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उत्तराखंड में एसओपी लागू फिर भी गैस संकट कायम पहले दिन सिर्फ 879 सिलिंडर डिलीवरी हुई

सरकार की नई व्यवस्था के बावजूद तय लक्ष्य 2650 के मुकाबले बेहद कम आपूर्ति, होटल रेस्टोरेंट और अन्य व्यवसायों में बढ़ी चिंता, स्टॉक पर्याप्त होने के बाद भी वितरण प्रणाली पर उठे सवाल।

रामनगर(सुनील कोठारी)। उत्तराखंड में गैस आपूर्ति को लेकर बीते कुछ समय से बनी असामान्य परिस्थितियों के बीच अब सरकार ने एक संतुलित और व्यापक रणनीति अपनाते हुए घरेलू गैस सिलिंडरों के साथ कमर्शियल गैस सिलिंडरों की डिलीवरी को फिर से शुरू कर दिया है, जिससे प्रदेश में लंबे समय से प्रभावित हो रही व्यावसायिक गतिविधियों को नई राहत मिलने की उम्मीद जागी है। केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुरूप राज्य स्तर पर इस व्यवस्था को लागू किया गया है, ताकि घरेलू उपभोक्ताओं की जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए व्यापारिक प्रतिष्ठानों को भी धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लाया जा सके। गैस संकट के चलते होटल, रेस्टोरेंट, होमस्टे और अन्य व्यवसायिक संस्थानों में कामकाज लगभग ठहर सा गया था, जिससे हजारों लोगों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा। ऐसे में सरकार का यह निर्णय न केवल राहत देने वाला माना जा रहा है, बल्कि प्रदेश की आर्थिक गतिविधियों को गति देने वाला भी साबित हो सकता है। इस पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए सरकार ने एक विस्तृत एसओपी यानी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर भी जारी की है, जिसमें वितरण की स्पष्ट व्यवस्था तय की गई है।

हालात ऐसे बन गए थे कि गैस की कमी के चलते प्रशासन को सख्त कदम उठाने पड़े और सबसे पहले कमर्शियल गैस सिलिंडरों की आपूर्ति को सीमित कर दिया गया, जिससे केवल आवश्यक सेवाओं को ही प्राथमिकता दी जा सके। उस समय अस्पतालों, शैक्षिक संस्थानों के हॉस्टल, सरकारी दफ्तरों और अन्य आपात सेवाओं तक ही गैस की डिलीवरी सीमित कर दी गई थी, जबकि होटल, ढाबे और रेस्टोरेंट जैसे व्यवसायों को भारी नुकसान झेलना पड़ा। कई जगहों पर कारोबार पूरी तरह ठप होने की कगार पर पहुंच गया था और कर्मचारियों को भी वेतन तक मिलने में परेशानी होने लगी थी। हालांकि यह फैसला तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए जरूरी था, लेकिन इसके दुष्परिणाम भी सामने आए, जिन्हें अब धीरे-धीरे दूर करने की कोशिश की जा रही है। सरकार ने यह समझते हुए कि केवल घरेलू आपूर्ति पर ध्यान देने से आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं, अब संतुलन बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है और कमर्शियल गैस की डिलीवरी को नियंत्रित तरीके से फिर से शुरू किया है।

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आने वाले समय में बढ़ने वाली मांग को ध्यान में रखते हुए भी यह फैसला काफी अहम माना जा रहा है, खासतौर पर जब अगले महीने से चारधाम यात्रा शुरू होने वाली है, जिसमें लाखों श्रद्धालुओं के उत्तराखंड पहुंचने की संभावना रहती है। इस दौरान होटल, रेस्टोरेंट, धर्मशालाओं और होमस्टे में गैस की खपत कई गुना बढ़ जाती है, जिससे आपूर्ति बनाए रखना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने पहले ही तैयारी शुरू कर दी है और कुछ महत्वपूर्ण सेक्टरों को चिन्हित किया है, जहां पर रोजाना कम से कम 20 फीसदी कमर्शियल गैस सिलिंडरों की डिलीवरी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। इस कदम का उद्देश्य यह है कि पर्यटन सीजन के दौरान किसी भी तरह की अव्यवस्था न हो और आने वाले श्रद्धालुओं को भी किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। साथ ही इससे स्थानीय व्यापारियों को भी राहत मिलेगी, जो इस सीजन पर काफी हद तक निर्भर रहते हैं।

