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ईरान इजरायल युद्ध की तपिश में झुलसा होटल उद्योग और कमर्शियल गैस की किल्लत से बंद हुए ढाबे

ईरान और इजरायल युद्ध की तपिश से काशीपुर के होटलों में मचा हाहाकार और नेहा तथा निर्भया गैस एजेंसी पर हजारों सिलेंडरों का बैकलॉग होने से भट्ठियां ठंडी पड़ीं जबकि हजारों कर्मचारियों की रोजी-रोटी पर संकट।

काशीपुर। उत्तराखंड की प्रमुख औद्योगिक और व्यापारिक नगरी के होटल, रेस्टोरेंट और ढाबा संचालकों के लिए फाल्गुन का यह महीना किसी अग्निपरीक्षा और व्यापारिक त्रासदी से कम साबित नहीं हो रहा है, क्योंकि समूचे कुमाऊं मंडल के साथ-साथ इस महत्वपूर्ण शहर में भी कमर्शियल गैस सिलेंडरों की भारी किल्लत ने पूरे खाद्य बाजार की कमर तोड़कर रख दी है। मध्य पूर्व के देशों में छिड़े भीषण भू-राजनीतिक संघर्ष और ईरान-इजरायल युद्ध की तपिश अब सात समंदर पार से चलकर सीधे तौर पर काशीपुर के स्थानीय हलवाइयों के चूल्हों और बड़े आलीशान होटलों की अत्याधुनिक रसोइयों तक जा पहुँची है, जिसके कारण गैस की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन पूरी तरह से चरमरा गई है और रिफाइनरियों से आवक कम हो गई है। शासन और प्रशासन द्वारा वर्तमान में केवल घरेलू उपभोक्ताओं, जीवन रक्षक अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों जैसी अनिवार्य सेवाओं को ही गैस आपूर्ति में प्राथमिकता दी जा रही है, जिसके चलते व्यवसायिक श्रेणी के होटल उपभोक्ताओं को पूरी तरह से ठेंगा दिखा दिया गया है, जिससे शहर के कई छोटे-मझोले ढाबे और फास्ट फूड रेस्टोरेंट अब स्थाई रूप से बंदी की कगार पर पहुँच चुके हैं। होटल व्यापारियों का सामूहिक स्वर में कहना है कि वे गैस की इस भीषण और अकल्पनीय कमी के कारण बाहरी क्षेत्रों से आने वाले पर्यटकों और नियमित ग्राहकों को अपनी गुणवत्तापूर्ण सेवाएं देने में पूरी तरह असमर्थ हो रहे हैं, जो सीधे तौर पर शहर की मजबूत होती अर्थव्यवस्था और हजारों स्थानीय युवाओं के रोजगार को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है, जिससे भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा है।

गैस किल्लत की इस विकट और असहनीय परिस्थिति ने काशीपुर के व्यस्ततम खाद्य बाजारों में हाहाकार मचा दिया है, जहाँ रेस्टोरेंट संचालकों को अब महंगे विकल्पों या फिर पारंपरिक लकड़ी और कोयले जैसे प्रदूषणकारी ईंधनों की शरण लेनी पड़ रही है, जो आधुनिक मानकों के विपरीत है। पिछले कई हफ्तों से कमर्शियल सिलेंडरों की नियमित खेप न आने के कारण शहर की प्रमुख गैस एजेंसियों, जिनमें काशीपुर गैस सर्विसेज, नेहा इंडेन गैस एजेंसी और निर्भया गैस एजेंसी शामिल हैं, वहां बैकलॉग और वेटिंग लिस्ट का आंकड़ा अब हजारों की संख्या को पार कर गया है, जिससे विधिवत बुकिंग करने के बावजूद हफ्तों तक सिलेंडर की डिलीवरी नसीब नहीं हो पा रही है। विडंबना और दुर्भाग्य की बात यह है कि जहाँ एक ओर कमर्शियल सिलेंडरों की आधिकारिक और वैध सप्लाई पूरी तरह से ठप पड़ी है, वहीं दूसरी ओर सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर चोर दरवाजे से कालाबाजारी करने वाले गिरोह अचानक सक्रिय हो गए हैं, जो व्यापारियों की मजबूरी का अनुचित लाभ उठाकर सिलेंडरों को मनमाने और आसमान छूते दामों पर ब्लैक में बेच रहे हैं। इस ऊर्जा संकट ने न केवल होटल मालिकों की रातों की नींद हराम कर दी है, बल्कि जो मध्यमवर्गीय ग्राहक सस्ते और सुलभ खाने की तलाश में बाजार निकलते थे, उन्हें अब अपनी साधारण भोजन की थाली के लिए 25 से 35 प्रतिशत तक अधिक कीमत अपनी जेब से ढीली करनी पड़ रही है, जिससे आम जनता का बजट भी पूरी तरह बिगड़ गया है।

