spot_img
दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, वह खुद बनिए. - महात्मा गांधी
Homeउत्तराखंडउत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला खनन रॉयल्टी पर जीएसटी की वसूली पर...

उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला खनन रॉयल्टी पर जीएसटी की वसूली पर लगाई अंतरिम रोक

रामनगर। उत्तराखण्ड में खनन क्षेत्र से जुड़े एक अहम और दूरगामी प्रभाव वाले विवाद पर माननीय उच्च न्यायालय, उत्तराखण्ड (नैनीताल) ने ऐसा अंतरिम आदेश पारित किया है, जिसने न केवल याचिकाकर्ता को तत्काल बड़ी राहत प्रदान की है, बल्कि राज्य के खनन, स्टोन क्रशर और संबंधित उद्योगों में एक नई कानूनी बहस को भी जन्म दे दिया है। खनन रॉयल्टी पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की वसूली को चुनौती देते हुए दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय की द्वैधपीठ ने प्रथम दृष्टया इस मुद्दे को गंभीर मानते हुए वसूली की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि खनन रॉयल्टी पर जीएसटी लगाए जाने को लेकर लंबे समय से उद्योग जगत में असंतोष और भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। न्यायालय के इस आदेश के बाद न केवल याचिकाकर्ता बल्कि समान परिस्थिति वाले अन्य व्यवसायियों की भी निगाहें इस प्रकरण के अंतिम निर्णय पर टिक गई हैं, क्योंकि इसका असर राज्य की राजस्व नीति और केंद्र-राज्य संबंधों पर भी पड़ सकता है।

इस प्रकरण की सुनवाई माननीय उच्च न्यायालय, उत्तराखण्ड की द्वैधपीठ द्वारा की गई, जिसमें माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री मनोज कुमार गुप्ता एवं माननीय न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय शामिल रहे। पीठ के समक्ष प्रस्तुत याचिका एक स्टोन क्रशर द्वारा दायर की गई थी, जिसमें Union of India एवं अन्य प्रतिवादी बनाए गए थे। याचिका में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि खनन रॉयल्टी पर जीएसटी लगाने का निर्णय न केवल विधिक प्रावधानों के विपरीत है, बल्कि यह पहले से ही आर्थिक दबाव झेल रहे खनन एवं स्टोन क्रशर उद्योग पर अतिरिक्त बोझ डालने वाला है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने याचिका में उठाए गए कानूनी प्रश्नों को गंभीरता से सुना और यह माना कि मामला केवल एक इकाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक प्रभाव हो सकता है। इसी कारण न्यायालय ने इस विवाद को विस्तार से सुनने का संकेत देते हुए अंतरिम संरक्षण प्रदान करना उचित समझा।

याचिकाकर्ता की ओर से न्यायालय में अधिवक्ता फैजुल हक़ एवं संजीव कुमार अग्रवाल ने सशक्त और विस्तारपूर्ण तर्क प्रस्तुत किए। अधिवक्ताओं ने न्यायालय को बताया कि खनन रॉयल्टी मूलतः एक वैधानिक शुल्क है, जिसे राज्य सरकार खनिजों के दोहन के अधिकार के बदले वसूलती है, और इस पर जीएसटी लगाना कराधान की दोहरी व्यवस्था को जन्म देता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि इस प्रकार की वसूली संविधान के कराधान संबंधी प्रावधानों और जीएसटी कानून की मूल भावना के विपरीत है। अधिवक्ताओं ने यह रेखांकित किया कि जिन आदेशों के आधार पर याचिकाकर्ता से जीएसटी की मांग की जा रही है, वे विधिक कसौटी पर खरे नहीं उतरते और उनका पालन किए जाने से याचिकाकर्ता को गंभीर आर्थिक क्षति हो रही है। न्यायालय के समक्ष यह भी कहा गया कि यदि तत्काल राहत नहीं दी गई, तो याचिकाकर्ता का व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।

