- ई-केवाईसी अफरातफरी से सहमा उत्तराखंड, इंस्पेक्टर तनमै मैथानी की सफाई से टूटा भ्रम
- कार्ड फ्रीज़ से जुड़ी गलत धारणाओं पर रोक, काशीपुर प्रशासन ने स्थिति साफ की
काशीपुर। उत्तराखंड में राशन कार्ड ई-केवाईसी को लेकर पिछले कुछ दिनों में जिस तरह बेचौनी बढ़ी है, उसने लोगों के बीच असामान्य असुरक्षा का वातावरण बना दिया है। कई गांवों में तो हालत यह है कि लोग यह समझ ही नहीं पा रहे कि वास्तव में 30 नवंबर की अंतिम तिथि का मतलब क्या है और सरकार की मंशा क्या है। लगातार यह अफवाह उड़ रही है कि यदि केवाईसी समय पर पूरी नहीं की गई तो राशन बंद हो जाएगा और कार्ड निष्क्रिय मान लिया जाएगा। यही कारण है कि घर-परिवार से दूर नौकरी कर रहे लोग काम पर रहते हुए भी मानसिक दबाव महसूस कर रहे हैं। कई युवक तो अपनी ड्यूटी छोड़कर घर लौटने का जोखिम उठा लेने की सोच रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि यदि समय निकल गया तो उनके परिवार को मिलने वाला सरकारी अनाज कहीं रुक न जाए। इस तरह की बातें सुनकर दूर शहरों में रह रहे लोग लगातार फोन के जरिए घर की स्थिति पूछ रहे हैं और परिवार वाले भी स्पष्ट जानकारी न मिलने से उलझन में पड़ते जा रहे हैं।
इन्हीं उलझनों को देखते हुए हिन्दी दैनिक सहर प्रजातंत्र ने पहल करते हुए काशीपुर के क्षेत्रीय खाद्य इंस्पेक्टर तनमै मैथानी से विस्तृत बातचीत की, ताकि जनता तक वास्तविक स्थिति ठोस रूप में पहुंचाई जा सके। प्रदेश के कई जिलों की सूचनाओं में फर्क, अलग-अलग भाषाओं में जारी नोटिस और सोशल मीडिया पर तेजी से फैलती अधूरी जानकारी ने जिस तरह आम लोगों को उलझा कर रख दिया था, उसे देखते हुए यह चर्चा बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई। खासकर उन युवाओं के लिए जो उत्तराखंड से बाहर नौकरी कर रहे हैं और अपने परिवार के राशन को लेकर भीतर ही भीतर डर में जी रहे थे। परिवारवालों की ओर से मिले अस्पष्ट उत्तर और इंटरनेट पर तैरती गलत सूचनाओं ने भ्रम को और तीव्र कर दिया था।
इंस्पेक्टर तनमै मैथानी ने बातचीत के दौरान सबसे पहले इसी भ्रम को दूर किया कि सरकार ने किसी भी प्रकार की ऐसी व्यवस्था लागू नहीं की है, जिसके तहत ई-केवाईसी न होने पर राशन कार्ड तुरंत अमान्य घोषित कर दिया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि विभाग का उद्देश्य किसी भी परिवार को अचानक संकट में डालना नहीं है, बल्कि वितरण प्रणाली को अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनाना है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह प्रक्रिया उन कार्डों पर लागू होती है जिनमें लंबी अवधि से कोई गतिविधि नहीं दिखती—न राशन उठाया गया, न कोई अपडेट दर्ज हुआ। ऐसे कार्डों के लिए अस्थायी रोक की व्यवस्था है, ताकि यह पता चल सके कि लाभार्थी वास्तव में पात्र है या वर्षों से कार्ड निष्क्रिय अवस्था में ही पड़ा हुआ है।
