उत्तराखंड। प्रदेश कि राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज होती दिखाई दे रही है, क्योंकि आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी रणनीतियों पर काम शुरू कर दिया है। चुनाव भले ही अभी कुछ समय दूर हों, लेकिन सियासी दलों ने अपने-अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने और मतदाताओं तक पहुंच बनाने की दिशा में सक्रियता बढ़ा दी है। इसी कड़ी में कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि आने वाले चुनाव में वह राज्य के मध्य हिमालय क्षेत्र पर विशेष ध्यान केंद्रित करेगी। यह वही इलाका है जहां वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को उम्मीद के अनुरूप सफलता नहीं मिल सकी थी। उस चुनाव के नतीजों के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने आंतरिक स्तर पर समीक्षा भी की थी और यह माना गया था कि पर्वतीय क्षेत्रों में पार्टी को अपनी पकड़ मजबूत करने की जरूरत है। अब पार्टी इसी रणनीति के तहत उन क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की तैयारी कर रही है, जो स्थानीय जनता के जीवन से सीधे जुड़े हुए हैं। कांग्रेस का मानना है कि यदि पर्वतीय जिलों की समस्याओं और विकास से जुड़े सवालों को प्रभावी ढंग से जनता के सामने रखा जाए तो आगामी चुनाव में बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड की राजनीति में पर्वतीय क्षेत्रों का महत्व हमेशा से अत्यधिक रहा है। राज्य का बड़ा भूभाग पहाड़ी जिलों में फैला हुआ है और इन इलाकों की सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियां मैदानों से काफी अलग हैं। इसी वजह से यहां के मतदाताओं के मुद्दे भी विशिष्ट होते हैं, जिनमें रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और सड़क संपर्क जैसे विषय प्रमुख माने जाते हैं। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस अब उन जिलों पर विशेष ध्यान देने की योजना बना रही है जो गैरसैंण के आसपास स्थित हैं और जिनका स्थायी राजधानी के मुद्दे से भी गहरा संबंध माना जाता है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने के सवाल को प्रमुखता से उठाया जाए तो इससे पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के बीच सकारात्मक संदेश जाएगा। इसी सोच के साथ कांग्रेस ने मध्य हिमालय क्षेत्र में आने वाले छह जिलों को अपनी रणनीति के केंद्र में रखने का फैसला किया है। इनमें अल्मोड़ा, बागेश्वर, पौड़ी गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल, चमोली और रुद्रप्रयाग शामिल हैं, जो भौगोलिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
विधानसभा सीटों के संदर्भ में देखें तो इन छह जिलों का चुनावी महत्व और भी अधिक स्पष्ट हो जाता है। आंकड़ों के अनुसार इन जिलों में कुल 24 विधानसभा सीटें आती हैं, जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। अल्मोड़ा जिले में छह विधानसभा सीटें हैं जिनमें अल्मोड़ा, द्वाराहाट, जागेश्वर, रानीखेत, सल्ट और सोमेश्वर शामिल हैं। इसी प्रकार बागेश्वर जिले में दो सीटें बागेश्वर और कपकोट आती हैं। पौड़ी गढ़वाल जिले में पांच विधानसभा सीटें कोटद्वार, पौड़ी, चौबट्टाखाल, श्रीनगर और यमकेश्वर के रूप में मौजूद हैं। टिहरी गढ़वाल जिले में छह सीटें टिहरी, प्रतापनगर, देवप्रयाग, धनोल्टी, नरेंद्रनगर और घनसाली के नाम से जानी जाती हैं। इसके अतिरिक्त चमोली जिले में तीन सीटें बदरीनाथ, कर्णप्रयाग और थराली आती हैं, जबकि रुद्रप्रयाग जिले में दो विधानसभा सीटें केदारनाथ और रुद्रप्रयाग हैं। इस प्रकार इन छह जिलों की कुल 24 सीटें राज्य की सत्ता की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। यही कारण है कि कांग्रेस इन क्षेत्रों में अपनी संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाने और स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देने की योजना बना रही है।
पिछले विधानसभा चुनाव के परिणामों का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इन क्षेत्रों में कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा था। वर्ष 2022 के चुनाव में इन 24 सीटों में से कांग्रेस केवल चार सीटें ही जीत सकी थी। इनमें अल्मोड़ा जिले की अल्मोड़ा और द्वाराहाट सीट, टिहरी गढ़वाल जिले की प्रतापनगर सीट और चमोली जिले की बदरीनाथ सीट शामिल थीं। बाकी अधिकांश सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल की थी, जिससे कांग्रेस को इन पर्वतीय जिलों में राजनीतिक रूप से झटका लगा था। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी के भीतर यह चर्चा भी हुई थी कि संगठनात्मक स्तर पर मजबूत रणनीति और स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता न देने के कारण पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। अब कांग्रेस इस स्थिति को बदलने के लिए नए सिरे से प्रयास करती दिखाई दे रही है। पार्टी का मानना है कि यदि पहाड़ी क्षेत्रों की वास्तविक समस्याओं को चुनावी एजेंडे में प्रमुखता से शामिल किया जाए और स्थानीय स्तर पर जनसंवाद बढ़ाया जाए तो आगामी चुनाव में इन सीटों पर बेहतर प्रदर्शन संभव है।
