नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। सरकार द्वारा लागू की गई नई श्रम संहिताओं को लेकर देशभर में बहस लगातार तेज होती जा रही है और इसका असर केवल नीतिगत गलियारों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि फैक्ट्रियों, निर्माण स्थलों, दफ्तरों और असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले लाखों मजदूरों के बीच भी इसे लेकर गहरी बेचौनी दिखाई देने लगी है। सरकार का दावा है कि ये कोड श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम मजदूरी और सुविधाओं का मजबूत ढांचा देंगे, लेकिन जमीनी स्तर पर कई ऐसे पहलू उभरकर सामने आ रहे हैं, जो नौकरी की स्थिरता, कार्यस्थल की सुरक्षा और सामूहिक अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। श्रमिक संगठनों का मानना है कि सुधार के नाम पर ऐसे प्रावधान जोड़े गए हैं, जिनसे रोजगार की अनिश्चितता बढ़ सकती है और मालिक पक्ष को पहले से कहीं अधिक ताकत मिल सकती है। यही कारण है कि श्रम संहिताओं को लेकर समर्थन और विरोध की आवाजें एक साथ सुनाई दे रही हैं और इसका सीधा प्रभाव कामकाजी वर्ग की मानसिकता और भविष्य की योजनाओं पर पड़ रहा है।
कानूनी बदलावों का सबसे बड़ा असर नौकरी की सुरक्षा पर पड़ता हुआ दिखाई देता है, क्योंकि नए प्रावधानों के तहत छंटनी और सेवाएं समाप्त करने की प्रक्रिया को पहले की तुलना में अधिक सरल बना दिया गया है। पहले जहां बड़ी औद्योगिक इकाइयों को कर्मचारियों की संख्या के आधार पर सरकारी अनुमति लेनी होती थी, वहीं अब लगभग तीन सौ कर्मचारियों तक बिना अनुमति के छंटनी का रास्ता खुल सकता है। इस बदलाव को लेकर श्रमिकों के बीच डर का माहौल है, क्योंकि इससे ‘हायर एंड फायर’ जैसी प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलने की आशंका जताई जा रही है। रॉयटर्स की रिपोर्टों में भी यह बात सामने आई है कि निवेश को आकर्षित करने की कोशिश में रोजगार सुरक्षा से जुड़े नियमों को ढीला किया गया है। मजदूरों का कहना है कि इससे वे लगातार अनिश्चितता में जीने को मजबूर होंगे, क्योंकि किसी भी समय बिना ठोस कारण बताए उनकी नौकरी खत्म की जा सकती है।
श्रम संहिताओं का एक और विवादित पहलू ट्रेड यूनियनों की भूमिका और सामूहिक सौदेबाजी के अधिकार से जुड़ा हुआ है। ट्रेड यूनियनें लंबे समय से मजदूरों की आवाज को संगठित रूप से सामने रखने का माध्यम रही हैं, लेकिन नए नियमों के तहत हड़ताल और संगठन से जुड़े अधिकारों पर सीमाएं लगाए जाने की आशंका जताई जा रही है। एपी न्यूज़ में प्रकाशित विश्लेषणों के अनुसार, यदि यूनियनों की ताकत कमजोर होती है तो मजदूरी, काम के घंटे और कार्यस्थल की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मजदूरों की इंतहंपदपदह क्षमता घट सकती है। कई श्रमिक संगठनों का कहना है कि इससे मालिक पक्ष के सामने व्यक्तिगत मजदूर और भी कमजोर स्थिति में आ जाएंगे, क्योंकि सामूहिक दबाव के बिना अपनी मांगें मनवाना बेहद कठिन हो जाएगा।
स्थायी रोजगार की जगह फिक्स्ड-टर्म और ठेका आधारित नौकरियों को बढ़ावा दिए जाने की संभावना भी इन श्रम संहिताओं को लेकर चिंता का बड़ा कारण बन रही है। सरकार का तर्क है कि इससे उद्योगों को लचीलापन मिलेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, लेकिन श्रमिकों का अनुभव कुछ और कहानी बयान करता है। एपी न्यूज़ के अनुसार, समयबद्ध अनुबंधों पर काम करने वाले कर्मचारियों को अक्सर स्थायी कर्मचारियों जैसी सुविधाएं और सुरक्षा नहीं मिल पाती। इससे न केवल उनका आर्थिक भविष्य अस्थिर होता है, बल्कि सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ भी सीमित रह जाता है। मजदूरों का मानना है कि यदि स्थायी नियुक्तियों की संख्या घटती है तो वे लंबे समय तक एक ही जगह टिककर काम नहीं कर पाएंगे।