न्यायालय के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि खनन और स्टोन क्रशर उद्योग पहले से ही कई प्रकार की प्रशासनिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। पर्यावरणीय स्वीकृतियां, रॉयल्टी की दरें, परिवहन शुल्क और अन्य करों के कारण लागत पहले ही काफी बढ़ चुकी है। ऐसे में खनन रॉयल्टी पर जीएसटी की अतिरिक्त वसूली उद्योग के लिए असहनीय बोझ बन गई है। अधिवक्ताओं ने न्यायालय को यह भी बताया कि इस वसूली के चलते न केवल याचिकाकर्ता बल्कि उससे जुड़े श्रमिकों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। न्यायालय ने इन दलीलों को ध्यानपूर्वक सुना और यह संकेत दिया कि प्रथम दृष्टया मामला विचारणीय प्रतीत होता है। इसी पृष्ठभूमि में न्यायालय ने यह आवश्यक समझा कि जब तक सभी पक्षों की दलीलें विस्तार से नहीं सुनी जातीं, तब तक यथास्थिति बनाए रखना उचित होगा।

प्रतिवादी पक्ष को भी न्यायालय द्वारा अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया गया। सुनवाई के उपरांत माननीय न्यायालय ने प्रतिवादीगण को स्पष्ट निर्देश दिया कि वे चार सप्ताह की अवधि के भीतर अपना प्रति-शपथपत्र दाखिल करें। इस निर्देश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केंद्र सरकार एवं अन्य संबंधित विभाग इस विषय पर अपना विधिक और तथ्यात्मक पक्ष स्पष्ट रूप से न्यायालय के समक्ष रखें। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि इस मामले में उठाए गए प्रश्न केवल तथ्यों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें कानून की व्याख्या और कराधान के सिद्धांतों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं। ऐसे में विस्तृत बहस और सभी पक्षों के तर्कों का समुचित परीक्षण आवश्यक है। चार सप्ताह का समय देकर न्यायालय ने यह संदेश दिया है कि वह इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संतुलित और न्यायोचित निर्णय की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।

सुनवाई के दौरान सबसे महत्वपूर्ण पहलू वह अंतरिम राहत रही, जिसे माननीय उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के पक्ष में प्रदान किया। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह आदेश दिया कि विवादित आदेश के अनुसरण में की जा रही जीएसटी वसूली की कार्रवाई पर अगली सुनवाई तक पूर्ण रूप से स्थगन रहेगा। इस ‘स्टे’ आदेश के चलते याचिकाकर्ता को तत्काल राहत मिली है और फिलहाल उस पर किसी प्रकार की जबरन वसूली या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकेगी। यह आदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे याचिकाकर्ता को अपने व्यवसाय को बिना अतिरिक्त दबाव के संचालित करने का अवसर मिला है। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यह स्थगन अंतरिम प्रकृति का है और मामले के अंतिम निर्णय तक प्रभावी रहेगा, जब तक कि कोई अन्य आदेश पारित न किया जाए।

इस अंतरिम आदेश के बाद खनन और स्टोन क्रशर उद्योग से जुड़े लोगों में एक नई उम्मीद जगी है। लंबे समय से यह मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ था कि क्या खनन रॉयल्टी पर जीएसटी लगाया जाना उचित है या नहीं। कई उद्योग संगठनों का मानना रहा है कि रॉयल्टी कोई सेवा या वस्तु नहीं है, बल्कि यह खनिज संसाधनों के उपयोग का अधिकार शुल्क है, जिस पर जीएसटी लगाना तर्कसंगत नहीं है। माननीय उच्च न्यायालय का यह आदेश भले ही अंतिम फैसला न हो, लेकिन इसने यह संकेत जरूर दिया है कि न्यायालय इस प्रश्न को गंभीरता से परखने के मूड में है। इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि यदि किसी वसूली से किसी पक्ष को अपूरणीय क्षति होने की आशंका हो, तो न्यायालय हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटता।