कांग्रेस की नई रणनीति में गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का मुद्दा प्रमुख स्थान पर दिखाई दे रहा है। राज्य गठन के समय से ही गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग समय-समय पर उठती रही है और यह मुद्दा पहाड़ के लोगों की भावनाओं से जुड़ा माना जाता है। कांग्रेस का मानना है कि यदि गैरसैंण को स्थायी राजधानी का दर्जा दिया जाता है तो इससे पर्वतीय जिलों में विकास की गति तेज हो सकती है और प्रशासनिक व्यवस्था भी अधिक संतुलित हो सकती है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भी इस विषय पर स्पष्ट रूप से कहा है कि राज्य के पर्वतीय जिलों के समग्र विकास के लिए गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित करना आवश्यक है। उनका कहना है कि इससे मध्य हिमालय क्षेत्र के छह जिलों में विकास के नए अवसर पैदा होंगे और वहां रहने वाले लोगों को प्रशासनिक सुविधाएं अधिक आसानी से उपलब्ध हो सकेंगी। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि यह मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं बल्कि क्षेत्रीय विकास और संतुलित प्रशासन से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे जनता के सामने प्रभावी ढंग से रखा जाएगा।
राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए कांग्रेस अब केवल चुनावी गणित तक सीमित रणनीति नहीं बना रही है, बल्कि वह पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़े सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक मुद्दों को भी अपने अभियान का हिस्सा बनाने की तैयारी में जुटी हुई है। पार्टी के भीतर इस बात पर चर्चा तेज हो गई है कि यदि केवल राजनीतिक नारों तक ही सीमित रहा जाए तो मतदाताओं से गहरा जुड़ाव बनाना संभव नहीं होगा। इसी कारण कांग्रेस उन विषयों को प्रमुखता देने की योजना बना रही है जिनका सीधा संबंध पहाड़ की जनता के दैनिक जीवन और उनकी भावनाओं से है। पिछले कुछ वर्षों में पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार पलायन, रोजगार के अवसरों की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमित उपलब्धता और शिक्षा के बुनियादी ढांचे की चुनौतियां जैसे मुद्दे स्थानीय स्तर पर प्रमुख चर्चा का विषय बने हुए हैं। कांग्रेस का मानना है कि इन समस्याओं को गंभीरता से उठाकर जनता के बीच यह संदेश दिया जा सकता है कि पार्टी केवल सत्ता हासिल करने की राजनीति नहीं कर रही बल्कि क्षेत्र के समग्र विकास के लिए ठोस दृष्टिकोण भी प्रस्तुत कर रही है। इसी सोच के साथ कांग्रेस नेतृत्व अब पहाड़ के मुद्दों को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाने की तैयारी में दिखाई दे रहा है।
पर्वतीय जिलों में जनभावनाओं को प्रभावित करने वाले मुद्दों में हाल के समय में चर्चित रहा अंकिता भंडारी हत्याकांड भी शामिल है। इस घटना ने राज्यभर में व्यापक चर्चा और आक्रोश पैदा किया था, जिसके बाद कई सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने भी इस मामले को लेकर आवाज उठाई थी। कांग्रेस अब इस प्रकरण को भी राजनीतिक और सामाजिक जवाबदेही के सवाल के रूप में उठाने के संकेत दे रही है। पार्टी के नेताओं का मानना है कि यह मामला केवल एक आपराधिक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे कानून व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और महिलाओं की सुरक्षा जैसे व्यापक प्रश्न भी जुड़े हुए हैं। इसलिए कांग्रेस इस विषय को जनता के बीच ले जाकर यह दिखाने का प्रयास कर सकती है कि राज्य में शासन व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं। पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि यदि ऐसे संवेदनशील मुद्दों को संतुलित और जिम्मेदार तरीके से उठाया जाए तो इससे जनता के साथ भावनात्मक स्तर पर संवाद स्थापित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि ऐसे मुद्दों को चुनावी बहस का हिस्सा बनाते समय सावधानी और संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक होता है।
