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आसमानी आफत से मची भीषण तबाही और तड़पता बेबस अन्नदाता एवं सरकारी अनदेखी

बेमौसम बारिश और तूफानी हवाओं के तांडव से पच्चा वाला के खेतों में बिछी गेहूं की सुनहरी फसलें, बर्बादी के मुहाने पर खड़ा लाचार किसान और सरकारी तंत्र की शर्मनाक चुप्पी ने बदली अन्नदाता की तकदीर।

काशीपुर। सीमावर्ती क्षेत्र पच्चा वाला की उपजाऊ और हरी-भरी धरती पर कुदरत का ऐसा कहर टूटा है कि आज वहाँ का अन्नदाता खून के आँसू रोने को मजबूर हो गया है। जहाँ कुछ दिनों पहले तक सुनहरी बालियाँ हवा के झोंकों के साथ झूम रही थीं और किसानों की आँखों में सुनहरे भविष्य के सपने पल रहे थे, वहीं आज वहाँ केवल बर्बादी का संचा पसरा हुआ है। बेमौसम की भारी बरसात और चक्रवाती हवाओं के तांडव ने पच्चा वाला के खेतों में खड़ी गेहूं की लहलहाती फसल को पूरी तरह ज़मीन दोज़ कर दिया है, जिससे किसानों के अरमान और उनकी साल भर की कड़ी मेहनत मिट्टी में मिल गई है। जब हमारी टीम इन खेतों के बीच पहुँची, तो मंजर इतना भयावह था कि उसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है; चारों तरफ केवल बिछी हुई फसलें और सड़ते हुए पौधों की गंध महसूस की जा सकती थी। स्थानीय स्तर पर खेती करने वाले किसानों के चेहरों पर जो लाचारी और बेबसी दिखी, वह किसी भी संवेदनशील इंसान का दिल दहला देने के लिए काफी थी। इन किसानों का स्पष्ट कहना है कि इस बार प्रकृति ने उनसे न केवल उनकी आजीविका छीनी है, बल्कि उनके परिवार के सामने दो वक्त की रोटी का संकट भी खड़ा कर दिया है। गेहूं की फसल, जो कि इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है, अब पूरी तरह से नष्ट होने की कगार पर पहुँच चुकी है और किसानों के पास अब केवल खाली हाथ और कर्ज का बोझ ही शेष रह गया है।

खेतों की वर्तमान परिस्थिति का सूक्ष्म अवलोकन करने पर पता चलता है कि गेहूं के पौधों की स्थिति अब सुधार की गुंजाइश से कोसों दूर निकल चुकी है। किसानों ने अत्यंत व्यथित मन से बताया कि आज के इस आधुनिक दौर में, जहाँ बीज की बुवाई से लेकर उसकी सिंचाई और फिर कटाई तक में भारी भरकम मशीनों और महंगी खाद का उपयोग होता है, वहाँ इस तरह की प्राकृतिक आपदा एक बड़ा वज्रपात है। किसानों ने भरे गले से जानकारी दी कि गेहूं की फसल अब पूरी तरह ‘लम लेट’ हो चुकी है, जिसका अर्थ है कि पौधों के तने पूरी तरह टूटकर ज़मीन से चिपक गए हैं। ऐसी स्थिति में पौधों के निचले हिस्से में सड़न पैदा होने लगती है और जो दाना ऊपर की परत पर थोड़ा-बहुत बचा भी है, वह अब किसी काम का नहीं रहेगा। कृषि विशेषज्ञों और अनुभवी ग्रामीणों का यह मानना है कि अब जो बीज निकलेगा, वह पूरी तरह से नाकामयाब सिद्ध होगा क्योंकि दाना अपनी पूरी क्षमता से विकसित नहीं हो पाया है। इस खराब हुई फसल को स्थानीय भाषा में ‘जीरा’ कहा जा रहा है, जिसका अर्थ है कि दाना इतना हल्का, पतला और खोखला हो चुका है कि जब इसे कंबाइन हार्वेस्टर या थ्रेशर मशीन के जरिए निकालने की कोशिश की जाएगी, तो वह अनाज के साथ रुकने के बजाय हवा के दबाव से कबाड़ और भूसे के साथ ही उड़ जाएगा। यह एक ऐसी अपूरणीय क्षति है, जो किसानों को आर्थिक रूप से कई साल पीछे धकेल देगी और उनके पास बाज़ार में बेचने के लिए कुछ भी ठोस नहीं बचेगा।

