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शंकराचार्य विवाद से गरमाई सियासत उत्तर प्रदेश में सत्ता संतुलन डगमगाया योगी आदित्यनाथ की कुर्सी?

भाजपा संगठन संघ की भूमिका नेतृत्व संतुलन और जनअपेक्षाओं पर उठे सवालों के बीच उत्तर प्रदेश की राजनीति नए मोड़ पर विपक्ष आक्रामक जनता असमंजस में और भविष्य को लेकर अटकलें तेज होती दिखीं योगी आदित्यनाथ।

उत्तर प्रदेश(सुनील कोठारी)। राजनीति इस समय जिस करवट पर खड़ी है, उसे केवल सत्ता परिवर्तन या चुनावी गणित की सामान्य हलचल कहकर नहीं समझा जा सकता। यह एक गहरा वैचारिक, संगठनात्मक और नेतृत्व आधारित परिवर्तन का दौर है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी की केंद्रीय रणनीति, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक दिशा, प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता और मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ की कार्यशैलीकृसब एक साथ समीक्षा के दायरे में दिखाई दे रहे हैं। पिछले एक दशक में देश ने एक ऐसी राजनीतिक संरचना देखी, जिसमें केंद्र और राज्य की सत्ता एक ही वैचारिक धुरी पर सशक्त रूप से टिकी रही। इस दौरान हिंदुत्व को केवल एक सांस्कृतिक विचार नहीं बल्कि शासन की शैली और चुनावी सफलता के सूत्र के रूप में प्रस्तुत किया गया। किंतु राजनीति की प्रकृति स्थिर नहीं होती। समय के साथ अपेक्षाएँ बदलती हैं, जनता की प्राथमिकताएँ परिवर्तित होती हैं और संगठन के भीतर भी नए समीकरण उभरते हैं। आज वही प्रश्न उठ रहे हैं कि क्या सत्ता और संगठन के बीच संतुलन पहले जैसा है या उसमें दरारें उभर रही हैं।

पिछले वर्षों में उत्तर प्रदेश को भाजपा ने अपनी सबसे बड़ी प्रयोगशाला के रूप में प्रस्तुत किया। 2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर 2017 के विधानसभा चुनाव और फिर 2019 व 2022 तक, लगातार चुनावी जीत ने यह धारणा मजबूत की कि यह मॉडल अजेय है। कानून-व्यवस्था की सख्ती, बुलडोज़र की राजनीति, धार्मिक स्थलों के पुनरोद्धार और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्टकृइन सबने मिलकर एक ऐसी छवि बनाई जिसमें मजबूत नेतृत्व और निर्णायक प्रशासन को प्राथमिकता दी गई। लेकिन हर राजनीतिक मॉडल का एक चक्र होता है। जब जनता की अपेक्षाएँ केवल सुरक्षा और पहचान की राजनीति से आगे बढ़कर रोजगार, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर केंद्रित होने लगती हैं, तब सत्ता को अपनी रणनीति में सूक्ष्म परिवर्तन करने पड़ते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ उत्तर प्रदेश की राजनीति आज खड़ी दिखाई देती है।

भाजपा के भीतर भी यह चर्चा तेज हुई है कि क्या संगठन और सरकार के बीच समन्वय पहले जैसा सहज है। संघ की परंपरा हमेशा से यह रही है कि वह दीर्घकालिक वैचारिक लक्ष्य पर केंद्रित रहता है, जबकि सरकार को तात्कालिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जब दोनों की प्राथमिकताएँ समान दिशा में चलती हैं तो परिणाम ऐतिहासिक होते हैं, लेकिन जब गति और शैली में अंतर उभरता है तो अंदरूनी असहजता बढ़ने लगती है। उत्तर प्रदेश में नेतृत्व का केंद्रीकरण जिस तरह हुआ, उसने प्रशासनिक निर्णयों को तेज तो किया, पर साथ ही स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए संवाद की गुंजाइश कुछ सीमित भी की। राजनीति केवल आदेशों से नहीं, संवाद से चलती है। यदि कार्यकर्ता स्वयं को निर्णय प्रक्रिया से दूर महसूस करने लगें तो धीरे-धीरे असंतोष जन्म लेता है, भले ही वह सार्वजनिक रूप से व्यक्त न हो।