काशीपुर के होटल व्यापारियों के विभिन्न संगठनों और स्थानीय संयुक्त व्यापार मंडल ने इस विकराल स्थिति पर अपनी गहरी चिंता और रोष व्यक्त करते हुए उत्तराखंड शासन से तत्काल प्रभाव से दखल देने की पुरजोर मांग की है, क्योंकि एलपीजी गैस के बिना व्यावसायिक भट्ठियां जलाना अब तकनीकी और आर्थिक रूप से मुमकिन नहीं रह गया है। कई बड़े रेस्टोरेंट मालिकों ने तो विवश होकर अपने डिजिटल मेन्यू कार्ड में भारी कटौती कर दी है और वे केवल उन्हीं चुनिंदा व्यंजनों को परोस रहे हैं जो इंडक्शन हीटर या इलेक्ट्रिक तवे पर सीमित बिजली की मदद से तैयार किए जा सकें, लेकिन दक्षिण भारतीय डोसा और तंदूरी रोटी जैसे लोकप्रिय उत्तर भारतीय व्यंजनों के शौकीन ग्राहकों को हर रोज निराश होकर खाली हाथ अपने घरों को लौटना पड़ रहा है। व्यापारियों का तर्क है कि उत्तराखंड में बिजली की लगातार बढ़ती दरें और इंडक्शन कुकिंग की अपनी तकनीकी सीमाएं उनके परिचालन खर्च को इतना अधिक बढ़ा रही हैं कि वर्तमान दरों पर होटल चलाना अब सरासर घाटे का सौदा साबित हो रहा है, जिससे कर्ज की किस्तें चुकाना भी मुश्किल हो गया है। सरकार और स्थानीय पूर्ति विभाग द्वारा लकड़ी या बुरादे को विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करने का जो पुराना सुझाव दिया गया है, उसे आधुनिक होटल संचालकों ने पूरी तरह से अव्यावहारिक, स्वच्छता मानकों के विरुद्ध और पर्यावरण विरोधी बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया है, क्योंकि आज के मॉड्यूलर किचन और बंद रसोइयों में धुआं छोड़ने वाली भट्ठी जलाने की कोई गुंजाइश नहीं बची है।

स्थानीय प्रशासन की ओर से जिला पूर्ति अधिकारी और तहसील स्तर के अधिकारियों ने यह रुख साफ कर दिया है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और गैस अथॉरिटी के मुख्य स्रोतों से आपूर्ति श्रृंखला फिर से बहाल नहीं हो जाती, तब तक कमर्शियल सेक्टर के उपभोक्ताओं को सीमित कोटे और राशनिंग में ही संतोष करना होगा। जिलाधिकारी ने गैस एजेंसियों को पैनिक बुकिंग, अवैध डंपिंग और जमाखोरी को हर हाल में रोकने के उद्देश्य से कड़े दंडात्मक निर्देश जारी किए हैं, लेकिन धरातल पर संघर्ष कर रहे होटल मालिकों को इन कागजी निर्देशों से कोई खास राहत मिलती नहीं दिख रही है क्योंकि उनके पास इमरजेंसी स्टॉक अब नाममात्र का भी नहीं बचा है। काशीपुर जैसे तेजी से विकसित होते औद्योगिक केंद्र में, जहाँ प्रतिदिन हजारों श्रमिक, व्यापारी और सेल्स प्रोफेशनल बाहरी जनपदों से काम के सिलसिले में आते हैं और पूरी तरह से होटलों के खाने पर निर्भर रहते हैं, वहां भोजन की इस किल्लत ने अब धीरे-धीरे एक गंभीर सामाजिक और मानवीय संकट का रूप लेना शुरू कर दिया है। प्रशासन ने हालांकि जीवन रक्षक अस्पतालों के ऑक्सीजन प्लांट और सरकारी स्कूलों के मिड-डे मील के लिए सिलेंडरों का एक विशेष सुरक्षित कोटा आरक्षित रखा है, लेकिन मध्यम और लघु स्तर के निजी होटल कारोबारी इस सरकारी प्राथमिकता सूची से पूरी तरह बाहर होने के कारण खुद को उपेक्षित, लाचार और व्यवस्था द्वारा ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