उन्होंने उन परिस्थितियों पर भी विस्तार से बात की जिनमें परिवार का एक या अधिक सदस्य बाहर नौकरी करता है और समय पर घर नहीं आ पाता। उन्होंने कहा कि यदि परिवार नियमित रूप से राशन ले रहा है और कार्ड लगातार उपयोग में है, तो किसी भी प्रकार की रोक लगाने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि परिवार के सक्रिय सदस्य को राशन सामान्य रूप से मिलता रहेगा। बाहर रहने वाला सदस्य समय मिलने पर ई-केवाईसी कर सकता है, और उसकी अनुपस्थिति के कारण कार्ड पर किसी तरह की बाधा उत्पन्न नहीं की जाएगी। समस्या केवल तब होती है जब कोई कार्ड तीन महीने या उससे अधिक समय तक लगातार ना तो उपयोग में आता है और ना ही उसका सत्यापन कराया जाता है। ऐसी स्थिति में कार्ड फ्रीज़ किया जाता है, परंतु सही दस्तावेज़ प्रस्तुत होने पर उसे पुनः सक्रिय कर दिया जाता है।
इस मुद्दे पर चल रही सबसे बड़ी अफवाह—30 नवंबर की अंतिम तिथि—पर भी इंस्पेक्टर तनमै मैथानी ने विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि यह दावा पूरी तरह गलत है कि 30 नवंबर के बाद कार्ड रद्द हो जाएंगे। उन्होंने बताया कि सरकार ने सभी राशन कार्ड धारकों को 30 नवंबर 2025 तक ई-केवाईसी अनिवार्य रूप से करवाने का समय दिया है। यानी लाभार्थियों के पास एक लंबी अवधि है, और उन्हें किसी भी जल्दबाज़ी या भय में आने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी निर्देशों के अनुसार यदि कोई यूनिट समयसीमा पार होने के बाद भी ई-केवाईसी नहीं करवाती, तो उस यूनिट का राशन अस्थायी रूप से रोक दिया जा सकता है, लेकिन कार्ड तत्काल रद्द नहीं किया जाएगा। यह कार्यवाही केवल उन मामलों में की जाएगी जहां लंबी अवधि से प्रक्रिया को टाला जा रहा हो।
लोगों की उस बड़ी चिंता पर भी उन्होंने पूरी स्पष्टता से बात की जिसमें परिवार के कुछ सदस्य दूर शहरों में रहते हैं। इंस्पेक्टर तनमै मैथानी ने कहा कि यदि कार्ड पर पांच नाम दर्ज हैं, तो पाँचों का ई-केवाईसी होना आवश्यक है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि सभी एक ही समय पर उपस्थित हों। बाहर रहने वाले सदस्य अपने शहर में ही कार्ड प्राप्त करेंगे और बाद में जाकर केवाईसी कर सकते हैं। परिवार के बाकी सदस्यों को इस बीच राशन मिलता रहेगा। उन्होंने कहा कि यह बातें अफवाहों में बिल्कुल अलग रूप में फैलाई गई थीं, जिससे लोगों में बेवजह डर फैल गया। ऑनलाइन केवाईसी की संभावना से जुड़े सवाल पर उन्होंने साफ कहा कि वर्तमान व्यवस्था में ई-केवाईसी केवल अधिकृत राशन विक्रेता के पास ही की जा सकती है। आवश्यक उपकरण, आधार प्रमाणीकरण प्रणाली और ऑफ़लाइन सत्यापन सुविधा फिलहाल राशन दुकानों पर ही उपलब्ध है, इसलिए लाभार्थियों को व्यक्तिगत रूप से वहां जाना होगा।
इसी बातचीत में उन्होंने सफेद और गुलाबी कार्ड धारकों की बढ़ती समस्या पर भी विस्तृत जानकारी दी। कई कार्ड इसलिए खुल ही नहीं पा रहे क्योंकि यह मुद्दा अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि इसकी जड़ें 2013 की जनगणना आधारित सर्वेक्षण तक जाती हैं। उस समय प्रदेश की जनसंख्या के आधार पर जिलों को जितने राशन कार्ड बनाए जा सकते थे, उसका एक निश्चित लक्ष्य दिया गया था। वह लक्ष्य कई वर्ष पहले ही पूरा हो चुका है। इसलिए आज यदि कोई नया अंत्योदय, प्राथमिकता श्रेणी या फूड सिक्योरिटी कार्ड जारी होना है, तो वह केवल तभी संभव है जब किसी पुराने कार्ड को जांच