विपक्ष ने इस स्थिति को अवसर के रूप में देखना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी लगातार यह संदेश देने का प्रयास कर रही है कि भाजपा का आंतरिक संतुलन बिगड़ रहा है और जनता परिवर्तन चाहती है। अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति में युवा नेतृत्व, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय पहचान को प्रमुखता दी है। वे यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपा का मॉडल केवल प्रतीकात्मक उपलब्धियों पर आधारित है, जबकि वास्तविक सामाजिक-आर्थिक बदलाव की आवश्यकता अभी अधूरी है। हालांकि विपक्ष की चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। उसे विश्वसनीयता, संगठनात्मक मजबूती और व्यापक सामाजिक गठबंधन की परीक्षा से गुजरना होगा। लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि यदि सत्ता पक्ष के भीतर कहीं भी भ्रम या मतभेद का संकेत मिलता है तो विपक्ष उसे कई गुना बढ़ाकर जनता के सामने प्रस्तुत करता है।

राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति का प्रभाव राष्ट्रीय परिदृश्य पर सीधा पड़ता है। यह राज्य केवल जनसंख्या के आधार पर बड़ा नहीं है, बल्कि लोकसभा की सबसे अधिक सीटें भी यहीं से आती हैं। इसलिए यहाँ का प्रत्येक बदलाव केंद्र की रणनीति को प्रभावित करता है। यदि राज्य में नेतृत्व को लेकर किसी प्रकार की अनिश्चितता उत्पन्न होती है, तो उसका संदेश दूर तक जाता है। अभी तक भाजपा ने एकजुटता की छवि बनाए रखने में सफलता पाई है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच सार्वजनिक रूप से सामंजस्य दिखाया जाता रहा है, और संघ नेतृत्व भी समय-समय पर समर्थन का संकेत देता रहा है। किंतु राजनीति में धारणा ही वास्तविकता बन जाती है। यदि कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच यह प्रश्न उठने लगे कि भविष्य की दिशा क्या होगी, तो उसे समय रहते स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है।

उत्तर प्रदेश के विकास मॉडल की भी समीक्षा हो रही है। एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, धार्मिक पर्यटन और औद्योगिक निवेश के बड़े दावे किए गए। कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति भी दिखाई देती है। लेकिन समानांतर रूप से बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप, किसानों की आय और छोटे व्यापारियों की चुनौतियाँ भी चर्चा का विषय बनीं। सरकार की छवि मजबूत प्रशासन की रही, परंतु लोकतांत्रिक राजनीति में केवल दृढ़ता पर्याप्त नहीं होती; संवेदनशीलता और संवाद भी उतने ही आवश्यक हैं। यदि युवा वर्ग को यह महसूस हो कि उसकी आकांक्षाओं को पर्याप्त स्थान नहीं मिल रहा, तो वह धीरे-धीरे विकल्प तलाशने लगता है।

संगठनात्मक दृष्टि से भाजपा का ढांचा अत्यंत विस्तृत है। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता उसकी सबसे बड़ी ताकत रही है। लेकिन लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद हर दल को यह चुनौती आती है कि क्या उसका कैडर उतना ही प्रेरित है जितना विपक्ष के दौर में था। जब संघर्ष की जगह स्थायित्व आ जाता है, तब उत्साह को बनाए रखना कठिन होता है। संघ का अनुशासन और वैचारिक प्रशिक्षण इस कमी को संतुलित करने का प्रयास करता है, किंतु राजनीतिक लाभ-हानि की गणना अलग प्रकार से काम करती है। यदि टिकट वितरण, स्थानीय नेतृत्व या प्रशासनिक नियुक्तियों को लेकर असंतोष पनपता है, तो उसका असर चुनावी प्रदर्शन पर पड़ सकता है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक समीकरणों का है। उत्तर प्रदेश में जातीय संरचना जटिल है। भाजपा ने पिछले वर्षों में विभिन्न वर्गों को साथ लाने की रणनीति अपनाई और उसे सफलता भी मिली। परंतु सामाजिक गठबंधन स्थायी नहीं होते। यदि किसी समूह को यह लगे कि उसकी हिस्सेदारी कम हो रही है या उसकी आवाज कमजोर पड़ रही है, तो वह पुनर्संरेखण की ओर बढ़ सकता है। विपक्ष इसी संभावना को तलाश रहा है। सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व का मुद्दा आने वाले समय में और प्रखर हो सकता है।

मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका भी उल्लेखनीय है। आज राजनीतिक संदेश केवल रैलियों और सभाओं तक सीमित नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर धारणा निर्माण तेज गति से होता है। किसी भी बयान, निर्णय या अफवाह को तुरंत व्यापक रूप मिल जाता है। ऐसे में सत्ता पक्ष को न केवल नीतिगत निर्णयों पर बल्कि संचार रणनीति पर भी समान ध्यान देना पड़ता है। यदि संवाद में अस्पष्टता रहे, तो विरोधी नैरेटिव तेजी से फैलता है।