इसके साथ ही कांग्रेस संगठनात्मक स्तर पर भी अपनी सक्रियता बढ़ाने की दिशा में कदम उठा रही है। पार्टी के विभिन्न पदाधिकारी और कार्यकर्ता अब मध्य हिमालय क्षेत्र के जिलों में जनसंपर्क कार्यक्रमों और बैठकों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि यदि संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत किया जाए और कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया जाए तो चुनावी मुकाबले में बेहतर स्थिति बनाई जा सकती है। पिछले चुनाव के अनुभवों से सीख लेते हुए पार्टी अब बूथ स्तर तक अपनी पकड़ मजबूत करने पर जोर दे रही है। इसके अलावा स्थानीय मुद्दों को समझने और जनता के सुझावों को सुनने के लिए भी विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाने की संभावना जताई जा रही है। पार्टी का लक्ष्य यह है कि चुनावी माहौल बनने से पहले ही पहाड़ी क्षेत्रों में कांग्रेस की मौजूदगी और सक्रियता स्पष्ट रूप से दिखाई दे। यही वजह है कि संगठनात्मक बैठकों और संवाद कार्यक्रमों के माध्यम से पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को भी चुनावी तैयारी के लिए प्रेरित कर रही है।
दूसरी ओर इस पूरे मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी का दृष्टिकोण कांग्रेस से बिल्कुल अलग दिखाई दे रहा है। भाजपा का कहना है कि गैरसैंण और पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के मुद्दे पर कांग्रेस केवल राजनीतिक बयानबाजी कर रही है, जबकि वास्तविक कदम भाजपा सरकार के कार्यकाल में ही उठाए गए थे। भाजपा नेताओं का दावा है कि गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करने का ऐतिहासिक निर्णय भी भाजपा सरकार के समय ही लिया गया था, जिससे इस क्षेत्र के महत्व को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस अब उसी मुद्दे को लेकर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही है, जबकि जब उसे शासन करने का अवसर मिला था तब उसने इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की। भाजपा के अनुसार राज्य के विकास के लिए केवल घोषणाएं नहीं बल्कि ठोस निर्णय और योजनाएं आवश्यक होती हैं, और इस दिशा में उनकी सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने भी इस विषय पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक बताया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के नेता जो बयान दे रहे हैं वे पूरी तरह राजनीति से प्रेरित हैं और वास्तविक तथ्यों से दूर हैं। महेंद्र भट्ट ने यह भी सवाल उठाया कि उत्तराखंड में कांग्रेस की भी सरकार रह चुकी है, लेकिन उस दौरान गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित करने का निर्णय क्यों नहीं लिया गया। उनका कहना है कि यदि कांग्रेस को वास्तव में इस विषय की चिंता होती तो वह अपने शासनकाल में ही इस दिशा में ठोस कदम उठा सकती थी। भाजपा का यह भी तर्क है कि राज्य के विकास के लिए संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है और सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में विकास योजनाओं को लागू करके इस दिशा में प्रयास किए हैं। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि कांग्रेस अब चुनाव नजदीक आते देख पुराने मुद्दों को फिर से उछालने की कोशिश कर रही है ताकि राजनीतिक माहौल बनाया जा सके।
उत्तराखंड की राजनीति में गैरसैंण और पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़े मुद्दे एक बार फिर प्रमुखता से उभरते दिखाई दे रहे हैं। जैसे-जैसे आगामी विधानसभा चुनाव का समय धीरे-धीरे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से जनभावनाओं को समझने और उन्हें अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं। पहाड़ के लोगों के लिए गैरसैंण केवल एक प्रशासनिक स्थान नहीं बल्कि लंबे समय से जुड़ी एक भावनात्मक मांग का प्रतीक भी माना जाता है। राज्य गठन के समय से ही कई सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने यह मांग उठाई थी कि राज्य की राजधानी पर्वतीय क्षेत्र में ही स्थापित की जाए ताकि विकास का संतुलन बना रहे और पहाड़ी जिलों को प्रशासनिक रूप से अधिक महत्व मिल सके। इसी कारण गैरसैंण का मुद्दा समय-समय पर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आता रहा है। अब जब चुनावी माहौल धीरे-धीरे आकार लेने लगा है तो यह विषय फिर से चर्चा में है और राजनीतिक दल इसे अपने-अपने तरीके से जनता के सामने