काशीपुर। उत्तराखंड के वित्त वर्ष 2026 के बजट को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस का दौर लगातार तेज होता जा रहा है। राज्य सरकार ने इस बजट में महिला सशक्तिकरण को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल बताते हुए कई योजनाओं और कार्यक्रमों का उल्लेख किया है, लेकिन इन घोषणाओं के बाद अब सवाल भी उठने लगे हैं कि क्या इन योजनाओं से वास्तव में महिलाओं के जीवन में ठोस बदलाव आएगा या नहीं। इसी संदर्भ में कांग्रेस महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने बजट में महिला सशक्तिकरण को लेकर कई गंभीर कमियों की ओर ध्यान दिलाया है। उनका कहना है कि महिला कल्याण और सशक्तिकरण जैसे संवेदनशील विषय केवल घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस नीतियों और प्रभावी क्रियान्वयन की मांग करते हैं। यदि योजनाएं केवल बजट भाषण तक सीमित रह जाएं और उनके लागू होने की स्पष्ट व्यवस्था सामने न आए तो उनका वास्तविक लाभ समाज तक नहीं पहुंच पाता। अलका पाल का कहना है कि उत्तराखंड की महिलाएं विशेष रूप से ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में परिवार, खेती और सामाजिक जिम्मेदारियों को एक साथ निभाती हैं, इसलिए उनके लिए बनाई जाने वाली योजनाओं में जमीन से जुड़ी जरूरतों को प्राथमिकता देना आवश्यक है। उनके अनुसार वर्तमान बजट में महिला सशक्तिकरण की बात तो कही गई है, लेकिन कई ऐसे पहलू हैं जिन पर अधिक स्पष्टता और गंभीरता दिखाई देनी चाहिए थी।
राजनीतिक प्रतिक्रिया देते हुए अलका पाल ने कहा कि बजट में महिलाओं के लिए कई योजनाओं की घोषणा अवश्य की गई है, लेकिन इन योजनाओं के क्रियान्वयन की स्पष्ट रूपरेखा सामने नहीं आई है। उनका कहना है कि सरकार ने स्वयं सहायता समूहों और महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने की बात तो की है, पर यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इन योजनाओं को राज्य के दूरस्थ गांवों तक किस प्रकार पहुंचाया जाएगा। उन्होंने कहा कि केवल योजनाओं की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह भी जरूरी होता है कि उनके लागू होने की प्रक्रिया पारदर्शी और व्यवस्थित हो। अलका पाल का कहना है कि उत्तराखंड के कई गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से जूझ रहे हैं और वहां की महिलाओं को सरकारी योजनाओं की जानकारी और लाभ तक पहुंचाने के लिए मजबूत तंत्र की आवश्यकता होती है। यदि यह व्यवस्था स्पष्ट नहीं होगी तो योजनाओं का लाभ सीमित वर्ग तक ही रह जाएगा। उन्होंने सरकार से यह भी सवाल किया कि जिन योजनाओं की घोषणा की गई है, उनमें से कितनी योजनाएं वास्तव में गांवों में रहने वाली साधारण महिलाओं तक पहुंच पाएंगी।
महिला आर्थिक सशक्तिकरण के मुद्दे को उठाते हुए अलका पाल ने यह भी कहा कि बजट में महिलाओं की आय बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की बात तो कही गई है, लेकिन इसके लिए ठोस और दीर्घकालिक अवसरों का स्पष्ट खाका नहीं दिखता। उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में महिलाएं खेती, पशुपालन और छोटे घरेलू व्यवसायों से जुड़ी हुई हैं, लेकिन इन गतिविधियों को मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर बाजार, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता की जरूरत होती है। अलका पाल का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना चाहती है तो उसे केवल छोटे समूहों तक सीमित योजनाओं के बजाय ऐसे अवसर तैयार करने होंगे जिनसे महिलाओं को स्थायी आय मिल सके। उन्होंने कहा कि महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए उद्योग, विपणन व्यवस्था और वित्तीय संस्थाओं से बेहतर तालमेल बनाना भी जरूरी है, ताकि महिलाएं अपने उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचा सकें। उनके अनुसार बजट में इस दिशा में अपेक्षित स्पष्टता दिखाई नहीं देती।
कामकाजी महिलाओं की व्यावहारिक समस्याओं का उल्लेख करते हुए अलका पाल ने कहा कि महिलाओं को रोजगार और व्यवसाय से जोड़ने के लिए केवल प्रशिक्षण या वित्तीय सहायता पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उनके लिए सुरक्षित और सुविधाजनक कार्य वातावरण भी आवश्यक होता है। उन्होंने कहा कि कई महिलाएं रोजगार के अवसर होने के बावजूद इसलिए आगे नहीं बढ़ पातीं क्योंकि उनके लिए क्रेच, सुरक्षित परिवहन और प्रशिक्षण केंद्र जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं। अलका पाल का कहना है कि बजट में इन महत्वपूर्ण सुविधाओं के विस्तार के बारे में ठोस प्रावधान दिखाई नहीं देते। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना चाहती है तो उसे ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करनी होंगी जिनसे महिलाएं बिना किसी असुविधा के रोजगार और उद्यमिता के क्षेत्र में आगे बढ़ सकें। उनका मानना है कि महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल आर्थिक सहायता देना नहीं बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करना भी है जिसमें महिलाएं आत्मविश्वास के साथ काम कर सकें।
