काशीपुर। उर्वशी दत्त बाली ने इस विषय पर बताते हुए कहा कि कितनी कड़वी सच्चाई है कि जो मां-बाप और दादा-दादी हमारी देखभाल के अभाव में जीवन के आखिरी क्षणों में अकेले रह गए, आज उनके लिए केवल दिखावटी पकवान तैयार किए जा रहे हैं। स्वादिष्ट भोजन तैयार कर पंडितों और कौवों, गायों, कुत्तों को दिया जाता है, लेकिन वे बुजुर्ग जिन्हें जिंदा रहते पर्याप्त खाना नहीं मिला, उनका कोई भला नहीं होता। उन्होंने कहा कि समाज में यह झूठा पाखंड अत्यधिक बढ़ गया है और इसके चलते लोगों की संवेदनशीलता कमजोर होती जा रही है। उनका मानना है कि असली श्रद्धा तब होती है जब हम अपने बुजुर्गों की भूख, उनकी जरूरतों और उनके अकेलेपन को समझकर उनके जीवन में खुशियाँ लाएं।
श्रीमती उर्वशी ने आगे कहा कि अक्सर बच्चे मंदिरों में फूल, दूध और फल चढ़ाने में तो विश्वास रखते हैं, लेकिन अपने ही दादा-दादी और बुजुर्गों के घर दो कदम की दूरी पर जा कर उनका पेट भराने की पहल नहीं करते। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान को हमारी दिखावटी पूजा की आवश्यकता नहीं है, बल्कि जब हम अपने बुजुर्गों या जरूरतमंद लोगों की मदद करते हैं, तभी वह प्रसन्न होते हैं। उन्होंने कहा कि मरने के बाद आयोजित होने वाले श्राद्ध में लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, पंडितों को भोजन कराया जाता है और कौवों का पेट भरा जाता है, लेकिन जिंदा रहते बुजुर्गों के लिए किया गया प्रयास नगण्य रहता है। यही समाज की सबसे बड़ी विडंबना है।
समाजसेवी ने यह भी कहा कि दिखावे की श्राद्ध व्यवस्था केवल समाज के बहुमूल्य समय और धन का अपव्यय है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर सच्ची श्रद्धा और पुण्य कमाना है, तो यह मरने के बाद पत्तल सजाने में नहीं, बल्कि जिंदा रहते बुजुर्गों के पेट भरने, उनकी देखभाल और सम्मान करने में है। श्रीमती उर्वशी ने समाज से अपील की कि बच्चों को चाहिए कि वे माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा को अपने जीवन का प्राथमिक कर्तव्य मानें। उनके अनुसार, यही असली श्रद्धा है, यही असली पुण्य है और यही जीवन का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए।
उर्वशी दत्त बाली ने समाज में एक बार फिर चेतावनी दी कि जिन लोगों ने अपने मां-बाप की देखभाल नहीं की, उनके दिखावे के श्राद्ध से पूर्वजों की आत्मा को सुकून नहीं मिलेगा। उन्होंने कहा कि जीवन में अपनापन और स्नेह का महत्व ही सबसे बड़ा है, और यह केवल मृत्यु के बाद दिखावे के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने समाज से यह सवाल भी किया कि क्या सिर्फ एक दिन के लिए पकवान बनाकर और दान कर के बुजुर्गों की तृप्ति हो जाएगी? उन्होंने स्पष्ट किया कि वास्तविक श्रद्धा वही है जो जीवन में अपनापन, स्नेह और सेवा के रूप में दिखाई देती है।
समाजसेवी ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि समाज को अपनी प्राथमिकताएं बदलनी होंगी। जीवन में दिखावा और केवल परंपरा निभाने के लिए किए गए श्राद्ध से कोई वास्तविक लाभ नहीं होता। उन्होंने कहा कि यह समय है कि समाज अपनी ऊर्जा और संसाधनों को उन बुजुर्गों की सेवा में लगाए जो अभी भी जिंदा हैं, ताकि उनका जीवन सम्मान और खुशियों से भरा रहे। उन्होंने जोर देकर कहा कि वास्तविक पुण्य वही है जो जीवन में निभाई जाए, न कि मरने के बाद दिखावे के लिए खर्च की जाए। यही संदेश श्रीमती उर्वशी दत्त बाली समाज को दे रही हैं, और उनका कहना है कि यही असली श्राद्ध और सच्चा पुण्य है।