इस पूरी व्यवस्था को लागू करने से पहले मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक अहम बैठक आयोजित की गई, जिसमें गैस आपूर्ति से जुड़े सभी पहलुओं पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। बैठक में यह तय किया गया कि वितरण प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी और व्यवस्थित बनाया जाए, ताकि किसी भी तरह की अनियमितता की गुंजाइश न रहे और सभी उपभोक्ताओं को उनकी आवश्यकता के अनुसार गैस उपलब्ध कराई जा सके। इसके बाद 16 मार्च को आधिकारिक रूप से एसओपी जारी की गई, जिसमें स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए कि किस प्रकार गैस एजेंसियां विभिन्न सेक्टरों में सिलिंडरों का वितरण करेंगी। अगले ही दिन यानी 17 मार्च से इस व्यवस्था को पूरे प्रदेश में लागू कर दिया गया और सभी संबंधित विभागों को इसके पालन के निर्देश दिए गए। जिला स्तर पर भी अधिकारियों को निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि योजना का क्रियान्वयन सही तरीके से हो रहा है और कहीं कोई गड़बड़ी न हो।

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हालांकि एसओपी लागू होने के पहले ही दिन जो आंकड़े सामने आए, उन्होंने यह संकेत जरूर दिया कि जमीनी स्तर पर अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं। तय योजना के अनुसार रोजाना करीब 2650 कमर्शियल गैस सिलिंडरों की डिलीवरी की जानी थी, लेकिन 17 मार्च को केवल 879 सिलिंडरों की ही बुकिंग और आपूर्ति हो सकी, जो निर्धारित लक्ष्य से काफी कम है। इससे यह स्पष्ट होता है कि नई व्यवस्था को पूरी तरह लागू करने में समय लग सकता है और एजेंसियों को इसके अनुरूप खुद को ढालने में कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि यह केवल शुरुआती दौर की समस्या है और जल्द ही स्थिति में सुधार होगा। दूसरी ओर यह भी सामने आया कि 16 मार्च तक गैस एजेंसियों के पास 11,490 कमर्शियल गैस सिलिंडरों का पर्याप्त स्टॉक मौजूद था, जिससे यह साफ है कि कमी स्टॉक की नहीं बल्कि वितरण प्रणाली की थी।

इस मामले में खाद्य विभाग के अपर आयुक्त खाद्य पीएस पांगती ने स्पष्ट किया कि नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक गैस एजेंसी को उसके पास मौजूद कमर्शियल गैस कनेक्शनों की संख्या के अनुसार ही सिलिंडरों का आवंटन किया जाएगा, जिससे वितरण में पारदर्शिता आएगी और किसी भी प्रकार की असमानता नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा कि पहले दिन लक्ष्य पूरा न हो पाना स्वाभाविक है, क्योंकि नई प्रणाली को लागू करने में कुछ समय लगता है, लेकिन आने वाले दिनों में आपूर्ति की गति में तेजी आएगी और निर्धारित लक्ष्य को हासिल कर लिया जाएगा। पीएस पांगती ने यह भी भरोसा दिलाया कि राज्य में घरेलू गैस की कोई कमी नहीं है और सरकार पूरी तरह से इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि आम उपभोक्ताओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो। उनके अनुसार यह नई व्यवस्था लंबे समय में गैस वितरण को और अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाएगी।

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आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्तमान में उत्तराखंड में कुल 63,054 कमर्शियल गैस कनेक्शन हैं, जिनकी आपूर्ति 311 गैस एजेंसियों के माध्यम से की जाती है। इतनी बड़ी संख्या में कनेक्शनों को सुचारू रूप से गैस उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती है, जिसके लिए एक मजबूत और सुव्यवस्थित प्रणाली की आवश्यकता होती है। नई एसओपी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसके तहत हर एजेंसी को उसके क्षेत्र और कनेक्शन की संख्या के आधार पर जिम्मेदारी सौंपी गई है। अधिकारियों का मानना है कि जैसे-जैसे यह प्रणाली स्थिर होगी, वैसे-वैसे आपूर्ति में भी सुधार देखने को मिलेगा और उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी। इसके अलावा जिला स्तर पर नियमित मॉनिटरिंग और समीक्षा की व्यवस्था भी की गई है, ताकि किसी भी समस्या को समय रहते दूर किया जा सके और वितरण प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाया जा सके।