प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मध्य हिमालय क्षेत्र के छह जिलों में आने वाली 24 विधानसभा सीटें आगामी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। इन सीटों पर जीत हासिल करना किसी भी दल के लिए सत्ता की राह को आसान बना सकता है, इसलिए स्वाभाविक रूप से सभी दल इन क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस जहां इन सीटों पर विशेष फोकस करके चुनावी रणनीति बना रही है, वहीं भाजपा भी इन क्षेत्रों में अपनी उपलब्धियों और योजनाओं को जनता तक पहुंचाने का प्रयास कर रही है। इन जिलों की भौगोलिक परिस्थितियां और सामाजिक संरचना ऐसी है कि यहां के मतदाता स्थानीय मुद्दों को काफी गंभीरता से लेते हैं। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पलायन जैसे विषय यहां की राजनीति के केंद्र में रहते हैं। इसलिए जो भी दल इन समस्याओं के समाधान का भरोसेमंद रोडमैप प्रस्तुत करेगा, उसे जनता का समर्थन मिलने की संभावना अधिक मानी जा रही है। यही वजह है कि दोनों प्रमुख दल इन क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ाते हुए दिखाई दे रहे हैं।
चुनावी रणनीति के संदर्भ में कांग्रेस का मानना है कि यदि पर्वतीय क्षेत्रों के विकास, प्रशासनिक संतुलन और स्थानीय भावनाओं से जुड़े मुद्दों को प्रभावी तरीके से उठाया जाए तो पार्टी इन सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है। पार्टी नेतृत्व का विश्वास है कि गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का प्रस्ताव केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं बल्कि पहाड़ के समग्र विकास से जुड़ा विषय है। कांग्रेस यह तर्क दे रही है कि यदि प्रशासनिक ढांचा पर्वतीय क्षेत्रों के करीब होगा तो वहां की समस्याओं को समझना और उनका समाधान करना अधिक आसान होगा। इसके साथ ही पार्टी स्थानीय युवाओं के रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, शिक्षा के अवसरों और बुनियादी ढांचे के विकास जैसे विषयों को भी अपने अभियान का हिस्सा बनाने की तैयारी में है। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि यदि इन मुद्दों को मजबूती से उठाया जाए तो पहाड़ की जनता के साथ बेहतर संवाद स्थापित किया जा सकता है और पिछले चुनाव में हुई कमजोरी को दूर किया जा सकता है।
दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी भी इन मुद्दों को लेकर कांग्रेस के दावों का जवाब देने में पीछे नहीं है। भाजपा का कहना है कि राज्य के विकास के लिए उनकी सरकार ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं और गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करना भी उसी दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम था। पार्टी के नेताओं का दावा है कि राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए कई योजनाएं लागू की गई हैं, जिनका लाभ पर्वतीय जिलों को भी मिला है। भाजपा यह भी कह रही है कि केवल राजनीतिक बयानबाजी से विकास संभव नहीं होता, बल्कि इसके लिए ठोस नीतियों और योजनाओं की आवश्यकता होती है। इसी आधार पर भाजपा कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक बताकर खारिज कर रही है और यह दावा कर रही है कि जनता विकास कार्यों के आधार पर ही अपना निर्णय करेगी।
राजनीतिक वातावरण को देखें तो यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में गैरसैंण और पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़े मुद्दे उत्तराखंड की राजनीति में और अधिक चर्चा का विषय बन सकते हैं। दोनों प्रमुख दल अपने-अपने तर्कों और दावों के साथ जनता के बीच जाने की तैयारी में हैं। जहां कांग्रेस इन छह जिलों की 24 सीटों को केंद्र में रखकर चुनावी रणनीति बना रही है, वहीं भाजपा भी इन क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी मजबूत बनाए रखने के लिए सक्रिय दिखाई दे रही है। इस राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का परिणाम क्या होगा यह तो चुनाव के समय ही स्पष्ट हो पाएगा, लेकिन इतना निश्चित है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पहाड़ की राजनीति एक बार फिर केंद्र में रहने वाली है। जनता के मुद्दों, विकास की दिशा और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर होने वाली यह राजनीतिक बहस आने वाले महीनों में और तेज होने की संभावना जताई जा रही है। यही कारण है कि उत्तराखंड की सियासत में गैरसैंण और मध्य हिमालय क्षेत्र की भूमिका आगामी चुनावी परिदृश्य को प्रभावित करने वाली प्रमुख धुरी बनती दिखाई दे रही है।