महिला सुरक्षा के विषय को उठाते हुए कांग्रेस महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने कहा कि किसी भी समाज में महिलाओं के सशक्तिकरण की बुनियाद उनकी सुरक्षा से जुड़ी होती है। उन्होंने कहा कि बजट में महिला कल्याण से संबंधित योजनाओं का उल्लेख जरूर किया गया है, लेकिन महिलाओं की सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए विशेष और प्रभावी कदमों का स्पष्ट उल्लेख नहीं दिखाई देता। अलका पाल का कहना है कि राज्य में महिला अपराधों को रोकने, पुलिस व्यवस्था को मजबूत करने और पीड़ित महिलाओं को त्वरित न्याय दिलाने के लिए व्यापक नीति की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि जब तक महिलाओं को सुरक्षित वातावरण नहीं मिलेगा, तब तक वे सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों में पूरी तरह भागीदारी नहीं कर पाएंगी। उनके अनुसार बजट में इस पहलू को और अधिक मजबूती के साथ शामिल किया जाना चाहिए था ताकि महिलाओं को वास्तविक सुरक्षा का भरोसा मिल सके।
ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों की महिलाओं की स्थिति को लेकर भी अलका पाल ने चिंता व्यक्त की। उनका कहना है कि उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में महिलाएं परिवार, खेती और पशुपालन की जिम्मेदारी एक साथ निभाती हैं और कई बार उन्हें बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों की महिलाओं के लिए अलग से विशेष रणनीति और कार्यक्रम तैयार किए जाने चाहिए थे, लेकिन बजट में ऐसी व्यापक योजना स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती। अलका पाल का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में महिला सशक्तिकरण को प्राथमिकता देना चाहती है तो उसे पहाड़ी क्षेत्रों की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए योजनाएं तैयार करनी होंगी। उन्होंने यह भी कहा कि इन क्षेत्रों की महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से जोड़ने के लिए विशेष पहल की आवश्यकता है।
महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े मुद्दों को भी अलका पाल ने गंभीरता से उठाया। उन्होंने कहा कि मातृत्व सेवाओं, पोषण कार्यक्रमों और ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत बनाना महिला सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि महिलाएं स्वस्थ नहीं होंगी तो वे परिवार और समाज के विकास में सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकेंगी। अलका पाल का कहना है कि बजट में इन विषयों पर अपेक्षाकृत कम विस्तार दिखाई देता है, जबकि उत्तराखंड के कई ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच अभी भी सीमित है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के स्वास्थ्य, पोषण और मातृत्व सुरक्षा के लिए विशेष योजनाओं और संसाधनों की आवश्यकता होती है, ताकि आने वाली पीढ़ी भी स्वस्थ और मजबूत बन सके।
राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर भी अलका पाल ने जोर दिया। उनका कहना है कि महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल आर्थिक सहायता या कल्याणकारी योजनाएं नहीं है, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी सक्रिय भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि पंचायतों, स्थानीय निकायों और प्रशासनिक संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए विशेष कदम उठाए जाने चाहिए थे। अलका पाल का कहना है कि यदि महिलाएं नीति निर्माण और निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगी तो समाज के विकास से जुड़े मुद्दों पर अधिक संवेदनशील और प्रभावी निर्णय लिए जा सकेंगे। उनके अनुसार बजट में इस दिशा में बड़े और स्पष्ट कदमों का अभाव दिखाई देता है।
इन सभी मुद्दों को सामने रखते हुए कांग्रेस महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने कहा कि महिला सशक्तिकरण एक व्यापक और बहुआयामी विषय है, जिसे केवल योजनाओं की घोषणा तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उनका कहना है कि योजनाओं के क्रियान्वयन की स्पष्ट रणनीति, महिलाओं के लिए स्थायी रोजगार के अवसर, सुरक्षित वातावरण, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और पहाड़ी क्षेत्रों की विशेष जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नीतियां तैयार करना बेहद जरूरी है। अलका पाल का मानना है कि यदि इन पहलुओं पर गंभीरता से काम किया जाए तो उत्तराखंड की महिलाएं न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे समाज के विकास में और अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि बजट में घोषित योजनाओं को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और जहां कमियां दिखाई दे रही हैं, उन्हें दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं ताकि महिला सशक्तिकरण केवल एक नारा न रहकर वास्तविक बदलाव का आधार बन सके।