17 मार्च की शाम तक के आंकड़ों के अनुसार कुल 879 कमर्शियल गैस सिलिंडरों की डिलीवरी की गई, जिनमें 19 किलोग्राम वाले 794 सिलिंडर और 47.5 किलोग्राम के 85 बड़े सिलिंडर शामिल हैं। इन सिलिंडरों को जिलेवार गैस एजेंसियों तक पहुंचाया गया, जिससे विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में धीरे-धीरे राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि यह संख्या अभी भी निर्धारित लक्ष्य से काफी कम है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि यह केवल शुरुआत है और आने वाले दिनों में इसमें तेजी आएगी। विशेष रूप से होटल, रेस्टोरेंट, होमस्टे, अस्पताल और फार्मास्यूटिकल इकाइयों को उनकी दैनिक आवश्यकता के अनुसार गैस उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है, ताकि इन क्षेत्रों में कामकाज प्रभावित न हो और सेवाएं सुचारू रूप से चलती रहें। इससे व्यापारिक गतिविधियों में भी धीरे-धीरे सुधार आने की संभावना जताई जा रही है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो उत्तराखंड सरकार का यह कदम गैस आपूर्ति को संतुलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसमें घरेलू और व्यावसायिक दोनों ही जरूरतों को ध्यान में रखा गया है। जहां एक ओर आम जनता को राहत देने की कोशिश की जा रही है, वहीं दूसरी ओर व्यापारिक गतिविधियों को भी पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है। शुरुआती चुनौतियों के बावजूद यह उम्मीद की जा रही है कि यह नई व्यवस्था आने वाले दिनों में पूरी तरह सफल होगी और राज्य में गैस आपूर्ति को लेकर जो असंतुलन बना हुआ था, वह धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। सरकार, प्रशासन और गैस एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय के जरिए इस योजना को सफल बनाने की कोशिश जारी है, जिससे प्रदेश के सभी वर्गों को इसका लाभ मिल सके और भविष्य में ऐसी स्थिति से निपटने के लिए एक मजबूत व्यवस्था तैयार हो सके।

इस पूरी व्यवस्था के लागू होने के बाद जहां एक ओर सरकार इसे संतुलित और दूरदर्शी कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर आम जनता और व्यापारिक वर्ग के बीच कई सवाल भी उठने लगे हैं, जो इस व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सीधा असर डाल सकते हैं। लोगों का कहना है कि जब गैस एजेंसियों के पास पहले से ही 11,490 कमर्शियल गैस सिलिंडरों का स्टॉक मौजूद था, तो फिर पहले ही दिन केवल 879 सिलिंडरों की डिलीवरी क्यों हो पाई, क्या यह केवल शुरुआती तकनीकी दिक्कत थी या फिर जमीनी स्तर पर कहीं न कहीं समन्वय की कमी है? कई होटल और रेस्टोरेंट संचालकों का यह भी सवाल है कि जब रोजाना 2650 सिलिंडर वितरित करने का लक्ष्य तय किया गया है, तो क्या सरकार यह सुनिश्चित कर पाएगी कि आने वाले दिनों में यह लक्ष्य वास्तव में पूरा हो, या फिर यह केवल कागजी आंकड़ों तक ही सीमित रह जाएगा? वहीं कुछ लोगों ने यह भी चिंता जताई है कि घरेलू गैस को प्राथमिकता देने के चलते क्या भविष्य में फिर से कमर्शियल आपूर्ति पर असर पड़ेगा, जिससे उनका कारोबार दोबारा संकट में आ सकता है? इसके अलावा यह भी सवाल उठ रहा है कि 63,054 कमर्शियल कनेक्शनों के बीच वितरण का जो नया फार्मूला अपनाया गया है, क्या वह सभी के लिए समान रूप से न्यायसंगत साबित होगा या फिर कुछ क्षेत्रों को अब भी कम आपूर्ति का सामना करना पड़ेगा? जनता अब यह जानना चाहती है कि सरकार इस पूरी व्यवस्था की निगरानी किस तरह करेगी और अगर कहीं गड़बड़ी होती है तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी।

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