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अलका पाल का बड़ा हमला भाजपा का बजट 2026-27 आम आदमी के सपनों और उम्मीदों से किया विश्वासघात

कांग्रेस महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने केंद्रीय बजट 2026-27 को आंकड़ों का छलावा बताते हुए कहा कि यह दस्तावेज युवाओं, किसानों, मध्यम वर्ग और शहरी गरीबों की जरूरतों से कटकर केवल बड़े कॉरपोरेट हितों को साधने वाला है।

काशीपुर। देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था के केंद्र में पेश किया गया केंद्रीय बजट 2026-27 एक बार फिर आम नागरिक की उम्मीदों पर खरा उतरने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है। कांग्रेस महानगर अध्यक्ष अलका पाल की ओर से जारी इस आधिकारिक प्रतिक्रिया में साफ शब्दों में कहा गया है कि यह बजट केवल आंकड़ों की बाजीगरी और बड़े-बड़े दावों का पुलिंदा है, जिसमें न तो आम आदमी की पीड़ा दिखाई देती है और न ही युवाओं, किसानों और छोटे व्यापारियों की वास्तविक समस्याओं का कोई ठोस समाधान। 53.5 लाख करोड़ रुपये के विशाल आकार वाले इस बजट को सरकार ने विकासोन्मुखी बताने की कोशिश की है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह बजट आम जनता के लिए “शून्य” साबित हो रहा है। बढ़ती महंगाई, घटती बचत और लगातार दबाव में आ रहे मध्यम वर्ग के लिए इसमें कोई राहत नहीं है। बजट का पूरा झुकाव एक बार फिर बड़े कॉरपोरेट हितों की ओर दिखाई देता है, जबकि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले एमएसएमई सेक्टर, शहरी गरीब और बेरोजगार युवा पूरी तरह हाशिये पर छोड़ दिए गए हैं।

अलका पाल ने कहा कि आंकड़ों की गहराई में जाएं तो तस्वीर और भी ज्यादा चिंताजनक नजर आती है। कुल व्यय को 49.6 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 53.5 लाख करोड़ रुपये किया गया है, लेकिन यह सवाल अनुत्तरित है कि इस बढ़े हुए खर्च का फायदा आखिर किसे मिलेगा। पूंजीगत व्यय को 11.2 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया, जिसे सरकार रोजगार सृजन का आधार बता रही है, लेकिन पिछले वर्षों का अनुभव बताता है कि केवल कंक्रीट और स्टील पर खर्च करने से युवाओं को नौकरियां नहीं मिलतीं। अलका पाल का कहना है कि यह बजट “इंफ्रास्ट्रक्चर केंद्रित” जरूर है, लेकिन “मानव केंद्रित” बिल्कुल नहीं। लाखों शिक्षित युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं, जबकि सरकार के पास उनके लिए कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है। कैपेक्स बढ़ाने की घोषणाएं सुनने में भले ही आकर्षक लगें, परंतु जमीनी स्तर पर इसका असर न तो रोजगार दर में दिख रहा है और न ही आय में बढ़ोतरी के रूप में।

अलका पाल ने कहा कि इस बजट की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सरकार खुद को राजकोषीय अनुशासन का प्रतीक बताने में लगी हुई है, जबकि आम परिवार आर्थिक असुरक्षा के दलदल में धंसते जा रहे हैं। उन्होने कहा कि वित्तीय घाटे का लक्ष्य 4.3 प्रतिशत जीडीपी दिखाया गया है, जो पिछले वर्ष के 4.4 प्रतिशत से थोड़ा कम है, लेकिन यह “अंकगणितीय उपलब्धि” आम आदमी की परेशानियों को कम नहीं करती। घरेलू कर्ज लगातार बढ़ रहा है और बचत की दर ऐतिहासिक रूप से नीचे गिर चुकी है। उन्होने कहा कि सरकार ने बजट भाषण में इन सामाजिक-आर्थिक सच्चाइयों पर आंखें मूंद ली हैं। अलका पाल ने इसे “मानवीय संवेदनाओं से कटे हुए प्रशासनिक जड़ता” का उदाहरण बताया है, जहां सरकार सिर्फ प्रतिशत और अनुपात की बात करती है, लेकिन रसोई के खर्च, बच्चों की फीस और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत पर चुप्पी साधे रहती है। अलका पाल ने कहा कि यह बजट आंकड़ों में संतुलित दिख सकता है, पर आम नागरिक की जिंदगी में असंतुलन और तनाव बढ़ाने वाला है।

अलका पाल ने कहा कि मध्यम वर्ग के लिए यह बजट एक और बड़ा धोखा साबित हुआ है। उन्होने कहा कि सरकार ने “नए कर कानून” का शोर जरूर मचाया है, जो अप्रैल 2026 से लागू होने की बात कही गई है, लेकिन 2026-27 के वित्तीय वर्ष में आयकर स्लैब में कोई तात्कालिक राहत नहीं दी गई। इसका सीधा मतलब यह है कि महंगाई की मार झेल रहा मध्यम वर्ग अभी भी पुराने कर ढांचे के बोझ तले दबा रहेगा। उन्होने कहा कि शुद्ध कर प्राप्तियों को 26.7 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 28.7 लाख करोड़ रुपये करना इस बात का संकेत है कि सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए आम करदाताओं पर निर्भर होती जा रही है। अलका पाल का कहना है कि इसे “कर सुधार” कहना मध्यम वर्ग की पीड़ा का मजाक उड़ाने जैसा है। अलका पाल ने कहा कि जिन लोगों ने कोरोना काल से लेकर अब तक हर संकट में अर्थव्यवस्था को संभाले रखा, उन्हीं से सरकार लगातार ज्यादा योगदान की अपेक्षा कर रही है, लेकिन बदले में कोई ठोस राहत देने को तैयार नहीं है।