सरकारी तंत्र और प्रशासनिक अमले की घोर संवेदनहीनता इस पूरी त्रासदी का सबसे दुःखद पहलू बनकर उभरी है। पच्चा वाला के त्रस्त किसानों ने भारी रोष के साथ यह खुलासा किया कि इतनी बड़ी तबाही मचने के बावजूद अभी तक तहसील विभाग या कृषि विभाग का कोई भी छोटा-बड़ा अधिकारी उनकी सुध लेने नहीं पहुँचा है। सरकार और उसके नुमाइंदों की इस बेरुखी ने किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है। जब बेबस किसानों ने अपनी गुहार लेकर ग्राम प्रधान के पास जाने की हिम्मत जुटाई, तो उन्हें वहाँ से भी केवल कोरा आश्वासन और निराशा ही हाथ लगी। ग्राम प्रधान ने अपनी विवशता जताते हुए साफ कह दिया कि उन्हें अभी तक शासन के उच्च स्तर से सर्वे करने या मुआवजे की प्रक्रिया शुरू करने के कोई भी दिशा-निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि कागजी कार्रवाई और नौकरशाही की कछुआ चाल किस कदर आम आदमी की जिंदगी पर भारी पड़ रही है। जहाँ एक तरफ किसान अपनी पूरी पूंजी लुटा चुका है, वहीं दूसरी तरफ जिम्मेदार अधिकारी एसी कमरों में बैठकर फाइलों का इंतज़ार कर रहे हैं। पच्चा वाला के ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर कब तक उन्हें इस तरह अनदेखा किया जाएगा और क्या उनकी जान और मेहनत की कोई कीमत इस व्यवस्था की नज़रों में नहीं है।

आर्थिक बर्बादी के गहरे जाल को समझाते हुए किसानों ने जो आंकड़े प्रस्तुत किए, वे किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय होने चाहिए। किसानों ने बताया कि पच्चा वाला में एक एकड़ भूमि पर गेहूं उगाने की लागत ही लगभग आठ से दस हज़ार रुपये के बीच बैठती है, जिसमें बीज, खाद, कीटनाशक और जुताई का खर्च शामिल है। इस विशिष्ट मामले में, उनके तीन एकड़ के खेत की स्थिति को देखा जाए, तो अब तक वे अपनी जेब से लगभग पच्चीस से तीस हज़ार रुपये की गाढ़ी कमाई इन खेतों में झोंक चुके हैं। यदि कुदरत का यह कहर न बरपा होता और फसल सामान्य रूप से पककर तैयार होती, तो इन तीन एकड़ खेतों से कम से कम 60 कुंतल या उससे भी अधिक उच्च गुणवत्ता वाले गेहूं की पैदावार की पूरी उम्मीद थी। बाज़ार भाव के हिसाब से इस फसल की कीमत एक लाख रुपये से कहीं ज़्यादा होती, जिससे किसान अपना कर्ज चुकाते और अपने परिवार का भरण-पोषण करते। लेकिन अब हकीकत यह है कि लागत की मूल राशि वापस आना भी एक दिवास्वप्न जैसा लग रहा है। किसानों का सीधा नुकसान एक लाख रुपये से ऊपर पहुँच चुका है, और यह आंकड़ा केवल एक परिवार का है। अगर पूरे पच्चा वाला गाँव के नुकसान को जोड़ा जाए, तो यह करोड़ों में पहुँचता है, जिससे पूरी ग्रामीण चेन बुरी तरह प्रभावित हो गई है।

