नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। भारतीय राजनीति के मौजूदा परिदृश्य में सत्ता और नीति निर्माण को लेकर जिस तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं, उन्होंने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, आर्थिक नीतियों और वैश्विक संबंधों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। संसद के भीतर और बाहर जिस प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप सामने आ रहे हैं, उन्होंने यह संकेत दिया है कि राजनीतिक टकराव अब केवल घरेलू मुद्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गठजोड़ और वैश्विक शक्ति संरचनाओं से भी गहराई से जुड़ता जा रहा है। हाल के दिनों में विपक्ष ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक समझौतों और वैश्विक आर्थिक साझेदारियों के कारण देश की नीतियों पर बाहरी प्रभाव बढ़ता जा रहा है। विपक्ष का दावा है कि कई महत्वपूर्ण निर्णय ऐसे नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट हितों से प्रभावित होकर लिए जा रहे हैं, जिनका सीधा असर देश की आर्थिक और सामाजिक संरचना पर पड़ सकता है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहता है कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक उभरती शक्ति है और अंतरराष्ट्रीय समझौते देश की आर्थिक मजबूती के लिए जरूरी हैं।
इसी बहस के बीच यह सवाल भी तेजी से उठने लगा है कि क्या केंद्र सरकार के भीतर कैबिनेट मंत्रियों की स्वतंत्र भूमिका पहले जैसी बनी हुई है या फिर नीति निर्माण की प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत हो चुकी है। विपक्ष लगातार यह आरोप लगा रहा है कि कई बड़े फैसले शीर्ष स्तर से तय किए जाते हैं और संबंधित मंत्रालयों की भूमिका केवल उन्हें लागू करने तक सीमित रह जाती है। हरदीप पुरी, पीयूष गोयल, एस जयशंकर, अश्विनी वैष्णव, गिरिराज सिंह और निर्मला सीतारमण जैसे प्रमुख मंत्रियों के बयान और कई मामलों में उनकी चुप्पी को लेकर भी राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हाल के वर्षों में विभिन्न मंत्रालयों से जुड़े मुद्दों पर जिस प्रकार निर्णय लिए गए, उन्होंने लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया और मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी को लेकर नई बहस छेड़ दी है। संसद के भीतर भी विपक्ष ने कई बार यह सवाल उठाया कि बड़े आर्थिक, रक्षा और कूटनीतिक फैसलों पर विस्तृत चर्चा क्यों नहीं हो रही है और क्यों कई महत्वपूर्ण समझौतों की जानकारी संसद के सामने पूरी पारदर्शिता के साथ नहीं रखी जा रही।
वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में तेजी से हो रहे बदलावों ने इस बहस को और जटिल बना दिया है। अमेरिका, रूस और चीन जैसे वैश्विक शक्तिशाली देशों के बीच बदलते संबंधों ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार और रक्षा सहयोग के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और रूस के बीच सहयोग बढ़ता है और डॉलर आधारित व्यापार को लेकर रूस की नीति में बदलाव आता है, तो इसका असर भारत सहित कई देशों की रणनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक रिपोर्टों में यह संकेत दिया गया कि रूस डॉलर आधारित व्यापार के लिए पहले की तुलना में अधिक तैयार दिखाई दे रहा है, जिससे वैश्विक आर्थिक समीकरण बदल सकते हैं। ऐसे हालात में भारत के लिए संतुलित कूटनीति अपनाना बेहद जरूरी हो गया है, क्योंकि तेल आयात, रक्षा खरीद और व्यापारिक साझेदारियों को लेकर भारत को बहुपक्षीय रणनीति अपनानी पड़ रही है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार की नीतियां बड़े अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट घरानों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं, जबकि सरकार का दावा है कि वैश्विक साझेदारियों से भारत की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और विकास दर को नई गति मिलेगी।
ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी ने भी राजनीतिक विवाद को नई दिशा दी है। वेनेजुएला से तेल आयात को लेकर सामने आए संकेतों ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या भारत की ऊर्जा नीति अब निजी क्षेत्र के माध्यम से संचालित हो रही है। रिलायंस जैसी कंपनियों की भूमिका इस संदर्भ में चर्चा का केंद्र बनी हुई है, क्योंकि वे पहले भी वेनेजुएला से तेल आयात में शामिल रही हैं। 2019 में अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने वेनेजुएला से तेल आयात रोक दिया था, लेकिन बदलते वैश्विक हालात में निजी कंपनियों को फिर से अनुमति मिलने की चर्चा ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दे दिया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार की नीतियां बड़े कॉर्पोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई जा रही हैं, जबकि सरकार का कहना है कि निजी कंपनियों की भागीदारी से ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और देश को सस्ते दामों पर तेल मिल सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देश के लिए वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहना आवश्यक है, लेकिन इसके साथ घरेलू नीतियों में संतुलन बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
