काशीपुर। अनाज मंडी में गुरुवार दोपहर अचानक गहमागहमी का माहौल बन गया, जब सैकड़ों किसानों ने मुख्य द्वार पर ताला जड़कर हल्ला बोल शुरू कर दिया। चारों ओर गूंजते “भारतीय किसान यूनियन ज़िंदाबाद” के नारों ने पूरा परिसर आंदोलित कर दिया। किसान नेता जितेंद्र सिंह जीतू के नेतृत्व में जुटे किसानों ने मंडी प्रशासन पर आरोप लगाया कि सरकार द्वारा तय की गई दर पर उनकी फसल नहीं खरीदी जा रही और मिल मालिकों के दबाव में किसानों की मेहनत का धन छीना जा रहा है। मंडी का गेट बंद होते ही आस-पास के क्षेत्र में अफरा-तफरी मच गई, कई व्यापारी अपनी गाड़ियां बाहर छोड़कर लौट गए। किसानों का कहना है कि वे तब तक नहीं हटेंगे जब तक उन्हें लिखित में यह आश्वासन नहीं मिल जाता कि उनकी दोनों वैरायटी—पीआर 126 और पीआर 131—सरकारी समर्थन मूल्य पर खरीदी जाएंगी।
घटनास्थल पर मौजूद किसान नेता जितेंद्र सिंह जीतू ने कैमरे पर अपनी नाराजगी जताते हुए कहा कि सरकार और मंडी प्रशासन किसानों को धोखे में रख रहे हैं। उनके अनुसार मंडी में आने वाले लगभग 95 प्रतिशत किसान इन्हीं दो किस्मों की फसल लेकर पहुंचे हैं, लेकिन अचानक से मिल मालिकों ने इन वैरायटी को अस्वीकार कर दिया है। उन्होंने बताया कि “हमसे न कोई लिखित आदेश साझा किया गया और न कोई विज्ञप्ति निकाली गई, बस आज अचानक कहा गया कि ये किस्में नहीं ली जाएंगी। जब किसान ने मेहनत कर खेतों में सोना उगाया है, तो अब उसी को ठुकराना अन्याय है।” जीतू ने आरोप लगाया कि मंडी के अधिकारी मिल मालिकों की पैरवी में लगे हैं और किसानों की आवाज़ को अनसुना किया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब तक लिखित निर्णय नहीं होगा, तब तक यह मंडी बंद रहेगी।
धरना स्थल पर मौजूद किसानों ने एक सुर में कहा कि यह आंदोलन उनके सम्मान और अधिकार का प्रश्न है। उनका कहना है कि धान का समर्थन मूल्य (एसपी) तय होने के बावजूद मंडी में खरीद को रोक दिया गया है और मिल मालिक 700 से 800 रुपये प्रति क्विंटल तक कम दर पर फसल लेने की साज़िश कर रहे हैं। “जब हमारी फसल तैयार है, तो हम उसे औने-पौने दाम पर क्यों बेचें?”—एक बुज़ुर्ग किसान ने कहा। उन्होंने बताया कि इस बार बारिश और तेज़ हवाओं से कई किसानों की फसल पहले ही प्रभावित हो चुकी है, ऐसे में यदि मंडी में भी ऐसा अन्याय होगा तो किसान कैसे जिंदा रहेगा। कुछ किसानों ने यह तक कहा कि अगर उनकी बात नहीं सुनी गई तो कई लोग आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर होंगे।

धरने के दौरान किसान बार-बार यही दोहराते रहे कि प्रशासन अगर चाहता तो आधे घंटे में खरीद प्रक्रिया शुरू हो सकती है, लेकिन अफसर जानबूझकर टालमटोल कर रहे हैं। किसानों का आरोप है कि “मिल मालिकों ने पहले ही अधिकारियों से सांठगांठ कर ली है और ऊपर तक मोटे बंडल भेजे गए हैं।” किसानों ने कहा कि इस गठजोड़ के कारण उनकी मेहनत की फसल का मूल्य घटाकर उन्हें आर्थिक रूप से तबाह किया जा रहा है। मंडी के गेट पर बैठे किसानों के चेहरों पर गुस्सा साफ झलक रहा था, कई किसान अपने ट्रैक्टर और ट्रॉलियों में ही बैठे रहे और रातभर वहीं ठहरने की तैयारी कर ली। “हमारी रोज़ी-रोटी का सवाल है, अगर सरकार ने अब भी नहीं सुना तो यह आंदोलन और तेज़ होगा,” जीतू ने चेताया।
मंडी परिसर में गहमागहमी के बीच कई अन्य किसान नेताओं ने भी मंच से अपनी बात रखी। एक किसान ने कहा, “पहले 500 क्विंटल प्रतिदिन धान तौलने की सीमा थी, अब उसे घटाकर 400 कर दिया गया है। जब पहले ही मुश्किल से फसल तौल पाते थे तो अब यह सीमा किसानों की कमर तोड़ देगी।” किसानों ने यह भी कहा कि जब तक अधिकारियों की ओर से स्पष्ट लिखित आदेश नहीं दिया जाएगा कि पीआर 126 और पीआर 131 दोनों वैरायटी खरीदी जाएंगी और किसी प्रकार की कटौती नहीं होगी, तब तक गेट नहीं खुलेगा। किसानों ने यह भी जोड़ा कि “अगर मिल मालिकों को 15 रुपये प्रति किलो का धान चाहिए, तो वे हमें 23 रुपये का रेट देने से क्यों कतरा रहे हैं? यह गठजोड़ किसानों की मेहनत पर कुठाराघात है।”
धरना स्थल पर मीडिया से बातचीत करते हुए कई किसानों ने कहा कि वे किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटेंगे। “हम बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन सिर्फ़ आश्वासन से काम नहीं चलेगा। हमें लिखित गारंटी चाहिए,” किसानों ने कहा। इस बीच मंडी के बाहर पुलिस बल तैनात कर दिया गया ताकि स्थिति नियंत्रण में रहे। शाम तक अधिकारी और किसान नेताओं के बीच बातचीत की कोशिशें जारी रहीं, पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। मंडी का मुख्य द्वार अब भी बंद है, भीतर बैठे किसान नारे लगा रहे हैं और बाहर इंतज़ार कर रहे व्यापारी हताश नज़र आ रहे हैं।
अब पूरा शहर इस सवाल पर निगाहें लगाए हुए है कि क्या प्रशासन किसानों के हित में निर्णय लेकर स्थिति सामान्य कर पाएगा या यह तालाबंदी और उग्र रूप लेगी। फिलहाल किसानों का कहना है कि “जब तक हमारी फसल उचित मूल्य पर नहीं बिकती और लिखित आदेश नहीं आता, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा।” इस आंदोलन ने काशीपुर ही नहीं, पूरे उधम सिंह नगर के किसानों में नई चेतना जगा दी है, जो अपनी आवाज़ को अब प्रशासनिक दीवारों से टकराने से नहीं डरते।