इन सबके बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या वर्तमान नेतृत्व संरचना भविष्य के चुनावों में भी वैसी ही एकजुटता और प्रभाव बनाए रख पाएगी, जैसा पिछले दशक में देखा गया। राजनीति में स्थिरता का अर्थ जड़ता नहीं होना चाहिए। समय के साथ बदलाव स्वीकार करना ही दीर्घकालिक सफलता की कुंजी है। यदि संगठन और सरकार मिलकर आत्ममंथन करें, नई पीढ़ी को अवसर दें, संवाद की प्रक्रिया को व्यापक बनाएं और विकास के मुद्दों को प्राथमिकता दें, तो स्थिति संभाली जा सकती है। किंतु यदि असंतोष की आवाजों को केवल विरोध मानकर अनसुना किया गया, तो वही आवाजें आगे चलकर चुनौती बन सकती हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति का यह दौर केवल व्यक्तियों का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह उस मॉडल की परीक्षा है जिसने पिछले दस वर्षों में भारतीय राजनीति की दिशा तय की। क्या यह मॉडल समय के साथ स्वयं को अद्यतन करेगा या जड़ता का शिकार होगाकृयही आने वाले वर्षों का सबसे बड़ा प्रश्न है। अभी परिस्थितियाँ निर्णायक नहीं हैं, पर संकेत स्पष्ट हैं कि राजनीति का अगला चरण पहले से अधिक जटिल और प्रतिस्पर्धी होगा।

राजनीतिक इतिहास यह बताता है कि जब भी कोई दल लंबे समय तक सत्ता में रहता है, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती बाहरी विरोध नहीं बल्कि आंतरिक संतुलन बनाए रखना होती है। उत्तर प्रदेश की वर्तमान परिस्थितियों में भी यही स्थिति दिखाई देती है। पिछले वर्षों में जिस आक्रामक शैली ने भाजपा को चुनावी विजय दिलाई, वही शैली अब प्रशासनिक और संगठनात्मक समन्वय की कसौटी पर परखी जा रही है। सत्ता की निरंतरता अक्सर यह भ्रम पैदा कर देती है कि जनसमर्थन स्थायी है, जबकि लोकतंत्र में समर्थन क्षणभंगुर भी हो सकता है। जनता का मनोविज्ञान बदलता है, मुद्दों की प्राथमिकता बदलती है और नेतृत्व से अपेक्षाएँ भी विकसित होती हैं। यदि नेतृत्व इन परिवर्तनों को समय रहते पढ़ ले तो वह अपनी रणनीति को अनुकूल बना सकता है, लेकिन यदि वह केवल पिछले विजय सूत्रों पर निर्भर रहे तो धीरे-धीरे जमीन खिसकने लगती है।

उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यहाँ की राजनीति सदैव बहुस्तरीय रही है। जातीय समीकरण, क्षेत्रीय अस्मिता, धार्मिक पहचान, आर्थिक विषमताएँ और युवा आकांक्षाएँ—इन सबका समुच्चय ही चुनावी परिणाम तय करता है। भाजपा ने पिछले दशक में इन तत्वों को एक व्यापक हिंदुत्व और विकास के नैरेटिव में पिरोने की कोशिश की। प्रारंभिक सफलता ने यह विश्वास पैदा किया कि यह संयोजन अटूट है। किंतु समय के साथ यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या विकास की रफ्तार और सामाजिक संतुलन दोनों समान गति से आगे बढ़ पाए हैं। कई युवा बेरोजगारी और प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर असंतोष व्यक्त करते रहे हैं। किसानों ने भी समर्थन मूल्य, लागत और बाजार की चुनौतियों पर चिंता जताई है। यदि इन वर्गों की अपेक्षाओं को संतुलित तरीके से संबोधित नहीं किया गया, तो राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

संगठन के भीतर नेतृत्व की दूसरी पंक्ति तैयार करना भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है। किसी भी दल की दीर्घकालिक सफलता इस पर निर्भर करती है कि वह नए चेहरों को कितनी सहजता से अवसर देता है। यदि पूरी राजनीतिक ऊर्जा कुछ सीमित चेहरों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाए, तो नीचे के स्तर पर अवसरों की कमी महसूस होती है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में क्षेत्रीय संतुलन भी अत्यंत आवश्यक है। पूर्वांचल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड और अवध—इन सभी क्षेत्रों की अपनी-अपनी राजनीतिक संवेदनशीलताएँ हैं। यदि किसी एक क्षेत्र को अधिक प्राथमिकता मिलती दिखे और दूसरे को उपेक्षा का अनुभव हो, तो वह असंतोष चुनावी व्यवहार में बदल सकता है।