में अयोग्य पाया जाए या उसे हटाया जाए। कुछ दिन पूर्व काशीपुर में हुए सर्वे में बड़ी संख्या में ऐसे कार्ड मिले जो या तो जिले की सीमा से बाहर पाए गए या फिर उनकी पात्रता अब निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थी। इंस्पेक्टर तनमै मैथानी ने कहा कि “फर्जी कार्ड” शब्द लोगों के मन में गलत अर्थ पैदा कर देता है। उनका कहना था कि फर्जी का मतलब यह बिल्कुल नहीं कि किसी ने जानबूझकर गलत जानकारी दी हो, बल्कि वास्तविकता यह है कि 2013–2018 के बीच कई लोगों ने कार्ड बनवाए थे, उस समय उनकी आय और जीवन परिस्थितियां अलग थीं। अब उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो चुकी है—आय बढ़ गई है, संपत्ति बढ़ी है या पात्रता के दूसरे मानकों से वे बाहर हो गए हैं। इसलिए सर्वे में उनके कार्ड संदिग्ध श्रेणी में आए हैं।
इस पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए नगर निगम और जिला प्रशासन की टीम मिलकर सतर्कता से कार्डों की जांच कर रही है। जो कार्ड संदिग्ध पाए गए हैं, उनकी सूची संबंधित राशन दुकानों पर चस्पा कर दी जाती है। इसका मकसद यह है कि लोग अपना नाम देखकर आवश्यक दस्तावेज़ जमा कर सकें। प्रत्येक लाभार्थी को समय दिया जाता है कि वह आय प्रमाण पत्र और शपथ पत्र देकर यह साबित करे कि वह अभी भी NFSA के नियमों के अनुसार पात्र है। यदि कोई व्यक्ति समय पर दस्तावेज़ प्रस्तुत कर देता है, तो उसका कार्ड बिना किसी रोक के सुरक्षित रहता है। केवल उन्हीं कार्डों को निरस्त किया जाता है जिनके धारक निर्धारित समय सीमा में आवश्यक प्रमाण जमा नहीं करते।
इन सभी तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि ई-केवाईसी को लेकर फैला भय वास्तविक सूचना के अभाव में पैदा हुआ है। सोशल मीडिया पर फैली अधूरी और तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत की गई जानकारी ने परिवारों को अनावश्यक तनाव में डाल दिया था। खासकर वे युवा जो रोज़गार के लिए उत्तराखंड से बाहर रहते हैं, वे इस डर से परेशान हो गए कि कहीं उनके घरवालों का अनाज रुक न जाए। इस मानसिक दबाव ने उन्हें अपनी नौकरी छोड़कर घर लौटने तक पर विचार करने को मजबूर कर दिया, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।
अब जब वास्तविक स्थिति सामने आ चुकी है, तो यह बात समझना आसान है कि 30 नवंबर कोई कठोर या भयावह तारीख नहीं है। यह सिर्फ एक प्रशासनिक समयसीमा है, जिसका मुख्य उद्देश्य उन कार्डों की जांच करना है जो वर्षों से निष्क्रिय पड़े हुए हैं। नियमित रूप से राशन लेने वाले परिवार, जिनके दस्तावेज़ सही हैं और जिनके कार्ड सामान्य रूप से उपयोग में हैं—उन्हें किसी भी प्रकार की चिंता करने की जरूरत नहीं है। अंततः यह कहा जा सकता है कि विभाग की मंशा लोगों को परेशान करने की नहीं बल्कि तंत्र को अधिक पारदर्शी, प्रभावी और जवाबदेह बनाने की है। जरूरत है केवल इस बात की कि आम लोग अफवाहों से दूर रहें और केवल अधिकृत स्रोतों से मिली पुष्टि की हुई जानकारी पर ही विश्वास करें। ऐसी पारदर्शिता ही जनता के मन से अनावश्यक भय को दूर कर सकती है और आवश्यक सेवाओं को सुचारु बनाए रख सकती है।