अलका पाल ने कहा कि किसानों के संदर्भ में यह बजट और भी ज्यादा निराशाजनक है। अन्नदाता आज भी आय सुरक्षा की प्रतीक्षा में हैं, लेकिन बजट में उनके लिए कोई ठोस और विश्वसनीय प्रावधान नजर नहीं आता। उन्होने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर कोई स्पष्ट दिशा नहीं दी गई है और न ही किसानों की लागत बढ़ोतरी का कोई समाधान पेश किया गया है। उन्होने कहा कि जल जीवन मिशन जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भारी कटौती और संशोधित अनुमानों की उलझन ने ग्रामीण भारत की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। जहां पहले इस योजना के लिए 67,000 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया था, वहीं संशोधित अनुमानों में इसे घटाकर लगभग 17,000 करोड़ रुपये तक लाया गया। अलका पाल ने इसे “निर्मम और असंवेदनशील फैसला” करार देते हुए कहा कि स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी जरूरतों पर इस तरह की अनिश्चितता ग्रामीण परिवारों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। सरकार पारदर्शिता की बात करती है, लेकिन ऐसे अहम कार्यक्रमों में बार-बार बदलाव भरोसे को कमजोर करते हैं।

अलका पाल ने कहा कि शहरी क्षेत्रों की स्थिति भी इस बजट में पूरी तरह उपेक्षित दिखाई देती है। महानगरों में रहने वाले शहरी गरीब, असंगठित क्षेत्र के मजदूर और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए कोई स्पष्ट नीति या योजना सामने नहीं आई है। उन्होने कहा कि बढ़ते किराए, परिवहन लागत और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें महानगरों में जीवन को लगातार महंगा बना रही हैं, लेकिन बजट में इसका कोई उल्लेख तक नहीं है। अलका पाल ने सवाल उठाया कि जब देश की बड़ी आबादी शहरी क्षेत्रों में रहकर अर्थव्यवस्था को गति देती है, तो उनके लिए कोई समर्पित रोडमैप क्यों नहीं बनाया गया। यह चूक बताती है कि सरकार की दृष्टि सीमित और दिशा विहीन है, जो जमीनी हकीकत को समझने में असफल रही है।

अलका पाल ने कहा कि महंगाई नियंत्रण के मोर्चे पर भी यह बजट पूरी तरह मौन नजर आता है। साबुन, डिटर्जेंट, खाद्य तेल और रोजमर्रा के उपयोग की अन्य वस्तुएं लगातार महंगी होती जा रही हैं, लेकिन सरकार ने इस पर लगाम लगाने के लिए कोई ठोस रणनीति पेश नहीं की। बजट भाषण में विकास और आत्मनिर्भरता के बड़े शब्द जरूर गूंजे, लेकिन आम परिवार की थाली और घरेलू बजट पर बढ़ते दबाव का कोई जिक्र नहीं किया गया। अलका पाल का कहना है कि यह “दिशाहीन नीति” का स्पष्ट संकेत है, जहां सरकार जमीनी समस्याओं से कटकर केवल प्रचार में व्यस्त है। महंगाई पर चुप्पी साधना दरअसल आम जनता की तकलीफों को नजरअंदाज करने के बराबर है।

अलका पाल ने कहा कि ये बजट राज्यों के साथ व्यवहार को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। वित्तीय विकेंद्रीकरण के नाम पर 41 प्रतिशत के हिस्से में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई, जिससे गैर-भाजपा शासित राज्यों में नाराजगी स्वाभाविक है। महानगरों और नगर निकायों की वित्तीय जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन केंद्र से मिलने वाले संसाधन उसी स्तर पर अटके हुए हैं। अलका पाल ने इसे “सौतेला व्यवहार” बताते हुए कहा कि संघीय ढांचे की भावना के खिलाफ जाकर केंद्र सरकार राज्यों को कमजोर कर रही है। स्थानीय स्तर पर बुनियादी सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए संसाधनों की कमी एक बड़ी बाधा बन रही है, लेकिन बजट इस सच्चाई से आंख चुराता नजर आता है।

अलका पाल ने कहा कि ये कुल मिलाकर यह बजट एक ऐसे आर्थिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें संवेदनशीलता और समावेशिता का अभाव साफ झलकता है। अलका पाल ने कहा कि इसे विकास का रोडमैप बताने की कोशिश की गई है, लेकिन वास्तव में यह अधूरे वादों और खोखले दावों का दस्तावेज बनकर रह गया है। अलका पाल ने इसे “टूटे हुए सपनों और आर्थिक मृगतृष्णा” का बजट करार देते हुए कहा कि भाजपा सरकार की नीतियां केवल धुएं और आईनों का खेल हैं, जो कुछ समय के लिए भ्रम पैदा कर सकती हैं, लेकिन सच्चाई को ज्यादा देर तक छुपा नहीं सकतीं। उन्होंने जनता से अपील की कि इस बजट का “जन ऑडिट” किया जाए और हर नागरिक खुद सवाल पूछे कि यह बजट उनके जीवन को कैसे बेहतर बनाएगा। उन्होने कहा कि अब समय आ गया है कि लोग इस चमक-दमक के पीछे छिपी हकीकत को पहचानें और एक ऐसे आर्थिक मॉडल की मांग करें, जो सचमुच लोगों के लिए हो, न कि केवल चुनिंदा ताकतवर वर्गों के लिए।

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