विपक्ष इस परिस्थिति का लाभ उठाने के लिए निरंतर सक्रिय है। समाजवादी पार्टी ने अपनी रणनीति में सामाजिक न्याय और युवा नेतृत्व को केंद्र में रखा है। वह यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि सत्ता पक्ष के भीतर मतभेद हैं और जनता को विकल्प चुनना चाहिए। हालांकि विपक्ष के सामने विश्वसनीयता की परीक्षा भी उतनी ही बड़ी है। उसे यह साबित करना होगा कि वह केवल आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके पास ठोस नीति और प्रशासनिक दृष्टि भी है। यदि विपक्ष विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करने में सफल होता है और सत्ता पक्ष अपने असंतोष को समय पर संबोधित नहीं कर पाता, तो राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव संभव है।

केंद्र और राज्य के संबंध भी इस पूरे परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उत्तर प्रदेश का राजनीतिक महत्व राष्ट्रीय स्तर पर अत्यधिक है। लोकसभा की बड़ी संख्या के कारण यहाँ की जीत या हार सीधे केंद्र की स्थिरता को प्रभावित करती है। इसलिए राज्य में किसी भी प्रकार की अस्थिरता को राष्ट्रीय दृष्टि से भी देखा जाता है। यदि राज्य नेतृत्व और केंद्रीय नेतृत्व के बीच रणनीतिक तालमेल में कहीं भी भ्रम का संकेत मिलता है, तो उसका संदेश व्यापक होता है। अभी तक सार्वजनिक मंचों पर एकजुटता प्रदर्शित की जाती रही है, परंतु राजनीति में धारणा ही सबसे बड़ा सत्य बन जाती है। इसलिए नेतृत्व को यह सुनिश्चित करना होगा कि कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच किसी प्रकार की अनिश्चितता न पनपे।

मीडिया की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में निर्णायक है। पारंपरिक मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक, हर मंच पर राजनीतिक विमर्श तीव्र गति से चलता है। एक बयान या संकेत भी व्यापक बहस का रूप ले लेता है। ऐसे में संचार की रणनीति अत्यंत सुविचारित होनी चाहिए। यदि सरकार की उपलब्धियाँ प्रभावी ढंग से प्रस्तुत नहीं की जातीं या आलोचनाओं का समय पर उत्तर नहीं दिया जाता, तो विरोधी नैरेटिव मजबूत होता है। दूसरी ओर, अत्यधिक आक्रामक संचार भी कभी-कभी उल्टा प्रभाव डाल सकता है। जनता संतुलित और पारदर्शी संवाद की अपेक्षा करती है।

भविष्य की राजनीति का एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या हिंदुत्व और विकास का संयुक्त मॉडल आने वाले वर्षों में भी उतना ही प्रभावी रहेगा। सामाजिक-आर्थिक बदलावों के साथ राजनीति की भाषा भी बदलती है। युवा पीढ़ी पहचान की राजनीति के साथ-साथ अवसर और पारदर्शिता की मांग भी करती है। यदि शासन इन आकांक्षाओं को संतुलित रूप से संबोधित करता है, तो उसका आधार मजबूत रहता है। लेकिन यदि किसी एक आयाम पर अत्यधिक जोर दिया जाए और दूसरे की उपेक्षा हो, तो संतुलन बिगड़ सकता है।

आखिरकार उत्तर प्रदेश की राजनीति का यह दौर परीक्षा का है—नेतृत्व की परिपक्वता की, संगठन की एकजुटता की और जनता के विश्वास की। अभी स्थिति निर्णायक नहीं है, पर संकेत यह अवश्य देते हैं कि आत्ममंथन की आवश्यकता है। यदि सत्ता पक्ष समय रहते संवाद को व्यापक बनाए, नए नेतृत्व को स्थान दे, सामाजिक संतुलन पर ध्यान दे और आर्थिक चुनौतियों का ठोस समाधान प्रस्तुत करे, तो वह अपनी स्थिति को और मजबूत कर सकता है। लेकिन यदि असंतोष की छोटी-छोटी लहरों को नजरअंदाज किया गया, तो वही लहरें भविष्य में तूफान का रूप ले सकती हैं। लोकतंत्र में स्थायित्व का अर्थ निरंतर संवाद और सुधार है। उत्तर प्रदेश की राजनीति आने वाले समय में किस दिशा में जाएगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वर्तमान नेतृत्व इन संकेतों को कितनी गंभीरता से लेता है और जनता की अपेक्षाओं को कितनी संवेदनशीलता से संबोधित करता है।

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