नई श्रम व्यवस्था में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को केंद्र में रखे जाने पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्टों में यह उल्लेख किया गया है कि कई प्रावधान ऐसे हैं, जो नियोक्ताओं को अधिक प्रशासनिक सुविधा और नियंत्रण प्रदान करते हैं। आलोचकों का कहना है कि जब नीतियों का फोकस अत्यधिक रूप से निवेश और कारोबार की सहूलियत पर होता है, तो मजदूरों के अधिकार पीछे छूटने का खतरा बढ़ जाता है। कार्यस्थल पर अनुशासन, उत्पादन और लागत नियंत्रण के नाम पर श्रमिकों से अतिरिक्त दबाव में काम कराए जाने की आशंका भी व्यक्त की जा रही है, जिससे कामकाजी माहौल तनावपूर्ण हो सकता है।

हालांकि यह भी सच है कि श्रम संहिताओं में कुछ ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिनसे सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ने की उम्मीद की जा रही है। सरकार का कहना है कि असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को पहली बार एक व्यापक कानूनी ढांचे के तहत लाया जा रहा है, जिससे उन्हें न्यूनतम मजदूरी, बीमा और पेंशन जैसी सुविधाओं का लाभ मिल सकेगा। कई श्रमिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इन प्रावधानों को ईमानदारी से लागू किया गया, तो इससे लाखों मजदूरों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव आ सकता है। इसके बावजूद, सवाल यह है कि क्या यह सुरक्षा नौकरी की स्थिरता की कीमत पर तो नहीं दी जा रही।
जमीनी हकीकत यह भी है कि भारत का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है, जहां कानूनों का क्रियान्वयन पहले से ही एक बड़ी चुनौती रहा है। श्रमिक संगठनों का तर्क है कि नए नियम तभी प्रभावी साबित होंगे, जब उनके पालन की सख्त निगरानी की जाए। यदि नियम कागजों तक सीमित रह गए, तो मजदूरों को वास्तविक लाभ मिलने के बजाय केवल अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है। इस संदर्भ में रॉयटर्स और एपी न्यूज़ दोनों ने इस बात पर जोर दिया है कि नीति और व्यवहार के बीच की खाई को पाटना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों के साथ-साथ सेवा क्षेत्र के कर्मचारियों पर भी इन बदलावों का असर पड़ने की संभावना है। निजी दफ्तरों में काम करने वाले लोग भी यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या नई श्रम संहिताएं उनके हितों की पर्याप्त रक्षा कर पाएंगी। नौकरी की शर्तों में लचीलापन जहां कंपनियों के लिए फायदेमंद माना जा रहा है, वहीं कर्मचारियों के लिए यह अस्थिरता का संकेत बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संतुलन नहीं बनाया गया, तो कार्यस्थलों पर तनाव और असंतोष बढ़ सकता है।
श्रम संहिताओं को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ दल इन्हें आर्थिक सुधारों की दिशा में जरूरी कदम बता रहे हैं, जबकि विपक्षी दल और श्रमिक संगठन इन्हें मजदूर विरोधी करार दे रहे हैं। संसद से लेकर सड़कों तक इस मुद्दे पर बहस जारी है और कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन भी हो चुके हैं। द इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, यह विवाद केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक आयाम भी रखता है, क्योंकि इसका सीधा संबंध करोड़ों परिवारों की आजीविका से जुड़ा हुआ है।
कुल मिलाकर, नई श्रम संहिताएं एक ऐसे मोड़ पर खड़ी नजर आती हैं, जहां एक ओर विकास, निवेश और रोजगार सृजन की उम्मीदें जुड़ी हैं, वहीं दूसरी ओर नौकरी की सुरक्षा, यूनियन शक्ति और कार्यस्थल के अधिकारों को लेकर गंभीर आशंकाएं भी मौजूद हैं। सरकार और उद्योग जगत जहां इन्हें भविष्य के लिए जरूरी कदम मान रहे हैं, वहीं मजदूर वर्ग इस बात को लेकर सतर्क है कि कहीं सुधार के नाम पर उनकी स्थिरता और अधिकार कमजोर न पड़ जाएं। आने वाले समय में यह साफ होगा कि ये कोड वास्तव में श्रमिकों को मजबूत बनाते हैं या अनिश्चितता के नए दौर की शुरुआत करते हैं।