वर्तमान समय में काशीपुर के मुख्य चौराहों और बाजारों में स्थिति इतनी भयावह है कि कई छोटे चाय के स्टॉल, चाट के ठेले और रेहड़ी-पटरी वाले दुकानदार दोपहर ढलते ही अपनी गैस खत्म होने के डर से दुकानें बंद कर भारी मन से घर लौटने को मजबूर हैं, क्योंकि उनके पास बैकअप के तौर पर न तो बिजली के चूल्हे हैं और न ही अन्य कोई वैकल्पिक साधन उपलब्ध है। होटल व्यापारियों के महासंघ ने चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि यदि अगले 48 घंटों के भीतर कमर्शियल सिलेंडरों की निर्बाध आपूर्ति को सुचारू नहीं किया गया, तो वे सामूहिक रूप से सड़कों पर उतरकर उग्र प्रदर्शन करने और अपने संस्थानों की चाबियाँ जिला प्रशासन को सौंपकर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने के लिए पूरी तरह से विवश होंगे। गैस एजेंसियों के गोदामों के बाहर खाली नीले सिलेंडरों की मीलों लंबी कतारें इस कड़वे सच की गवाह हैं कि यह संकट केवल प्रशासनिक फाइलों या आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने आम आदमी के निवाले को भी महंगा और दुर्लभ कर दिया है। शहर के प्रतिष्ठित व्यापारियों का कहना है कि एक ओर राज्य सरकार उत्तराखंड में पर्यटन और निवेश को बढ़ावा देने के बड़े-बड़े दावे करती है, तो दूसरी ओर मूलभूत ऊर्जा और ईंधन की कमी के कारण उनके अस्तित्व पर ही संकट मंडरा रहा है, जिसका स्थाई समाधान केवल युद्धस्तर पर आपूर्ति बहाल करना और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर सब्सिडी देना ही हो सकता है।

नगर के प्रबुद्ध वर्ग और विभिन्न व्यापारिक संगठनों ने अब सीधे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से इस संवेदनशील मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की विनम्र अपील की है और मांग की है कि वे पेट्रोलियम मंत्रालय और गैस कंपनियों के शीर्ष प्रबंधन को निर्देश दें कि वे काशीपुर जैसे औद्योगिक नगर के व्यवसायिक कोटे में कम से कम 60 प्रतिशत तक की आपातकालीन वृद्धि सुनिश्चित करें ताकि स्थानीय उद्योग पूरी तरह से ठप होने से बच सके। काशीपुर के विशाल होटल उद्योग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हजारों कर्मचारियों, वेटरों और रसोइयों के भविष्य पर भी अब बेरोजगारी की नंगी तलवार लटक रही है, क्योंकि यदि रेस्टोरेंट और भोजनालय लंबे समय तक बंद रहे तो मालिकों के पास स्टाफ की भारी छंटनी करने के अलावा और कोई वित्तीय विकल्प शेष नहीं बचेगा। यह वर्तमान गैस संकट न केवल एक व्यापारिक या आर्थिक समस्या है, बल्कि यह बदलते हुए खतरनाक वैश्विक परिदृश्य में हमारी विदेशी ईंधन निर्भरता की पोल भी खोल रहा है, जिससे भविष्य में उबरने के लिए अब ठोस, आत्मनिर्भर और दीर्घकालिक ऊर्जा नीति की आवश्यकता बहुत गहराई से महसूस की जा रही है। अब काशीपुर के हर छोटे-बड़े कारोबारी की उम्मीदें प्रशासन की आगामी उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक पर टिकी हैं, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि काशीपुर के होटलों के चूल्हे फिर से मुस्कराएंगे या फिर वे ईंधन के अभाव में ठंडे पड़कर हमेशा के लिए बंदी के काले सन्नाटे में खो जाएंगे।

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