डिजिटल इंडिया और आईटी सेक्टर से जुड़े मुद्दों पर भी राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। विपक्ष ने यह आरोप लगाया है कि डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं की जानकारी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले साझा की गई थी, जबकि सरकार का कहना है कि यह योजना देश को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल थी। डिजिटल क्रांति ने सरकारी सेवाओं को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लाकर पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाई, लेकिन इसके साथ डेटा सुरक्षा और वैश्विक तकनीकी कंपनियों के प्रभाव को लेकर चिंता भी बढ़ी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों ने आईटी सेक्टर के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। हाल ही में एआई तकनीकों को लेकर आई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और शेयर बाजार में आई गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आईटी सेक्टर में वैश्विक प्रतिस्पर्धा और तकनीकी बदलाव तेजी से बढ़े तो भारत के सेवा क्षेत्र पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
कृषि और औद्योगिक क्षेत्र को लेकर भी राजनीतिक विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। राहुल गांधी द्वारा किसानों से मुलाकात और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों पर उठाए गए सवालों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। किसान संगठनों का कहना है कि यदि कृषि उत्पादों के आयात-निर्यात से जुड़े फैसले अंतरराष्ट्रीय दबाव में लिए गए तो घरेलू बाजार और छोटे किसानों पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर सरकार का दावा है कि वैश्विक बाजारों से जुड़ने से किसानों को नए अवसर मिलेंगे और कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा। औद्योगिक क्षेत्र में सार्वजनिक कंपनियों के निजीकरण और विनिवेश को लेकर भी राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सरकारी कंपनियों को घाटे में दिखाकर निजी क्षेत्र को बढ़ावा दिया जा रहा है, जबकि सरकार इसे आर्थिक सुधारों का हिस्सा बता रही है।
रक्षा क्षेत्र में किए जा रहे सौदों और सैन्य आधुनिकीकरण को लेकर भी राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। सरकार का कहना है कि भारत को अपनी सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए बहुपक्षीय रक्षा सहयोग अपनाना पड़ रहा है। फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमान और रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली जैसे समझौते इसी रणनीति का हिस्सा बताए जा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि रक्षा सौदों में पारदर्शिता की कमी है और अमेरिका के दबाव में भारत की रक्षा नीति प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अपनी सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना होगा, लेकिन इसके साथ राष्ट्रीय हितों और पारदर्शिता को भी प्राथमिकता देना जरूरी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात में कैबिनेट मंत्रियों की राजनीतिक ताकत और उनकी स्वतंत्र भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कई मंत्री अपने क्षेत्रों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के आधार पर चुनाव जीतते रहे हैं, जिससे उनकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान सीमित होती नजर आती है। विपक्ष इसी मुद्दे को लेकर सरकार पर हमला कर रहा है और दावा कर रहा है कि नीति निर्माण में लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर हो रही है। वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि मजबूत नेतृत्व के कारण देश तेजी से विकास की ओर बढ़ रहा है और बड़े फैसलों में समन्वित रणनीति अपनाना जरूरी है।
शेयर बाजार में हाल की गिरावट और निवेशकों को हुए भारी नुकसान ने आर्थिक नीतियों को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। बाजार में आई गिरावट के बाद विपक्ष ने सरकार की आर्थिक रणनीति पर सवाल उठाए हैं। सरकार का कहना है कि वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव का असर भारत पर भी पड़ता है और दीर्घकालिक दृष्टि से अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकों के कारण आईटी सेक्टर में आने वाले बदलाव भारत के सेवा क्षेत्र के लिए चुनौती बन सकते हैं।
मौजूदा परिस्थितियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत की राजनीति अब केवल घरेलू मुद्दों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वैश्विक आर्थिक और कूटनीतिक समीकरणों का प्रभाव भी इसमें निर्णायक भूमिका निभा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत को अपनी आर्थिक और रणनीतिक नीतियों को बेहद सावधानी से तय करना होगा। विपक्ष जहां सरकार की नीतियों पर सवाल उठा रहा है, वहीं सत्ता पक्ष इन आलोचनाओं को विकास विरोधी बताकर खारिज कर रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन चुनौतियों का सामना किस तरह करती है और देश की अर्थव्यवस्था तथा राजनीति पर इन बदलावों का क्या असर पड़ता है।
समकालीन राजनीतिक घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाले वर्षों में भारत की नीति निर्माण प्रक्रिया और अधिक वैश्विक प्रभावों से जुड़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, रक्षा सहयोग, डिजिटल अर्थव्यवस्था और ऊर्जा नीति जैसे क्षेत्रों में लिए जाने वाले फैसले देश की आर्थिक दिशा को तय करेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इन नीतियों में संतुलन और पारदर्शिता बनाए रखी गई तो भारत वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है, लेकिन यदि राजनीतिक विवाद और नीति निर्माण के बीच दूरी बढ़ी तो इसका असर देश की लोकतांत्रिक संरचना और आर्थिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है। मौजूदा राजनीतिक टकराव और संसद में हो रही बहसें इस बात का संकेत हैं कि आने वाले समय में आर्थिक नीतियों और अंतरराष्ट्रीय समझौतों को लेकर राजनीतिक संघर्ष और तेज हो सकता है, जो देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित करेगा।