इस पूरे प्रकरण में अधिवक्ता फैजुल हक़ की भूमिका भी उल्लेखनीय मानी जा रही है। जारीकर्ता के रूप में उनके कार्यालय की ओर से यह जानकारी सामने आई कि यह अंतरिम आदेश याचिकाकर्ता के लिए एक बड़ी कानूनी सफलता है। अधिवक्ता पक्ष का कहना है कि यह राहत न केवल मौजूदा वसूली को रोकने में सहायक होगी, बल्कि इससे मामले के अंतिम निर्णय तक याचिकाकर्ता को अपनी वित्तीय स्थिति संभालने का अवसर भी मिलेगा। उन्होंने यह भी विश्वास जताया कि जब मामला गुण-दोष के आधार पर सुना जाएगा, तो न्यायालय खनन रॉयल्टी पर जीएसटी लगाए जाने की वैधता पर स्पष्ट और न्यायसंगत निर्णय देगा। इस बयान के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि याचिकाकर्ता इस कानूनी लड़ाई को पूरी मजबूती के साथ आगे बढ़ाने के लिए तैयार है।

समग्र रूप से देखा जाए तो माननीय उच्च न्यायालय, उत्तराखण्ड (नैनीताल) का यह अंतरिम आदेश केवल एक स्टोन क्रशर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव व्यापक हो सकता है। यह आदेश यह दर्शाता है कि कराधान से जुड़े मामलों में न्यायालय किस प्रकार संतुलन बनाते हुए न केवल कानून की व्याख्या करता है, बल्कि प्रभावित पक्षों के आर्थिक हितों की भी रक्षा करता है। आने वाले समय में जब प्रतिवादीगण अपना प्रति-शपथपत्र दाखिल करेंगे और विस्तृत बहस होगी, तब यह मामला और भी रोचक रूप ले सकता है। फिलहाल, इस आदेश ने खनन उद्योग में एक नई बहस को जन्म दिया है और सभी की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि इस महत्वपूर्ण कानूनी विवाद का अंतिम परिणाम क्या होगा।

