कानून केवल सरकार या न्यायपालिका की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग को इसके प्रति जागरूक होना होगा। माता-पिता, शिक्षक, वकील और आम नागरिक सभी को मिलकर बच्चों के हितों की रक्षा करनी होगी। एडवोकेट धर्मेंद्र तुली ने विश्वास जताया कि पोक्सो अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन से बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में कमी आएगी और उन्हें एक सुरक्षित, सम्मानजनक और उज्ज्वल भविष्य मिल सकेगा।

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