समय चक्र और मौसम के इस अनपेक्षित बदलाव ने आगामी फसल चक्र को भी पूरी तरह से पटरी से उतार दिया है, जिससे किसानों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। प्रभावित गेहूं की फसल को पकने और कटाई के योग्य होने में अभी भी कम से कम 15 दिनों से अधिक का समय शेष था, लेकिन खेतों में जमा पानी और गिरी हुई फसलों के कारण अब यह समय और बढ़ जाएगा। पौधों में नमी इतनी अधिक हो गई है कि वे सूखने का नाम नहीं ले रहे हैं। इस देरी का सबसे घातक परिणाम यह होगा कि किसान अपनी अगली फसल, जिसे गर्मी का धान या अन्य नकदी फसलें कहा जाता है, की बुवाई समय पर नहीं कर पाएंगे। किसानों ने चिंता जताते हुए कहा कि गेहूं की कटाई में होने वाली देरी के कारण गर्मी का दाना बोने का उचित समय उनके हाथ से निकल जाएगा और फिर बरसात की फसलों पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा। कई किसानों ने तो निराशा के चरम पर पहुँचकर यहाँ तक कह दिया है कि अब वे अगली फसल बोने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं, क्योंकि उनके पास न तो बीज खरीदने के लिए पैसे बचे हैं और न ही पिछली लागत की वसूली की कोई उम्मीद है। यह स्थिति खेती-किसानी से लोगों के मोहभंग का कारण बन रही है, जो भविष्य के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है।

किसानों के बयानों से यह स्पष्ट है कि पच्चा वाला के ये अन्नदाता आज केवल सहायता के लिए नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए पुकार रहे हैं। उनकी माँग बहुत ही स्पष्ट और न्यायसंगत है; वे चाहते हैं कि सरकार तुरंत प्रभाव से इस क्षेत्र को आपदा प्रभावित घोषित करे और विशेष राहत पैकेज जारी करे। किसानों ने सीधे तौर पर निवेदन किया है कि उनकी इस आवाज़ को वीडियो और समाचार के माध्यम से दिल्ली और देहरादून के उन उच्चाधिकारियों तक पहुँचाया जाए जो नीति निर्धारण का काम करते हैं। उनकी मांग है कि प्रति एकड़ के हिसाब से हुए नुकसान का ईमानदारी से आकलन किया जाए और बिना किसी बिचौलिए के सीधे किसानों के बैंक खातों में मुआवजा राशि भेजी जाए। किसानों ने चेतावनी भरे लहजे में यह भी कहा कि यदि उनकी इस तबाही को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो उनके पास विरोध प्रदर्शन या फिर आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। आज पच्चा वाला का हर खेत चीख-चीख कर अपनी बर्बादी की कहानी कह रहा है और प्रशासन की खामोशी इस दर्द को और बढ़ा रही है। यह समय केवल संवेदना जताने का नहीं, बल्कि ज़मीन पर उतरकर काम करने का है ताकि इन किसानों को फिर से अपने पैरों पर खड़ा किया जा सके और उनकी उजड़ी हुई दुनिया में उम्मीद की एक किरण जगाई जा सके।

अंततः, यह पूरी रिपोर्ट शासन और प्रशासन के लिए एक आईना है, जो उन्हें उनकी जिम्मेदारियों का एहसास कराने के लिए काफी है। पच्चा वाला, काशीपुर के किसानों ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था और अब वे पूरी तरह से सरकारी रहमों-करम पर निर्भर हैं। यदि सरकार ने तत्काल हस्तक्षेप नहीं किया, तो आने वाले दिनों में अनाज की किल्लत और ग्रामीण गरीबी का एक नया दौर शुरू हो सकता है। किसान भगवान से भी नाराज़ हैं और अपनी सरकार से भी, क्योंकि आपदा के समय उन्हें अकेला छोड़ दिया गया है। वीडियो में दिख रही बिछी हुई गेहूं की फसलें केवल पौधों का ढेर नहीं हैं, बल्कि वे एक किसान की टूटी हुई रीढ़ की हड्डी के समान हैं। अब देखना यह होगा कि क्या इस खबर के प्रकाशित होने के बाद प्रशासनिक अमला जागता है या फिर कागजों का पेट भरने के लिए एक और फर्जी सर्वे की खानापूर्ति कर दी जाती है। किसानों की केवल एक ही अंतिम पुकार है— “हमें बचा लो, वरना हमारी खेती और हमारा परिवार दोनों ही इस मिट्टी में हमेशा के लिए दफन हो जाएंगे।” पच्चा वाला के इन बहादुर मगर टूटे हुए किसानों के लिए अब उम्मीद का केवल एक ही रास्ता बचा है और वह है त्वरित सरकारी सहायता और उनकी मेहनत का उचित मुआवज़ा।

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