संबंधित ख़बरें
शहर की भीड़भाड़ और बढ़ती बीमारियों के दौर में जब चिकित्सा जगत को नए और भरोसेमंद विकल्पों की तलाश थी, उसी समय काशीपुर से उभरती एक संस्था ने अपनी गुणवत्ता, विशेषज्ञता और इंसानी सेहत के प्रति समर्पण की मिसाल कायम कर दी। एन.एच.-74, मुरादाबाद रोड पर स्थित “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” आज उस भरोसे का नाम बन चुका है, जिसने अपनी प्रतिबद्धता, सेवा और उन्नत चिकित्सा व्यवस्था के साथ लोगों के दिलों में एक अलग स्थान स्थापित किया है। इस संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ इलाज का आधार केवल दवा नहीं, बल्कि रोगी की पूरी जीवनशैली, उसकी भावनाओं और उसके व्यवहार तक को समझकर उपचार उपलब्ध कराया जाता है। संस्था के केंद्र में वर्षों से सेवा कर रहे डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा का अनुभव, उनकी अंतरराष्ट्रीय योग्यता और कार्य के प्रति उनका गहरा समर्पण उन्हें चिकित्सा जगत में एक विशिष्ट पहचान देता है। अपनी अलग सोच और उच्च स्तरीय चिकित्सा व्यवस्था के कारण यह संस्थान न केवल स्थानीय लोगों का विश्वास जीत रहा है, बल्कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले मरीज भी यहाँ भरोसे के साथ उपचार लेने पहुँचते हैं। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” ने NABH Accreditation और ISO 9001:2008 व 9001:2015 प्रमाणपत्र हासिल कर यह साबित कर दिया है कि यहाँ इलाज पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया, गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के साथ किया जाता है। संस्थान की दीवारों पर सजे सैकड़ों प्रमाणपत्र, सम्मान और पुरस्कार इस बात के गवाह हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा ने उपचार को केवल पेशा नहीं, बल्कि मानव सेवा की जिम्मेदारी माना है। यही वजह है कि उन्हें भारतीय चिकित्सा रत्न जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है। रोगियों के प्रति संवेदनशीलता और आधुनिक तकनीकी समझ को मिलाकर जो उपचार मॉडल यहाँ तैयार हुआ है, वह लोगों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है। संस्थान के भीतर मौजूद विस्तृत कंसल्टेशन रूम, मेडिकल फाइलों की सुव्यवस्थित व्यवस्था और अत्याधुनिक निरीक्षण प्रणाली इस बात को स्पष्ट दिखाती है कि यहाँ मरीज को पूर्ण सम्मान और ध्यान के साथ सुना जाता है। पोस्टर में दर्शाए गए दृश्य—जहाँ डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मानित होते दिखाई देते हैं—उनकी निष्ठा और चिकित्सा जगत में उनकी मजबूत प्रतिष्ठा को और मजबूत बनाते हैं। उनकी विदेशों में प्राप्त डिग्रियाँ—बीएचएमएस, एमडी (होम.), डी.आई.एच. होम (लंदन), एम.ए.एच.पी (यूके), डी.एच.एच.एल (यूके), पीएच.डी—स्पष्ट करती हैं कि वे केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिकित्सा अनुसंधान और उपचार के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। काशीपुर जैसे शहर में आधुनिक विचारों और उच्च गुणवत्ता वाले उपचार का ऐसा संयोजन मिलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। संस्था की ऊँची इमारत, सुगम पहुँच और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित परिसर मरीजों को एक शांत, सकारात्मक और उपचार के अनुकूल माहौल प्रदान करता है। इसी माहौल में रोगियों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली वैज्ञानिक होम्योपैथिक औषधियाँ उनके लंबे समय से चले आ रहे दर्द और समस्याओं को जड़ से ठीक करने की क्षमता रखती हैं। उपचार के दौरान रोगी को केवल दवा देना ही उद्देश्य नहीं होता, बल्कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य पुनर्स्थापन पर यहाँ विशेष ध्यान दिया जाता है। यही वह कारण है कि मरीज वर्षों बाद भी इस संस्थान को याद रखते हुए अपने परिवार और परिचितों को यहाँ भेजना पसंद करते हैं। समाज के विभिन्न समूहों से सम्मान प्राप्त करना, राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों द्वारा सराहना मिलना, और बड़े मंचों पर चिकित्सा सेवाओं के लिए सम्मानित होना—ये सभी तस्वीरें इस संस्था की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को और अधिक उजागर करती हैं। पोस्टर में दिखाई देने वाले पुरस्कार न केवल उपलब्धियों का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा लगातार लोगों की सेहत सुधारने और चिकित्सा के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने में जुटे हुए हैं। उनका सरल स्वभाव, रोगियों के प्रति समर्पण और ईमानदारी के साथ सेवा का भाव उन्हें चिकित्सा जगत में एक उल्लेखनीय व्यक्तित्व बनाता है। संपर्क के लिए उपलब्ध नंबर 9897618594, ईमेल drrajneeshhom@hotmail.com और आधिकारिक वेबसाइट www.cureme.org.in संस्थान की पारदर्शिता और सुविधा की नीति को मजबूत बनाते हैं। काशीपुर व आसपास के क्षेत्रों के लिए यह संस्थान विकसित और उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बन चुका है जहाँ लोग बिना किसी डर, संदेह या हिचकिचाहट के पहुँचते हैं। बढ़ते रोगों और बदलती जीवनशैली के समय में इस प्रकार की संस्था का होना पूरा क्षेत्र के लिए बड़ी राहत और उपलब्धि है। आने वाले समय में भी यह संस्था चिकित्सा सेवा के नए आयाम स्थापित करती रहेगी, यही उम्मीद लोगों की जुबान पर साफ झलकती है।
स्वच्छ, सुंदर और विकसित काशीपुर के संकल्प संग गणतंत्र दिवस

लेटेस्ट

ख़ास ख़बरें

error: Content is protected !!